सड़क परियोजनाओं पर ही 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का अनुमान है। अगर ये योजनाएं तय समयसीमा में जमीन पर उतरती हैं, तो बिहार की भौतिक संरचना आने वाले वर्षों में पूरी तरह बदलती दिख सकती है।

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की धमाकेदार जीत के बाद अब असली फोकस सत्ता की कुर्सी से ज्यादा विकास के एजेंडे पर टिक गया है। केंद्रीय गृह मंत्री की मानें तो राज्य में करीब ₹1.8 लाख करोड़ का निवेश आने वाला है, जिसके तहत 25 नई चीनी मिलों की स्थापना की बात कही जा रही है। इसी बीच अदाणी ग्रुप ने भी ‘मुंगेर–सुल्तानगंज रोड’ प्रोजेक्ट के जरिए बिहार में अपनी सक्रिय मौजूदगी दर्ज करा दी है। ऊपर से एक करोड़ नौकरी, सात एक्सप्रेसवे और ‘लखपति दीदी’ जैसी योजनाओं के वादे – तस्वीर साफ है कि अब जनता इन घोषणाओं के जमीन पर उतरने का इंतज़ार कर रही है।
इस चुनाव में एनडीए गठबंधन ने 202 सीटों पर बढ़त और जीत दर्ज कर यह साफ कर दिया कि मतदाताओं ने एक बार फिर ‘डबल इंजन’ मॉडल पर भरोसा जताया है। बीजेपी की 89 और जेडीयू की 85 सीटों वाले इस समीकरण ने नीतीश कुमार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जोड़ी को विकास का एक आक्रामक रोडमैप पेश करने का मौका दिया है। अब चुनौती यह है कि चुनावी मंच से किए गए बड़े-बड़े वादे सिर्फ कागजों पर न रह जाएं, बल्कि आम लोगों के जीवन में ठोस बदलाव के रूप में दिखाई दें। क्योंकि जनता ने यह जनादेश सिर्फ सरकार बदलने के लिए नहीं, बल्कि बिहार की किस्मत बदलने की उम्मीद से दिया है।
बिहार के युवा इस चुनाव में एनडीए की जीत के सबसे बड़े हिस्सेदार माने जा रहे हैं। गठबंधन ने अपने विजन डॉक्यूमेंट में एक करोड़ से अधिक नौकरी और रोजगार के अवसर सृजित करने का दावा किया है।हर जिले में मेगा स्किल सेंटर खोलने की योजना है, ताकि बिहार के युवाओं को देश और विदेश दोनों के लिए ‘स्किल्ड वर्कफोर्स’ के रूप में तैयार किया जा सके। विचार यह है कि राज्य को ‘ग्लोबल स्किलिंग हब’ की दिशा में आगे बढ़ाया जाए, जिससे पलायन करने वाला युवा अब रोजगार के लिए अपने ही राज्य में विकल्प तलाश सके। उद्योगों के मोर्चे पर भी सरकार ने हर जिले में आधुनिक मैन्युफैक्चरिंग यूनिट और 10 नए औद्योगिक पार्क स्थापित करने की बात कही है। गृह मंत्री के दावे के मुताबिक, ₹1.80 लाख करोड़ के अनुमानित निवेश के साथ 25 नई चीनी मिलें लगाने की तैयारी है। इसके साथ कौशल जनगणना के बाद युवाओं को उनके हुनर के मुताबिक रोजगार देने का वादा किया गया है, यानी लक्ष्य सिर्फ नौकरी देना नहीं, बल्कि ‘राइट स्किल–राइट जॉब’ मॉडल पर काम करना है।
किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था को ‘सुपर इकोनॉमी’ की दिशा में ले जाने के लिए मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर रीढ़ की हड्डी का काम करता है। एनडीए ने इस मोर्चे पर भी कई बड़े और महत्वाकांक्षी वादे किए हैं।
सात नए एक्सप्रेसवे
चार शहरों में मेट्रो सेवा
3600 किलोमीटर रेल ट्रैक का आधुनिकीकरण
10 नए शहरों को घरेलू हवाई सेवा से जोड़ने की योजना
इसके साथ ही पटना के पास एक ग्रीनफील्ड इंटरनेशनल एयरपोर्ट विकसित करने का वादा किया गया है। पूर्णिया, भागलपुर और दरभंगा को भी अंतरराष्ट्रीय हवाई कनेक्टिविटी के नक्शे पर लाने की तैयारी की जा रही है। सड़क परियोजनाओं पर ही 54 हजार करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का अनुमान है। अगर ये योजनाएं तय समयसीमा में जमीन पर उतरती हैं, तो बिहार की भौतिक संरचना आने वाले वर्षों में पूरी तरह बदलती दिख सकती है।
