
केंद्र सरकार ने संसद में एक ऐसा बिल पेश किया है, जिसके तहत प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और मंत्रियों को 30 दिन तक जेल में रहने पर पद से हटाया जा सकेगा। लेकिन यह प्रस्ताव कानूनी, राजनीतिक और व्यावहारिक पेचिदगियों में ऐसा उलझा है कि इसके कानून बनने की संभावना बेहद कम है। दरअसल, मौजूदा नियमों के अनुसार किसी भी जनप्रतिनिधि की सदस्यता तभी खत्म होती है जब अदालत उसे कम से कम दो साल की सजा सुनाए। ऐसे में केवल 30 दिन की हिरासत को आधार बनाकर किसी को पद से हटाना न तो न्यायसंगत लगता है और न ही व्यवहारिक। यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ भी है—बिना मुकदमे के किसी को दोषी कैसे ठहराया जा सकता है ? Constitution Amendment Bill
यह सवाल भी अहम है कि क्या पूरा एनडीए इस बिल का समर्थन करेगा। विपक्षी दलों की तरह बीजेपी और उसके सहयोगी दल भी अक्सर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगाते रहे हैं। यदि कानून लागू हुआ, तो नीतीश कुमार से लेकर चंद्रबाबू नायडू तक, कई सहयोगी नेता भी इसकी जद में आ सकते हैं। जाहिर है, कोई भी दल खुद अपने लिए भविष्य की मुसीबत खड़ी नहीं करना चाहेगा।
अगर यह कानून बन भी गया, तो केंद्र और राज्यों के बीच टकराव का नया मोर्चा खुल सकता है। राज्य सरकारें केंद्रीय एजेंसियों को राजनीतिक हथियार मानकर अपने स्तर पर प्रतिरोध खड़ा करेंगी। मौजूदा हालात में भी हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल जैसे नेता जांच एजेंसियों की कार्रवाई के बावजूद पद पर बने रहे, जब तक अदालत ने राहत देना बंद नहीं किया। विपक्ष इस मुद्दे पर भी एकजुट नहीं दिख रहा है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर इस प्रस्ताव के समर्थन में खड़े नजर आए, जबकि प्रियंका गांधी ने इसे ‘क्रूर’ और ‘अन्यायपूर्ण’ बताया। यह स्थिति वैसी ही है जैसी यूपीए सरकार के समय देखने को मिली थी, जब राहुल गांधी ने दागी नेताओं को बचाने वाले एक अध्यादेश की प्रति फाड़कर विरोध जताया था।
सबसे बड़ी व्यावहारिक समस्या यह है कि अदालतें 30 दिन के भीतर किसी गंभीर मामले की सुनवाई पूरी कैसे कर पाएंगी। जब बड़े मुकदमों में फैसले आने में दशकों लग जाते हैं, तो महज एक महीने में किसी पर दोष सिद्ध करना संभव ही नहीं। ऐसे में प्रस्तावित बिल महज सैद्धांतिक बहस तक सिमटकर रह जाने की आशंका है।
गृह मंत्री अमित शाह ने बिल को संसद की संयुक्त समिति (जेपीसी) के पास भेजने का प्रस्ताव भी रखा, जिसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया। लेकिन विपक्षी दलों ने इसका कड़ा विरोध किया। कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने तो बिल की प्रति तक फाड़ दी। साफ है कि इस बिल की राह आसान नहीं है, और फिलहाल इसका किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना नामुमकिन ही लगता है।
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