मालेगांव केस : धमाका तो साबित हुआ, लेकिन इन 4 वजहों से सभी आरोपी बरी
Malegaon Case :
भारत
चेतना मंच
29 Nov 2025 09:15 PM
2008 के मालेगांव बम धमाके मामले में मुंबई की एनआईए कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें भाजपा सांसद साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर, लेफ्टिनेंट कर्नल श्रीकांत पुरोहित, स्वामी असीमानंद और अन्य प्रमुख नाम शामिल हैं। फैसले में अदालत ने स्पष्ट किया कि धमाके की घटना तो सच थी, लेकिन उससे जुड़े आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त और ठोस सबूत नहीं मिले। न्यायाधीश एके लाहोटी ने फैसले में वो चार मुख्य बिंदु रखे, जिनके आधार पर अदालत ने यह निष्कर्ष निकाला कि आरोपी आतंक की साजिश में शामिल नहीं थे। Malegaon Case :
अदालत ने किन 4 कारणों से सभी आरोपियों को बरी किया?
1. प्रज्ञा ठाकुर और बाइक का संबंध साबित नहीं हुआ
अदालत ने माना कि मालेगांव में धमाका हुआ, लेकिन जिस मोटरसाइकिल में बम लगाया गया, उसे लेकर प्रज्ञा सिंह ठाकुर के साथ कोई स्पष्ट संबंध साबित नहीं किया जा सका। फॉरेंसिक रिपोर्ट में बाइक का सीरियल नंबर तक स्पष्ट नहीं किया गया। नतीजतन, धमाके और प्रज्ञा ठाकुर के बीच कोई प्रत्यक्ष लिंक अदालत में स्थापित नहीं हो सका।
2.प्रज्ञा एक संन्यासी थीं, साजिश का हिस्सा नहीं
अदालत ने माना कि प्रज्ञा सिंह ठाकुर सन्यास ले चुकी थीं और बम धमाके से करीब दो साल पहले ही दुनियावी जीवन और संपत्ति त्याग चुकी थीं। सबसे अहम बात ये रही कि उनके किसी भी सह-आरोपी के साथ साजिश रचने के कोई साक्ष्य नहीं मिले।
3. लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित पर भी सबूत नहीं
कर्नल पुरोहित पर आरोप था कि उन्होंने आरडीएक्स मुहैया कराया और साजिश रची, लेकिन कोर्ट ने कहा कि आरडीएक्स की आपूर्ति या बम बनाने में उनकी भूमिका साबित नहीं की जा सकी। उनके खिलाफ भी ऐसा कोई प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य सबूत नहीं मिला जिससे उन्हें आतंकी गतिविधियों से जोड़ा जा सके।
4. फंडिंग का कोई ठोस सबूत नहीं मिला
कोर्ट ने कहा कि धमाके की फंडिंग कहां से हुई, यह पूरी तरह अस्पष्ट रहा। केवल एक लेनदेन का जिÞक्र आया, जो कर्नल पुरोहित और आरोपी अजय राहीकर के बीच हुआ, लेकिन अदालत ने पाया कि वह रकम कर्नल का निजी मकान बनाने के लिए थी, न कि किसी आतंकी साजिश के लिए।
मालेगांव धमाकों का संक्षिप्त इतिहास
2006 में पहला बम धमाका, शब-ए-बरात की रात को हुआ। यह धमाका कब्रिस्तान और मस्जिद के पास हुआ था, जिसमें
37 से अधिक लोग मारे गए और 100+ घायल हुए। इस मामले में 9 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया गया था, लेकिन 2019 में सभी को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया गया। 2008 में दूसरा धमाका 29 सितंबर को एक बाइक में रखे बम से हुआ था। इसमें 6 लोग मारे गए और 100 से ज्यादा घायल हुए। यही केस साध्वी प्रज्ञा, कर्नल पुरोहित और अन्य पर चला, जिसकी जांच बाद में एनआईए को सौंप दी गई। 2008 के मालेगांव धमाके को लेकर आज आया यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया, सबूतों की अहमियत और आतंकवाद के आरोपों के प्रति अदालत के संतुलित रवैये को दर्शाता है। अदालत ने यह भी साफ किया कि भावनाओं के आधार पर नहीं, बल्कि साक्ष्यों के आधार पर फैसला किया जाता है।