गौतम अदाणी के नेतृत्व वाला अदाणी ग्रुप भी अब बिहार में सीधे तौर पर दांव खेल रहा है। अदाणी एंटरप्राइजेज लिमिटेड ने “मुंगेर सुल्तानगंज रोड लिमिटेड” नाम से एक फुली सब्सिडियरी कंपनी बनाई है। यह कंपनी हाइब्रिड एन्युटी मोड पर ‘मुंगेर (सफियाबाद) बरियारपुर घोरघाट सुल्तानगंज रोड को जोड़ने वाले गंगा पथ’ के विकास, प्रबंधन और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालेगी। यह कदम संकेत देता है कि देश के बड़े कॉरपोरेट हाउस अब बिहार को गंभीर निवेश गंतव्य के रूप में देखने लगे हैं। निजी क्षेत्र की यह भागीदारी अगर बढ़ी, तो रोजगार, स्थानीय व्यापार और सप्लाई चेन के स्तर पर बड़ा बदलाव संभव है।
सरकार ने गरीब और वंचित वर्ग के लिए जो सामाजिक सुरक्षा ढांचा घोषित किया है, उसे “पंचामृत गारंटी” के रूप में पेश किया जा रहा है। इसमें
– मुफ्त राशन
– 125 यूनिट तक मुफ्त बिजली
– 5 लाख रुपये तक का मुफ्त इलाज
जैसी सुविधाएं शामिल हैं। यह सीधे तौर पर उन परिवारों को राहत देने की कोशिश है, जिनकी रोजमर्रा की ज़िंदगी महंगाई और अनिश्चित आय की मार झेल रही है।
महिला सशक्तिकरण पर भी सरकार ने खास जोर दिया है। मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना के तहत महिलाओं को दो लाख रुपये तक की वित्तीय सहायता देने की बात कही गई है। इसके साथ ही एक करोड़ महिलाओं को ‘लखपति दीदी’ बनाने का लक्ष्य रखा गया है, यानी महिलाओं को खुद–रोजगार, स्वरोजगार और छोटे उद्यमों के जरिए आर्थिक रूप से मजबूत करने की योजना है।
किसान मोर्चे पर सरकार ने कर्पूरी ठाकुर किसान सम्मान निधि योजना के तहत किसानों को सालाना तीन हजार रुपये देने की घोषणा की है। इसके अलावा, सभी प्रमुख फसलों की पंचायत स्तर पर MSP पर खरीद सुनिश्चित करने, प्रखंड स्तर पर फूड प्रोसेसिंग यूनिट लगाने, और एग्री इंफ्रास्ट्रक्चर में एक लाख करोड़ रुपये तक का निवेश करने का वादा किया गया है। अगर एमएसपी पर प्रभावी खरीद और फूड प्रोसेसिंग यूनिट की स्थापना समय पर हो पाती है, तो किसानों की आय में वास्तविक बढ़ोतरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकदी प्रवाह देखने को मिल सकता है।
बिहार औद्योगिक क्षेत्र विकास प्राधिकरण (BIADA) भी नए निवेशकों को लगातार प्लेटफॉर्म देने की कोशिश कर रहा है। उदाहरण के तौर पर, मुजफ्फरपुर जैसे जिलों में नमकीन, मिनरल वाटर, बिस्किट, आटा और अन्य घरेलू उत्पादों की 27 नई इंडस्ट्रियल यूनिट को जमीन आवंटित की गई है। इन यूनिट्स में करीब 18 करोड़ रुपये का निवेश प्रस्तावित है।
ऐसी छोटी लेकिन महत्वपूर्ण औद्योगिक परियोजनाएं स्थानीय स्तर पर रोजगार, सप्लाई चेन और छोटे व्यापारियों के लिए नए अवसर पैदा कर सकती हैं।
कुल तस्वीर देखें तो मोदी–नीतीश की नई पारी खुद को सिर्फ ‘सत्ता प्रबंधन’ तक सीमित न रखकर, ‘इकोनॉमिक ट्रांसफॉर्मेशन’ की कहानी के रूप में पेश करने की कोशिश कर रही है। बड़े निवेश, रोजगार के दावे, इंफ्रास्ट्रक्चर की लकीरें, किसानों–महिलाओं–गरीबों के लिए योजनाएं – कागज पर सब कुछ दमदार दिखता है।
लेकिन बिहार की राजनीति और प्रशासन, दोनों ने पहले भी वादों और हकीकत के बीच की दूरी देखी है। अब पूरा राज्य यही देखना चाहता है कि यह जुगलबंदी इन घोषणाओं को फाइलों से बाहर निकालकर ज़मीन पर कितनी तेजी और पारदर्शिता के साथ उतार पाती है। अगर ये वादे समय पर पूरे हुए, तो आने वाले वर्षों में बिहार की आर्थिक कहानी वाकई नई दिशा पकड़ सकती है।