
Agriculture Tips: फसल कटाई के बाद बचे हुए अवशेष ही फसल अपशिष्ट कहलाते हैं। गेहूं के अवशेषों का उपयोग प्लास्टिक बनाने के लिए किया जाता है। यह पर्यावरण की दृष्टि से टिकाऊ विकल्प है। इसे खाद्य एवं औषधि प्रशासन अनुमोदन (एफडीए) प्राप्त है और इसे एक प्रीमियम खाद्य-ग्रेड सामग्री के रूप में देखा जाता है। यह पूरी तरह से बिसफेनोल ए (बीपीए) मुक्त है। पर्यावरण पर प्लास्टिक का प्रभाव विनाशकारी है, इसलिये गेहूं के भूसे से बनाया 'प्लास्टिक' एक अच्छा विकल्प है। प्लास्टिक, गेहूं के उत्पादन के उप-उत्पाद, अर्थात गेहूं के भूसे से बनाया जाता है। गेहूं के भूसे से कंटेनर, स्ट्रॉ, प्लास्टिक प्लेट, कॉफी कप जैसे कई उपयोगी सामग्रियां बनाई जा सकती हैं।
गेहूं का उपयोग आटा, ब्रेड और गेहूं से प्राप्त उत्पाद जैसे पास्ता बनाने के लिए किया जाता है। गेहूं का भूसा, उप-उत्पाद है, जो गेहूं की कटाई के बाद बचा रहता है। इसका उपयोग प्लास्टिक जैसा पदार्थ बनाने के लिए किया जा सकता है। यह एक आदर्श शून्य- अपशिष्ट विकल्प है। गेहूं के भूसे में सेल्यूलोज होता है और इसे पुनः उपयोग करके नया उत्पाद बनाया जा सकता है। यह प्रक्रिया विभिन्न प्रकार के पॉलीमर बनाने का अवसर देती है। प्राकृतिक बहुलक हमारे शरीर में पाए जाते हैं, जैसे- बाल और नाखून प्लास्टिक कृत्रिम पॉलीमर से बनाया जाता है, लेकिन गेहूं के भूसे से बने पॉलीमर पूरी तरह से प्राकृतिक होते हैं।
गेहूं के भूसे से 'प्लास्टिक' गेहूं की फसल के अवशेष में लिग्निन होता है। लिग्निन पौधे का वह भाग है, जो इसे खड़ा रहने में मदद करता है। चीनी के साथ मिलाने पर लिग्निन को बायो प्लास्टिक में बदला जा सकता है।
सबसे पहले प्लास्टिक बनाने में सक्षम होने के लिए लिग्निन को तोड़ा जाना चाहिए। लिग्निन को रोडोकोकस जोस्टी नामक बैक्टीरिया द्वारा तोड़ा जाता है, जो मिट्टी में पाया जाता है। बैक्टीरिया, एसिड का उत्पादन कर सकते हैं और कृत्रिम उत्पादों के उपयोग के बिना लिग्निन को आसानी से तोड़ देते है, जो पर्यावरण के लिए बेहतर है। एक बार लिग्निन के टूटने के बाद इसे चीनी के साथ मिलाकर प्लास्टिक जैसा पदार्थ बनाया जाता है। इसके बाद इसे प्लेट कप और स्टोरेज कंटेनर जैसे रूपों में ढाला जाता है। गेहूं के भूसे का उपयोग कागज जैसा पदार्थ बनाने के लिए भी किया जाता है। कुछ रसायनों के साथ, पुआल को लुगदी में बदल दिया जाता है और फिर लुगदी को एक प्लेट में दबाया जाता है। यह मजबूत है और एलर्जिक नहीं है। इसमें कोई ग्लूटेन नहीं होता है। यह प्रक्रिया केवल गेहूं के भूसे तक ही सीमित नहीं है। अन्य कृषि अपशिष्ट उत्पादों जैसे- घास, पत्ते और यहां तक कि लकड़ी का भी इसमें उपयोग किया जाता है, जिससे प्राकृतिक प्लास्टिक का उत्पादन होता है।
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गेहूं के भूसे से बने 'प्लास्टिक' के अनुप्रयोग
यह माइक्रोवेव और फ्रीजर सुरक्षित है। यह गंधहीन होता है और इसमें फफूंदी नहीं लगती।
यह 100 डिग्री सेल्सियस / 220 डिग्री फॉरेनहाइट तक गर्म तरल पदार्थों को संभाल सकता है।
