विज्ञापन
Dhar Bhojshala: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने शुक्रवार को अपने फैसले में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के रूप में निर्धारित की।

Dhar Bhojshala Verdict: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच के फ़ैसले के बाद शनिवार(16 मई) को धार जिले में स्थित भोजशाला परिसर में श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना करने के लिए प्रवेश किया। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने शुक्रवार को अपने फैसले में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के रूप में निर्धारित की। अदालत ने 242 पन्नों के फैसले में एएसआई के सात अप्रैल 2003 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार परिसर में नमाज अदा करने की अनुमति दी गई थी।
एएनआई के मुताबिक भक्तों का एक छोटा समूह परिसर के भीतर पूजा-अर्चना करने के लिए इकट्ठा हुआ। एक भक्त ने इस फैसले पर अपनी सहमति जताते हुए कहा, "सालों बाद हमें बिना किसी रुकावट के दर्शन करने का मौका मिला है। अदालत ने बहुत बढ़िया फैसला सुनाया है। मैं हर दिन यहां पूजा करने आऊंगा।"
पीटीआई के मुताबिक एक श्रद्धालु ने कहा, "आज जो माहौल है उसे बयां नही कर सकते, हम बहुत खुश हैं, कोर्ट और जज साहब का आभार उन्होंने ये फैसला सुनाया, आज ऐसा लगा हम आजाद हो गए हैं पहले आने में डर लगता है।" एक महिला भक्त ने कहा, "आज का माहौल तो अविस्मरणीय है, आज जो खुशी हुई बयां नहीं कर सकते, हनुमान चालिसा का पाठ किया है सरस्वती वदंना की है।"
'इसकी जिम्मेदारी अब एएसआई पर'
एएनआई के मुताबिक भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के वकील अविरल विकास खरे ने इस फ़ैसले के कानूनी संदर्भ को समझाते हुए कहा, “इस आदेश की मुख्य बातें ये हैं कि भोजशाला स्थल को ‘संरक्षित स्मारक’ घोषित किया गया है—एक ऐसा दर्जा जो इसे वर्ष 1904 से ही प्राप्त है। इसका तात्पर्य यह है कि इस स्मारक का संपूर्ण प्रशासन और विनियमन विशेष रूप से एएसाई के ही अधीन रहेगा; संक्षेप में कहें तो, इस स्थल की देखरेख का दायित्व पूरी तरह से एएसआई पर ही होगा।”
खरे ने आगे कहा, “कोर्ट ने इस जगह के स्वरूप को तय करते हुए पुष्टि की है कि ऐतिहासिक रूप से यह वाग्देवी (देवी सरस्वती) को समर्पित एक मंदिर की जगह थी, और इसका निर्माण भोज/परमार वंश के शासनकाल में हुआ था। इस जगह के स्वरूप के संबंध में किए गए इस निर्धारण के आधार पर, हिंदू समुदाय को इस जगह पर पूजा-अर्चना करने का अधिकार दिया गया है। इसके अलावा, एएसआई के उस पिछले आदेश में भी बदलाव किया गया है—जिसके तहत मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार के दिन एक तय समय के लिए ‘नमाज’ (प्रार्थना) अदा करने की अनुमति दी गई थी।”
'ऐतिहासिक फैसला'
न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक अदालत के आदेश के बाद, हिंदू पक्ष का प्रतिनिधित्व कर रहे विष्णु शंकर जैन ने इस फ़ैसले को "ऐतिहासिक" बताया। उन्होंने कहा कि अदालत ने एएसआई के 7 अप्रैल, 2003 के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया है। जैन ने कहा, "इंदौर हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाया है, जिसमें एएसआई के 7 अप्रैल, 2003 के आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया गया है। इसके अलावा, अदालत ने हिंदू पक्ष को पूजा करने का अधिकार दिया है और भोजशाला परिसर को राजा भोज का माना है।"
क्या है विवाद?
धार की भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने विवादित परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा किया था।
मुस्लिम पक्ष देगा चुनौती
पीटीआई-भाषा के मुताबिक मुस्लिम पक्ष के वकील अशहर वारसी ने कहा, “हम भोजशाला मामले में उच्च न्यायालय के फैसले से संतुष्ट नहीं हैं और इसे शीर्ष अदालत में जल्द से जल्द चुनौती देंगे।” उन्होंने दावा किया कि भोजशाला परिसर में एएसआई का वैज्ञानिक सर्वेक्षण और इसकी रिपोर्ट ‘त्रुटिपूर्ण’ थी तथा उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में मुख्य रूप से इस रिपोर्ट पर भरोसा किया है।
वारसी ने यह भी कहा कि ‘विवादित तथ्यों वाले इस मामले’ का निपटारा संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत नहीं किया जाना चाहिए था और इसे दीवानी अदालत भेजा जाना चाहिए था। यह अनुच्छेद उच्च न्यायालयों को लोगों के मौलिक अधिकारों और अन्य कानूनी अधिकारों के मामलों में अलग-अलग रिट (औपचारिक आदेश) जारी करने की शक्ति देता है।
वारसी ने बताया कि मुस्लिम समुदाय से ताल्लुक रखने वाले उनके मुवक्किलों ने धार की एक दीवानी अदालत में भोजशाला मामले को लेकर पहले ही मुकदमा दायर कर रखा है।
विज्ञापन