बागेश्वर बाबा धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक बार फिर अपने बयान को लेकर चर्चा में हैं। कथा के मंच से कही गई एक बात ने ऐसा विवाद खड़ा कर दिया कि सोशल मीडिया से लेकर धार्मिक जगत तक प्रतिक्रियाओं का सिलसिला शुरू हो गया।

National News : बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर और कथावाचक पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री एक बार फिर अपने बयान को लेकर विवादों में घिर गए हैं। इस बार मामला करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था से जुड़ा है। सोशल मीडिया पर उनका एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वह भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप, उनकी मुद्राओं और उनकी लीलाओं की तुलना करते हुए दिखाई दे रहे हैं। वीडियो सामने आने के बाद कृष्ण भक्तों, ब्रज क्षेत्र के संतों और बड़ी संख्या में सोशल मीडिया यूजर्स ने उनकी टिप्पणी पर कड़ी नाराजगी जताई है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कई लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर किसी भी कथावाचक को भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण जैसे आराध्य देवों की तुलना इस तरह करने का अधिकार किसने दिया? आलोचक इसे धार्मिक मर्यादा के विरुद्ध बताते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगने की मांग कर रहे हैं। कुछ यूजर्स ने तो बेहद आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए उन्हें ‘पागल’ तक कह दिया है।
मामला मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के करैरा में आयोजित श्रीराम कथा का है। यहां 28-29 अक्टूबर 2026 के आसपास आयोजित कथा के दौरान धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की तुलना करते हुए टिप्पणी की। वायरल वीडियो में वह भगवान श्रीकृष्ण की प्रसिद्ध त्रिभंग मुद्रा का उल्लेख करते हुए कहते सुनाई देते हैं कि ठाकुरजी तीन जगह से टेढ़े होते हैं। उनके पैर, कमर और गर्दन की मुद्रा का जिक्र करते हुए उन्होंने भगवान श्रीराम को सीधे खड़े होने वाला बताया। उन्होंने अयोध्या और वृंदावन की तुलना करते हुए भी टिप्पणी की। इसके साथ ही भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी और भगवान श्रीराम के धनुष का उल्लेख करते हुए कहा कि बांसुरी बजाना खेल है, लेकिन धनुष उठाना कोई खेल नहीं है। यही टिप्पणी विवाद का सबसे बड़ा कारण बन गई है। भगवान श्रीकृष्ण की त्रिभंग मुद्रा भारतीय भक्ति परंपरा में अत्यंत सुंदर और दिव्य स्वरूप के रूप में प्रतिष्ठित है। ऐसे में इस मुद्रा को टेढ़ेपन के रूप में प्रस्तुत करने और भगवान श्रीराम से तुलना करने पर अनेक श्रद्धालुओं ने आपत्ति जताई है। National News
सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री को लेकर तीखी बहस शुरू हो गई है। आलोचकों का कहना है कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण दोनों ही सनातन धर्म के आराध्य हैं। दोनों के स्वरूप, लीलाएं, शिक्षाएं और जीवन दर्शन अपनी-अपनी विशिष्टता रखते हैं। भगवान श्रीराम मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में पूजनीय हैं तो भगवान श्रीकृष्ण योगेश्वर, प्रेम, भक्ति और गीता के उपदेशक के रूप में करोड़ों श्रद्धालुओं के आराध्य हैं। दोनों के बीच श्रेष्ठता का विवाद खड़ा करना ही अनुचित है। सोशल मीडिया पर कई लोगों ने सवाल उठाया कि यदि कोई सामान्य व्यक्ति भगवान के स्वरूप को लेकर ऐसी टिप्पणी करे तो धार्मिक भावनाएं आहत होने की बात कही जाती है, फिर एक बड़े कथावाचक को सार्वजनिक मंच से इस तरह की तुलना करने में सावधानी क्यों नहीं बरतनी चाहिए? कई आलोचकों ने उनकी सफाई को भी पर्याप्त नहीं माना और कहा कि उन्हें अपनी टिप्पणी के लिए स्पष्ट रूप से क्षमा मांगनी चाहिए। National News