यह यूएस फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफडीए) के दिशानिर्देशों का पालन करता है।
गेहूं के भूसे के प्लास्टिक जैसे पदार्थ के उत्पादन के लिए कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है। कृत्रिम प्लास्टिक के उत्पादन के लिए बहुत अधिक ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। कार्बनडाइऑक्साइड गैसों का उत्सर्जन बहुत अधिक होता है। गेहूं का भूसा प्राकृतिक होता है, इसलिए इसका उत्पादन करने के लिए बहुत कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है।
प्राकृतिक रेशे, तेल जैसे विषाक्त पदार्थों को जोड़ने की आवश्यकता के बिना सामग्री को मजबूत बनाते हैं।
गेहूं किसानों के लिए यह आय का एक अतिरिक्त स्रोत है, क्योंकि वे इन उपोत्पादों को उचित मूल्य पर बेच सकते हैं।
अपशिष्ट निपटान कम हो जाता है, क्योंकि पुआल को जलाने की कोई आवश्यकता नहीं होती है, जो वायु प्रदूषण को और बढ़ाता है।
डिस्पोजेबल प्लास्टिक और पेपर उत्पादों जैसे- प्लेट और कप को गेहूं के भूसे का उपयोग करके उत्पादों द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सकता है। आवश्यक सामग्री प्राप्त करने के लिए हमारे जंगलों को काटने की आवश्यकता नहीं है। इस प्रकार आमतौर पर अवशेष के रूप में देखे जाने वाले कृषि उत्पाद का उपयोग कर सकते हैं।
उपयोगिता यह पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल है। घरेलू कम्पोस्ट डिवाइस में कम्पोस्ट बनने में 3 से 6 महीने का समय लगता है और स्थानीय नगरपालिका कम्पोस्ट में केवल 1 से 2 महीने का समय लगता है। यह नवीकरणीय और टिकाऊ है। ये उत्पाद पूरी तरह से प्राकृतिक हैं, ये सड़ सकते हैं और उर्वरक के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं। यह एलर्जेनिक नहीं है। यह ग्लूटेनमुक्त है। इसे साफ करना आसान है और यह प्रबल और मजबूत है।
पर्यावरण पर गेहूं के भूसे से बने 'प्लास्टिक' का प्रभाव
गेहूं का भूसा बायोडिग्रेडेबल है, इसलिए प्राकृतिक रूप से टूटने में कम समय लगेगा। प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया के माध्यम से गेहूं उगाने के दौरान यह हवा से जितना कार्बनडाइऑक्साइड (CO2) पैदा करेगा, उससे अधिक कार्बनडाइऑक्साइड निकालेगा। बायोप्लास्टिक का उत्पादन कम ऊर्जा की खपत करता है और सिंथेटिक प्लास्टिक के उत्पादन की तुलना में कम CO2 उत्सर्जित करता है, जो पेट्रोलियम से प्राप्त होता है।
परंपरागत रूप से गेहूं की कटाई के बाद पुआल को जला दिया जाता था, जिससे अधिक CO2 गैस निकलती थी, इसलिए इससे बचा जाता है। हालांकि बहुत से देशों में गेहूं के भूसे को जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है और लोगों द्वारा इसका विरोध किया जाता है, फिर भी दक्षिण अमेरिका जैसे दुनिया के कई हिस्सों में खेतों में ही इसे जला दिया जाता है।
गेहूं के भूसे का प्लास्टिक बहुमुखी है। इसका उपयोग कई अनुप्रयोगों के लिए किया जा सकता है। 100 डिग्री सेल्सियस / 220 डिग्री फारेनहाइट तक की गर्मी प्रतिरोध के कारण इसका पुनः उपयोग किया जा सकता है। सिंगल यूज प्लास्टिक को कम करने का यह एक अच्छा तरीका है।