बिहार विधानसभा चुनावों के लिए मतदान समाप्त हो चुका है और एग्जिट पोल्स से संकेत मिल रहे हैं कि राज्य में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की लहर कायम है। चाहे परिणाम कुछ भी हों, लेकिन यह निर्विवाद है कि नीतीश कुमार अब उन नेताओं की श्रेणी में आ चुके हैं जिनके विरोधियों के पास भी कहने को बहुत कुछ नहीं बचा।

बता दे कि दो दशकों से अधिक समय तक सत्ता में रहने के बावजूद न तो उनके ऊपर भ्रष्टाचार का कोई दाग है और न ही किसी बड़े घोटाले का आरोप। यही वजह है कि बिहार की राजनीति में वे अब अजात शत्रु बन चुके हैं। नीतीश कुमार का राजनीतिक सफर 1970 के दशक में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से शुरू हुआ। इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्होंने राजनीति को अपना जीवन बना लिया। 1985 में वे पहली बार विधायक बने, 1990 में लोकसभा पहुंचे और 2000 में रेल मंत्री के रूप में देशभर में अपनी छाप छोड़ी। 2005 में जब वे पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो राज्य की तस्वीर ही बदल दी। कानून-व्यवस्था सुधार, सड़क और बिजली के क्षेत्र में तेज़ प्रगति और भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती ने उन्हें ‘सुशासन बाबू’ की उपाधि दिलाई।
बता दे कि महिलाओं और पिछड़े वर्गों के सशक्तिकरण में नीतीश कुमार की भूमिका ऐतिहासिक रही है। ‘मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ ने ग्रामीण लड़कियों के लिए शिक्षा का दरवाज़ा खोला। एक समय 60% का ड्रॉपआउट रेट अब 10% तक घट चुका है। ‘सात निश्चय योजना’ के तहत गांव-गांव तक बिजली, सड़क, शौचालय और इंटरनेट पहुंचा। ‘मुख्तारंबरी योजना’ से मातृ और शिशु स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार आया। बिहार की साक्षरता दर अब 80% के करीब पहुंच चुकी है — जो उनके शासन की दिशा का प्रमाण है।
बता दे कि जाति और धर्म आधारित राजनीति के दौर में नीतीश कुमार ने समावेशी विकास को अपनी पहचान बनाया। उन्होंने अति पिछड़े वर्ग (EBC) और महादलितों को राजनीतिक पहचान दी, वहीं अगड़े वर्गों का भी विश्वास बनाए रखा। बिहार की 17% मुस्लिम आबादी उन्हें एक भरोसेमंद नेता मानती है, जबकि हिंदू समुदाय में भी वे ‘सुशासन’ और नैतिकता के प्रतीक हैं। नीतीश की राजनीति नफरत पर नहीं, न्याय और विकास पर टिकी है।
बतो दे कि बिहार की आधी से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। ऐसे में युवाओं की नाराजगी को समझना किसी भी नेता के लिए चुनौती होती है। नीतीश कुमार ने ‘कुशल युवा कार्यक्रम’ और ‘डिजिटल हेल्पलाइन’ जैसी पहलों के जरिए युवाओं की आवाज़ को नीतियों में शामिल किया। 2024 में जब बेरोजगारी और महंगाई पर युवा सोशल मीडिया पर आक्रोश जता रहे थे, नीतीश ने सीधा संवाद स्थापित कर उनकी नाराजगी को अवसर में बदला।
बता दे कि 2005 से पहले बिहार अपराध और पिछड़ेपन का पर्याय था। नीतीश कुमार के शासन में अपराध दर में 50% से अधिक गिरावट आई। सड़क नेटवर्क 70,000 किमी से बढ़कर 1.5 लाख किमी से अधिक हो गया, बिजली पहुंच 15% से 95% तक पहुंच गई और गंगा पर बने पुलों ने राज्य को जोड़ा। विश्व बैंक ने इसे ‘बिहार मिरेकल’ कहा — एक ऐसा उदाहरण जब सुशासन और दृढ़ इच्छाशक्ति ने असंभव को संभव कर दिखाया।
महात्मा गांधी की अहिंसा, नेहरू की आधुनिकता, इंदिरा गांधी की दृढ़ता और अटल बिहारी वाजपेयी की समावेशी राजनीति के बाद अब नीतीश कुमार का नाम उसी पंक्ति में जुड़ता दिख रहा है। अगर एग्जिट पोल्स की भविष्यवाणियां सच साबित होती हैं, तो यह न केवल एनडीए की जीत होगी बल्कि नीतीश कुमार की विरासत का पुनः अनुमोदन भी।