इस विवाद पर केवल सोशल मीडिया यूजर्स ने ही नहीं, बल्कि ब्रज क्षेत्र के संतों और धार्मिक लोगों ने भी आपत्ति जताई है। मथुरा-वृंदावन के संतों ने कहा कि भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण में भेद करना उचित नहीं है। दोनों एक ही परम सत्ता के स्वरूप माने जाते हैं। धार्मिक वक्ताओं और संतों का कहना है कि कथा के मंच से ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए जिससे श्रद्धालुओं के बीच अनावश्यक विवाद पैदा हो। भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी, उनकी त्रिभंग मुद्रा और वृंदावन की महिमा करोड़ों भक्तों की आस्था का विषय है। ग्वालियर में यादव समाज के कुछ लोगों ने भी विरोध जताया और पुलिस को ज्ञापन देकर कार्रवाई की मांग की। इस घटनाक्रम ने विवाद को और व्यापक बना दिया है। National News
सोशल मीडिया और संतों की लगातार बढ़ती आलोचना के बाद धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने वीडियो संदेश जारी कर अपनी बात स्पष्ट करने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उनकी टिप्पणी का उद्देश्य भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के बीच कोई भेद पैदा करना नहीं था। उनके मुताबिक, वह एक प्रचलित भक्तिपरक पद की व्याख्या कर रहे थे। उन्होंने इसे गोपियों द्वारा भगवान श्रीकृष्ण से किए जाने वाले भावपूर्ण उलाहने और व्यंग्य स्तुति की परंपरा से जोड़कर समझाया। उन्होंने स्वयं को भगवान श्रीकृष्ण का भक्त बताते हुए कहा कि वह ठाकुरजी का विरोध नहीं करते। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान श्रीकृष्ण और भगवान श्रीराम दोनों ही उनके लिए पूजनीय हैं और दोनों में भेद करने का उनका कोई इरादा नहीं था। धीरेंद्र शास्त्री ने यह भी स्वीकार किया कि भाव में कुछ बातें कह दी गईं और यदि उनकी बातों से किसी की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं तो वह क्षमा मांगते हैं। उन्होंने हाथ जोड़कर अपनी बात रखी। National News
धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की सफाई सामने आने के बावजूद विवाद पूरी तरह शांत होता दिखाई नहीं दे रहा है। आलोचकों का कहना है कि धार्मिक मंच पर बोलने वाले व्यक्ति की जिम्मेदारी सामान्य वक्ता से कहीं अधिक होती है। लाखों लोग उनकी कथाओं को सुनते हैं और उनके वक्तव्यों का व्यापक प्रभाव पड़ता है। ऐसे में आलोचकों के अनुसार, उन्हें भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण के स्वरूप की तुलना करने से बचना चाहिए था। कुछ लोगों का कहना है कि केवल यह कहना कि बात भाव में निकल गई, पर्याप्त नहीं है। उन्हें अपनी टिप्पणी पर स्पष्ट खेद व्यक्त करते हुए कृष्ण भक्तों और ब्रजवासियों से क्षमा मांगनी चाहिए। दूसरी ओर, उनके समर्थकों का कहना है कि कथा के पूरे संदर्भ को देखे बिना किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचना चाहिए। उनका तर्क है कि भक्ति साहित्य में भगवान से प्रेमपूर्ण उलाहना और विनोद की परंपरा रही है। National News
इस पूरे विवाद ने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा कर दिया है। धार्मिक कथाएं केवल मनोरंजन या वक्तृत्व का मंच नहीं होतीं। वहां आने वाले श्रद्धालु अपने आराध्य के प्रति प्रेम, श्रद्धा और विश्वास लेकर पहुंचते हैं। भगवान श्रीराम और भगवान श्रीकृष्ण दोनों ही सनातन परंपरा के अभिन्न स्वरूप हैं। उनकी तुलना करके किसी एक को दूसरे से श्रेष्ठ बताने की आवश्यकता ही क्या है? दोनों की महिमा उनके अपने चरित्र, आदर्शों और लीलाओं में निहित है। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की सफाई और क्षमा याचना के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कृष्ण भक्तों और विरोध कर रहे संतों की नाराजगी किस तरह शांत होती है। फिलहाल इस विवाद ने एक बार फिर धार्मिक मंचों से दिए जाने वाले बयानों की मर्यादा और जिम्मेदारी पर बहस छेड़ दी है। National News
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