
Agriculture Tips : खेती के दौरान किसान भाईयों को फसलों में लगने वाले विभिन्न कीटों से निपटने में परेशानी होती है। विभिन्न फसलों के विभिन्न कीट से निपटने के लिए विभिन्न प्रकार के रसायन भी प्रयोग किए जाते हैं, जिनसे कीट तो मर जाते हैं, लेकिन किसी न किसी तरह से फसल को भी नुकसान पहुंचता है। हानिकारक कीट प्रबंधन से फसल के मित्र कीट, पशुओं और मानव पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। आज हम इस लेख के माध्यम से जानेंगे कि हानिरहित कीट प्रबंधन कैसे किया जा सकता है।
फसल अवशेषों तथा खरपतवारों की सफाई फसलों की कटाई हो जाने के बाद प्रायः उनके अवशेषों को खेत में ही छोड़ दिया जाता है। ये अवशेष, पल रहे विभिन्न कीटनाशकों के जनन शरण तथा निद्रा के स्थानों के रूप में काम आते हैं। इसलिए इनको खेतों से हटाया जाना आवश्यक है। खेतों में छोड़े गए अवशेषों में पलने वाले कीटों में प्रायः धान, ज्वार, मक्का, गन्ना, कपास तथा बैंगन के कीट प्रमुख हैं। यदि ज्वार, मक्का, गन्ने आदि के अवशेषों को इकट्ठा करके नष्ट कर दिया जाये तो उनमें पल रही बेधक की सूंडियां नष्ट हो जाती हैं।
बहुत से कीटनाशक खेतों के आसपास लगे खरपतवारों पर फसल कट जाने के बाद जीवन निर्वाह करते हैं। ये खरपतवार इनके लिए वैकल्पिक पोषक पौधों का कार्य करते हैं। यदि इन खरपतवारों को नष्ट कर दिया जाये, तो कीटों की संख्या में भारी कमी की जा सकती है। कपास की धब्बेदार सूंडी एवं पत्ती लपेटक कीट, मालवेसी कुल के खरपतवारों पर अपना जीवन निर्वाह करते हैं। अतः इन खरपतवारों को नष्ट करने से इन कीटों की संख्या में बहुत कमी आ जाती है।
ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई जहां भी संभव हो, ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई करनी चाहिए। ग्रीष्मकालीन गहरी जुताई द्वारा खरपतवारों के बीज एवं हानिकारक कीटों की विभिन्न अवस्थाएं जैसे- अंडा, इल्ली. शंखी तथा प्रौढ़ मृदा के ऊपर आ जाते हैं, जो कि गर्मी अधिक होने से नष्ट हो जाते हैं या विभिन्न पक्षियों द्वारा इनका भक्षण कर लिया जाता है।
फसलचक्र यह एक व्यावहारिक तथा प्रभावी नियंत्रण तकनीक है। यह विधि उन कीटों के नियंत्रण के लिए विशेष तौर पर, उपयोग में लायी जानी चाहिए, जो एक या दो मौसमों तक फसल अथवा मनचाहे पोषक के अभाव में जीवित नहीं रह पाते हैं। एक ही फसल तथा उसी समुदाय की फसलों को एक ही क्षेत्र या एक ही स्थान पर लगातार बोते रहने से कीटों को मनचाहा भोजन मिलता है, जिससे कीटों का प्रकोप बढ़ता जाता है। इससे बचाव के लिए आवश्यक है कि फसलचक्र अपनाया जाये अर्थात एक कुल की फसल के बाद दूसरे कुल की फसल की बुआई की जाये। इस हेरफेर से कीटों का प्रकोप कम किया जा सकता है। बुआई का समय प्रायः फसल की बुआई का समय इस प्रकार निर्धारित किया जाना चाहिए कि फसल प्रतिस्पर्धात्मक रूप से कीटनाशक से श्रेष्ठ रहें। प्रत्येक कीट के प्रकोप का प्रायः एक निश्चित समय है, जब फसल को उससे अधिक हानि पहुंचती है। अतः इस समय बोयी गई फसल कीट के प्रकोप से अधिक क्षतिग्रस्त होती है। फसलों को यदि कीटों के प्रकोप की अवस्था को ध्यान में रखकर बोया जाये, तो उन्हें बहुत हद तक क्षति से बचाया जा सकता है। यदि कद्दू की लताओं की अगेती बुआई की जाये, तो फरवरी तक लतायें बड़ी हो जायेंगी तथा इन पर फरवरी के अंत में निकलने वाले लाल कीट का कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार यदि सरसों तथा कपास की अगेती बुआई की जाये, तो उन पर माहूं तथा फुदकों का प्रकोप कम होता है।
