विधेयक पर तीन महीने का अल्टीमेटम: क्या कमजोर हुई राष्ट्रपति की मर्जी?
Supreme court :
भारत
चेतना मंच
02 Dec 2025 12:40 AM
Supreme court : सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) द्वारा अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति और राज्यपाल को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए तीन माह की समयसीमा निर्धारित करने के फैसले ने एक संवैधानिक बहस को जन्म दे दिया है। यह फैसला राष्ट्रपति की "पॉकेट वीटो" की शक्ति को सीमित करता है और संविधान में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को चुनौती देता दिख रहा है। संविधानविदों और राजनीतिक विशेषज्ञों ने इस पर गंभीर आपत्ति जताई है।
अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट (Supreme court) की समय सीमा तय करने पर विवाद
8 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने एक फैसला सुनाते हुए कहा कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा भेजे गए विधेयकों पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना चाहिए। पहली बार कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के निर्णय की समयसीमा तय की, जिसे संविधान के मुताबिक उनकी विवेकाधीन शक्ति माना जाता रहा है।
संविधानविदों की चिंता: पॉकेट वीटो पर असर
कई संविधान विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला राष्ट्रपति को संविधान प्रदत्त पॉकेट वीटो की शक्ति को कम करता है। संविधान में राष्ट्रपति की शपथ उसे संविधान का रक्षक बनाती है, जबकि पॉकेट वीटो एक ऐसा ही उपकरण है, जिसका उपयोग संभावित रूप से देशहित में अनावश्यक या विवादास्पद विधेयकों को रोकने के लिए किया जा सकता है।
ऐतिहासिक संदर्भ: ज्ञानी जैल सिंह और पॉकेट वीटो
भारत के सातवें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने भी पॉकेट वीटो का प्रयोग कर संसद द्वारा पारित इंडियन पोस्ट ऑफिस (संशोधन) विधेयक को रोक दिया था। यह दिखाता है कि राष्ट्रपति की विवेकाधीन शक्तियाँ हमेशा राजनीतिक संतुलन बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण रही हैं।
सरकार के विकल्प: पुनर्विचार या नया विधेयक
अब केंद्र सरकार इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका या क्यूरेटिव याचिका दायर कर सकती है। इसके अलावा, अध्यादेश या विधेयक लाकर संसद में इस निर्णय को पलटा भी जा सकता है।
शक्तियों का संतुलन ज़रूरी
भारतीय संविधान का मूल ढांचा शक्तियों के पृथक्करण पर आधारित है। न्यायपालिका को संविधान की व्याख्या का अधिकार है, लेकिन उसमें बदलाव करने का नहीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला प्रशासनिक दृष्टि से भले ही व्यावहारिक लगे, लेकिन संवैधानिक दृष्टि से एक नई बहस का द्वार खोल रहा है। Supreme court :