यौन उत्पीड़न से रिश्वतखोरी के लगे दाग, जानें कौन हैं ये माननीय
Corrupt Judge
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 10:55 PM
Corrupt Judge : दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायाधीश यशवंत वर्मा सरकारी आवास से बेहिसाब अधजले नोट मिलने के बाद जांच का सामना कर रहे हैं। उनसे न्यायिक कार्य वापस ले लिए गए हैं। इसके साथ ही न्यायमूर्ति वर्मा को मूल कोर्ट इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया है। हालांकि, इलाहाबाद हाईकोर्ट बार एसोसिएशन ने न्यायमूर्ति वर्मा को इलाहाबाद हाईकोर्ट भेजे जाने के कोलेजियम के फैसले के विरोध में अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर दी है। भारतीय न्यायपालिका में समय-समय पर कुछ न्यायाधीश विभिन्न विवादों के केंद्र में रहे हैं, जिनमें भ्रष्टाचार, यौन उत्पीड़न, पद के दुरुपयोग और अन्य आरोप शामिल हैं। इसी क्रम में आज हम ऐसे न्यायाधीशों की पड़ताल कर रहे हैं। यौन उत्पीड़न के साथ साथ रिश्वतखोरी का भी जस्टिस पर आरोप लग चुका है। इसके साथ ही अन्य न्यायाधीशों के निम्नलिखित उदाहरण इस प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।
भ्रष्टाचार के आरोप :
न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी (1993) : सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश वी. रामास्वामी पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे, जिसके परिणामस्वरूप उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू हुई। हालांकि, लोकसभा में यह प्रस्ताव आवश्यक दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करने में असफल रहा।
न्यायमूर्ति सौमित्र सेन (2011) : कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सौमित्र सेन को राज्यसभा ने वित्तीय दुरुपयोग का दोषी पाया और उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पारित किया। लोकसभा में कार्यवाही से पहले ही उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
यौन उत्पीड़न के आरोप :
न्यायमूर्ति रंजन गोगोई (2019) : तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर सुप्रीम कोर्ट की एक पूर्व कर्मचारी ने यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया। इन-हाउस जांच समिति ने उन्हें क्लीन चिट दी, लेकिन पारदर्शिता की कमी के कारण इस निर्णय की आलोचना हुई। सेवानिवृत्ति के बाद, उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया, जिससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर बहस छिड़ गई।
पद के दुरुपयोग के आरोप :
न्यायमूर्ति नागार्जुन रेड्डी (2016) : आंध्र प्रदेश और तेलंगाना हाईकोर्ट के न्यायाधीश नागार्जुन रेड्डी पर एक दलित न्यायाधीश को निशाना बनाने और अपने पद का दुरुपयोग करने का आरोप लगा। राज्यसभा के 61 सदस्यों ने उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, हालांकि बाद में कुछ सदस्यों ने अपने हस्ताक्षर वापस ले लिए।
न्यायिक दुर्व्यवहार और विवादास्पद टिप्पणियाँ :
न्यायमूर्ति सी. एस. कर्णन (2017) : कलकत्ता हाईकोर्ट के न्यायाधीश सी. एस. कर्णन को सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियों के कारण अवमानना का दोषी ठहराया और छह महीने की जेल की सजा सुनाई। यह पहली बार था जब किसी वर्तमान न्यायाधीश को जेल भेजा गया।
न्यायमूर्ति भक्तवत्सल (2012): कर्नाटक हाईकोर्ट के न्यायाधीश भक्तवत्सल ने एक मामले में टिप्पणी की कि सभी महिलाएं शादी में परेशानियों का सामना करती हैं, जिसकी व्यापक आलोचना हुई।
न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा (2020) : सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश अरुण मिश्रा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दूरदर्शी नेता कहा, जिससे न्यायपालिका की निष्पक्षता पर सवाल उठे। भूमि अधिग्रहण से जुड़े एक मामले में सरकार के पक्ष में निर्णय देने पर भी उनकी आलोचना हुई।
महाभियोग और इस्तीफे :
न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा (2018) : तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ विपक्षी दलों ने महाभियोग प्रस्ताव पेश किया, जिसमें न्यायिक कदाचार के आरोप थे। यह प्रस्ताव अंतत: खारिज कर दिया गया।
न्यायमूर्ति जे. बी. पारदीवाला (2015) : गुजरात हाईकोर्ट के न्यायाधीश जे. बी. पारदीवाला के खिलाफ आरक्षण पर विवादास्पद टिप्पणी करने के कारण राज्यसभा के 58 सांसदों ने महाभियोग नोटिस दिया। उन्होंने बाद में अपनी टिप्पणी वापस ले ली।
न्यायपालिका में आंतरिक असहमति :
प्रेस कॉन्फ्रेंस (2018) : सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों जे. चेलमेश्वर, रंजन गोगोई, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ—ने एक अभूतपूर्व प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर मुख्य न्यायाधीश पर मामलों के असमान आवंटन का आरोप लगाया, जिससे न्यायपालिका में आंतरिक मतभेद उजागर हुए। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि भारतीय न्यायपालिका में समय-समय पर कुछ न्यायाधीशों के आचरण और निर्णयों को लेकर विवाद उत्पन्न होते रहे हैं, जो न्याय प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करते हैं।