जल प्रबंधन फसल की विभिन्न अवस्थाओं में जल की कमी या अधिकता से विपरीत प्रभाव होता है। फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का जीवन भी प्रभावित होता है। अतः फसलों में समुचित जल प्रबंध करके कीटों के प्रकोप को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
धान के खेतों में भूरा माहूं, सफेद माहूं, चितरी, बंकी का प्रकोप होने पर खेत से पानी निकाल दें तथा एक सप्ताह बाद पुनः भरें। ऐसा करने से इन कीटों का प्रकोप कम हो जाता है।
धान के कटुआ कीट का आक्रमण होने पर पानी भर दें। इससे इस कीट की शंखिया, जो पौधों के आधार के पास होती हैं, मर जाती हैं।
धान, गन्ना तथा गेहूं की फसलों के खेतों में पानी की कमी होने पर दीमक कीट अधिक नुकसान पहुंचाता है। इस कीट से होने वाली हानि को सिंचाई करके कम किया जा सकता है। मूंगफली की सिंचित फसल को माहू कीट अधिक नुकसान पहुंचाता है।
उर्वरक प्रबंध मृदा की उर्वरता बढ़ाने के लिए विभिन्न फसलों तथा कीटनाशकों पर कई प्रकार से प्रभाव पड़ता है। उर्वरकों (नाइट्रोजन, पोटाश, फॉस्फोरस) के विभिन्न मिश्रणों का पादप भक्षियों पर पृथक-पृथक प्रभाव पड़ता है। इस स्थिति का नाशक जीव व्यवस्था अथवा कीट प्रबंधन कार्यक्रम में उपयोग किया जा सकता है। इसके लिए विभिन्न उर्वरकों की मात्रा में कई प्रकार से हेरफेर तथा उनके उपयोग के समय में और सम्मिश्रणों परिवर्तन करके जीवनाशक संख्याओं पर प्रभाव डाला जा सकता है। नाइट्रोजन की अधिक मात्रा से धान के कीटबंधक (काइलो सप्रेसेलिस और ट्राइपोराइजा इनसरटूलस), मक्का के तनाबेधक तथा पत्ती फुदका का प्रकोप बढ़ जाता है। फॉस्फोरस तथा पोटाश की कम मात्रा एफिड की संख्या को कम करती है।
ट्रैप फसल इस प्रकार की फसलों को पूर्व फसल अथवा एकांतर फसल के रूप में नाशक कीटों को आकर्षित करने के लिए लगाया जाता है। इनसे कीटनाशकों का प्रभाव प्राकृतिक शत्रुओं पर नहीं पड़ता, उदाहरणार्थ कद्दू और खरबूजों के खेतों के चारों ओर मक्के की कुछ पंक्तियों के लगाने पर फल मक्खी, जो कद्दू कुल की फसलों की भयंकर शत्रु है, का प्रकोप कम किया जा सकता है। यह मक्खी मक्के की ओर अत्यधिक आकर्षित होती है। इस कारण लगायी गई मक्के की कुछ पंक्तियों पर कीटनाशी का छिड़काव करने से इसका नियंत्रण किया जा सकता है।
ग्रीष्मकालीन जुताई से कीट नियंत्रण धान फसल की कटाई के बाद जुताई करने से तनाछेदक, गंगई, कटुआ आदि कीट की इल्लियां एवं शंखियां मिट्टी के ऊपर आकर पक्षियों का आहार बन जाती हैं। धान खेतों की मेड़ों की हल्की खुदाई करने से काले कीट के अंडे समूह में ऊपर आकर गर्मी में नष्ट हो जाते हैं। विभिन्न फसलों के कीट जैसे चने की फलीभेदक शंखी, कद्दू के लाल भृंग की इल्ली, फल मक्खी की शंखी आदि मिट्टी के ऊपर आकर नष्ट हो जाते हैं।