
Space News : ऑपरेशन ‘सिंदूर’ में मिली इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर की सफलता ने भारतीय रणनीति के नए युग की शुरुआत की है। अब भारत इसे एक कदम आगे बढ़ाते हुए अंतरिक्ष निगरानी क्षमताओं को व्यापक और सशक्त बनाने जा रहा है। रक्षा मंत्रालय की देखरेख में अगले तीन से चार वर्षों में कुल 52 सैन्य निगरानी उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया जाएगा। लक्ष्य स्पष्ट है—चीन, पाकिस्तान और हिंद महासागर क्षेत्र में शत्रु की गतिविधियों पर स्पष्ट, तीव्र और वास्तविक समय में नजर रखना। इस अत्याधुनिक प्रोजेक्ट में जहां इसरो अग्रणी भूमिका निभा रहा है, वहीं निजी क्षेत्र की तीन कंपनियों को भी उपग्रह निर्माण व प्रक्षेपण का जिम्मा सौंपा गया है। इस पूरी कवायद का लक्ष्य है — चीन और पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों पर सटीक, रियल टाइम निगरानी के माध्यम से एक रणनीतिक बढ़त हासिल करना।
सात से दस मई के बीच चले ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत ने पाकिस्तानी रक्षा प्रतिष्ठानों के संचार तंत्र को महज 22 मिनट के लिए ठप कर दिया था। इस दौरान भारतीय वायुसेना ने आतंकवादियों के ठिकानों पर निर्णायक कार्रवाई की। इस सफलता के मूल में थे भारत के सैन्य उपग्रह, जिन्होंने आतंकी शिविरों की सटीक लोकेशन देकर अभियान को दिशा दी। सैटेलाइट्स ने जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैयबा और हिज्बुल जैसे संगठनों के पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में स्थित ठिकानों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट की। इन्हीं इंटेल इनपुट्स के दम पर भारत ने बहावलपुर, मुजफ्फराबाद, कोटली और सियालकोट जैसे क्षेत्रों में घातक हमले किए।
इस महत्वाकांक्षी योजना को मूर्त रूप देने के लिए केंद्र सरकार ने अक्टूबर 2024 में ₹26,968 करोड़ का बजट स्वीकृत किया है। परियोजना के तहत इसरो 21 उपग्रहों को लॉन्च करेगा, जबकि तीन निजी कंपनियां 31 उपग्रहों का निर्माण एवं प्रक्षेपण करेंगी। पहला उपग्रह अप्रैल 2026 तक प्रक्षेपित किया जाएगा और 2029 के अंत तक पूरा नेटवर्क कार्यशील हो जाएगा। इन उपग्रहों की तैनाती के बाद भारत दक्षिण एशिया से लेकर वैश्विक स्तर पर रियल टाइम सैटेलाइट इमेजिंग की क्षमता प्राप्त कर लेगा, जो सैन्य से लेकर आपदा प्रबंधन तक में निर्णायक भूमिका निभाएगी।
इस प्रोजेक्ट की निगरानी इंटीग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (IDS) कर रहा है, जो रणनीतिक हालात में सशस्त्र बलों को सामरिक बढ़त दिलाने का काम करता है। यह सैटेलाइट सिस्टम थलसेना, वायुसेना और नौसेना तीनों के लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की भूमिका निभाएगा। विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत की यह अंतरिक्ष नीति केवल जवाबी हमलों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि डिटरेंस और प्री-एम्प्टिव रणनीति का मजबूत आधार भी बनेगी।
भारत अब केवल ऑर्बिटल सैटेलाइट्स तक सीमित नहीं रहना चाहता। वायुसेना हाई-एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट्स (HAPS) पर काम कर रही है—जो UAV आधारित प्लेटफॉर्म होते हैं और 18 से 22 किलोमीटर ऊंचाई पर हफ्तों तक उड़ सकते हैं। HAPS, जो सौर ऊर्जा से संचालित होते हैं, कम लागत में संचार, निगरानी और खुफिया कार्यों को अंजाम देने की क्षमता रखते हैं। इन्हें संकट की घड़ी में त्वरित रूप से तैनात किया जा सकता है, और पारंपरिक उपग्रहों की तुलना में अधिक लचीलापन प्रदान करते हैं। Space News