विकास पुरुष के नाम से विख्यात राजनेता नारायण दत्त तिवारी की आज जयंती और पुण्यतिथि है। देश के एकमात्र ऐसे नेता जिनका दो राज्यों उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने का रिकॉर्ड है, 18 अक्टूबर 1925 को जन्मे और 18 अक्टूबर 2018 को स्वर्गवासी हुए। नारायण दत्त तिवारी को विकास पुरुष के साथ सबसे अधिक विवादित नेता के रूप में भी जाना जाता है।
तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने वाले नारायण दत्त तिवारी दो बार देश के प्रधानमंत्री बनते बनते रह गए थे। 1987 में जब राजीव गांधी बोफोर्स मामले में फंसते हुए दिखाई दिए और वी. पी. सिंह ने रक्षा मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया, तो कांग्रेस में यह विचार पनपा कि राजीव गांधी अपने पद से दो-तीन महीने के लिए इस्तीफा दे दें और जब हालात सामान्य हो जाएं तो पुनः पदासीन हो जाएं।
अब सवाल था कि अंशकालिक प्रधानमंत्री किसे बनाया जाए, तो पी. वी. नरसिम्हा राव और नारायण दत्त तिवारी का नाम सामने आया। राजीव राव को गद्दी सौंपना चाहते थे। लेकिन जब उन्हें समझाया गया कि राव को प्रधानमंत्री बनाने से उत्तर भारत के वोटों पर उल्टा असर पड़ सकता है, तो नारायण दत्त तिवारी के नाम पर सहमति बनी। प्रस्ताव तिवारी के सामने रखा गया जिसे उन्होंने मंजूर करने से साफ इंकार कर दिया।
इसके बाद 1991 में एक और ऐसा अवसर आया जब तिवारी प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन बन नहीं पाए। हुआ यूं कि तिवारी 1991 का संसदीय चुनाव मात्र 5000 वोटों से हार गए थे, अगर जीत गए होते तो चुनाव तक नहीं लड़ने वाले नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री शायद कभी न बनते। राजनीति के अनेक जानकारों का तब भी मानना था और आज भी मानना है कि राजीव गांधी की हत्या के बाद यदि नारायण दत्त तिवारी देश के प्रधानमंत्री होते तो कांग्रेस और देश के हालात ऐसे नहीं होते जैसे कि होते चले गए।
नारायण दत्त तिवारी रोजाना 18 घंटे काम किया करते थे और ऐसा भी वास्तव में करते थे। तिवारी की यह विशेषता थी कि उन्हें हर मिलने वाले का नाम याद रहता था। भीड़ में भी तिवारी परिचितों को नाम लेकर बुलाते थे। लोगों का दिल जीतने की कला में तिवारी पारंगत थे। नारायण दत्त तिवारी के एक विशेषता यह भी थी कि जो भी व्यक्ति उनसे मिलने आता था, वह उससे मिलते जरूर थे। उनका यह व्यवहार उन्हें सीधा लोगों से दिल से जोड़ता था।
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पिता पंडित पूर्णानंद तिवारी की तरह नारायण दत्त तिवारी भी आजादी की लड़ाई में शामिल हुए। 1942 में असहयोग आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने के चलते जेल में डाल दिए गए। 15 महीने जेल काटने के बाद वह 1944 में रिहा हुए। मजेदार बात यह है कि कांग्रेस की सियासत करने वाले तिवारी की शुरुआत सोशलिस्ट पार्टी से हुई थी। कांग्रेस के साथ तिवारी का रिश्ता 1963 से शुरू हुआ था। 1951 में उत्तर प्रदेश के पहले विधानसभा चुनाव में तिवारी ने नैनीताल (उत्तर) सीट से प्रजा सोशलिस्ट समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर हिस्सा लिया और कांग्रेस की हवा होने के बावजूद चुनाव जीत गए थे।
नारायण दत्त तिवारी जब किसी से नाराज होते थे, तो उसे महाराज, भाई साहब या भगवन कहकर संबोधित करने लगते थे। महिलाओं के साथ संबंधों को लेकर तिवारी की काफी किरकिरी हुई। 2008 में रोहित शेखर ने अदालत में तिवारी का बेटा होने का दावा पेश किया। डीएनए टेस्ट में यह सच पाया गया और 2014 में 89 वर्ष की आयु में तिवारी ने रोहित शेखर की मां उज्जवला से शादी कर ली।
जिस नोएडा को औद्योगिक क्रांति की महान उपलब्धि के रूप में देखा जाता है, वह नारायण दत्त तिवारी की ही देन है। उन्हीं के विकास परक सोच का परिणाम है। व्यक्तिगत चरित्र को उठाकर दरकिनार कर दें, तो नरेंद्र तिवारी जैसा आज कोई नेता मिलना मुश्किल ही है।