
बिहार विधानसभा चुनाव इस बार कुछ अलग है। वजह है राज्य की नई मतदाता शक्ति, Gen-Z वोटर। यानी 1997 के बाद जन्मे वे युवा, जिनकी सोच, प्राथमिकताएं और राजनीति को देखने का नज़रिया पुरानी पीढ़ियों से बिलकुल अलग है। आंकड़े कहते हैं कि बिहार के हर चौथे वोटर का चेहरा अब Gen-Z का है। यही वजह है कि इस बार की सियासत पूरी तरह युवाओं के इर्द-गिर्द घूम रही है। 6 और 11 नवंबर को दो चरणों में होने वाले चुनाव में 58 फ़ीसदी आबादी 25 साल से कम उम्र की है, जबकि 25 फ़ीसदी मतदाता Gen-Z वर्ग से हैं। इनमें करीब 14.7 लाख वोटर पहली बार वोट डालने जा रहे हैं। यानी यह वही पीढ़ी है, जो न तो लालू यादव के दौर को जानती है, न कांग्रेस की सरकारें देखी हैं — बल्कि जिसने सिर्फ़ नीतीश कुमार का बिहार देखा है। Bihar Elections 2025
Gen-Z की सबसे बड़ी पहचान है इंटरनेट, सोशल मीडिया और जागरूकता। इन युवाओं ने बचपन से ही कंप्यूटर, मोबाइल और डिजिटल दुनिया देखी है। ये सिर्फ़ भाषण नहीं सुनते, डेटा और तथ्यों की तुलना करते हैं। इन्हें “20 साल पहले बिहार कैसा था” जैसे राजनीतिक नैरेटिव से कम फर्क पड़ता है, क्योंकि उनका अनुभव उसी सरकार के दौर में हुआ है जो अब भी सत्ता में है। युवा वोटर अब ‘विकास’ का मतलब सिर्फ़ सड़कों या पुलों से नहीं, बल्कि रोज़गार, शिक्षा और अवसरों से जोड़कर देखते हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल अब अपने घोषणापत्रों को यूथ-सेंट्रिक नैरेटिव में ढाल रहे हैं। Bihar Elections 2025
एनडीए इस बार बिहार के युवाओं के सामने रोज़गार और विकास की ठोस कहानी पेश करने की कोशिश में है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल में ऐलान किया कि स्नातक या इंटर पास बेरोज़गार युवाओं को दो साल तक ₹1000 प्रतिमाह सहायता दी जाएगी। साथ ही, उन्होंने एक करोड़ नौकरियों का वादा करके चुनावी माहौल में नई हलचल पैदा कर दी है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि अब भी युवाओं के बीच मजबूत और निर्णायक नेतृत्व की प्रतीक बनी हुई है।
‘डिजिटल इंडिया’, ‘स्टार्टअप इंडिया’ और ‘मुद्रा योजना’ जैसी योजनाओं ने न सिर्फ़ युवाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाया है, बल्कि सरकार तक सीधी पहुंच का भरोसा भी दिया है। इसी कड़ी में, एनडीए सहयोगी चिराग पासवान ने “बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट” के नारे के साथ भावनात्मक जुड़ाव साधने की कोशिश की है। यानी एनडीए का पूरा फोकस इस बार राष्ट्रवाद और विकास के मेल से युवाओं के आत्मगौरव को जगाने पर है — क्योंकि बिहार की नई पीढ़ी अब सिर्फ़ वादे नहीं, परिणाम देखने की अभ्यस्त हो चुकी है।
बिहार की सियासत में तेजस्वी यादव अब सिर्फ़ लालू यादव के बेटे नहीं, बल्कि नई पीढ़ी की उम्मीद बनकर उभरना चाहते हैं। उन्होंने अपनी छवि में ज़बरदस्त बदलाव किया है — अब कुर्ता-पायजामा की जगह टी-शर्ट और जोश से भरे बयान हैं, जो सीधे युवा मतदाताओं को संबोधित करते हैं। तेजस्वी का फोकस साफ है — रोजगार और पलायन रोकना। वे कह चुके हैं कि अगर महागठबंधन सत्ता में आया तो हर परिवार में एक सरकारी नौकरी सुनिश्चित करने की दिशा में काम होगा। Bihar Elections 2025
साथ ही, उन्होंने हर ज़िले में इंजीनियरिंग, मेडिकल और पॉलिटेक्निक कॉलेज खोलने का वादा कर युवाओं को शिक्षा और रोजगार के बीच सीधा रिश्ता दिखाने की कोशिश की है। दरअसल, तेजस्वी जानते हैं कि आज का युवा नारे से नहीं, नौकरी के ऑफर लेटर से प्रभावित होता है। इसलिए वे इस चुनाव को “बेरोज़गारी बनाम भरोसा” की लड़ाई के रूप में पेश कर रहे हैं और यही नैरेटिव उन्हें बाकी नेताओं से अलग खड़ा करता है। Bihar Elections 2025
रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर (PK) इस बार तीसरा विकल्प बनकर उभरे हैं। वे अपनी ‘जन सुराज यात्रा’ के ज़रिए गांव-गांव जाकर युवाओं से संवाद कर रहे हैं और भ्रष्टाचार, सरकारी लापरवाही और शिक्षा-रोज़गार की बदहाली को सीधे मुद्दा बना रहे हैं। पीके की राजनीति पारंपरिक ढांचे से अलग है न जातीय गठजोड़, न पुराने नारों की पुनरावृत्ति। उनका फोकस है बदलाव की राजनीति और युवाओं को सीधा भागीदार बनाना। लेकिन सवाल यह भी उतना ही अहम है कि क्या यह जन-ऊर्जा मतदान बूथ तक पहुंच पाएगी? क्योंकि बिना मजबूत संगठन और जमीनी नेटवर्क के, उम्मीदों की राजनीति को नतीजों में बदलना बिहार की धरती पर आसान नहीं। फिर भी, एक बात तय है प्रशांत किशोर ने बिहार की चुनावी बहस में विकल्प की आवाज तो जरूर पैदा कर दी है, और यह आवाज़ जितनी नई है, उतनी ही युवा और असंतुष्ट मन को छूती है।
लोकनीति-सीएसडीएस के सर्वे के मुताबिक, 2020 के बिहार चुनाव में बेरोज़गारी और नौकरियों की कमी 21 फ़ीसदी मतदाताओं के लिए सबसे बड़ा मुद्दा था। पांच साल बीत गए, लेकिन तस्वीर बहुत नहीं बदली — सवाल अब भी वही हैं, बस पीढ़ी नई हो गई है। 2025 का यह चुनाव इसलिए खास है क्योंकि अब फैसला जाति या परंपरागत समीकरणों से नहीं, बल्कि भविष्य की उम्मीदों से होगा। बिहार का युवा अब यह तय करेगा कि उसे बदलाव की नई राह चाहिए या स्थिरता के पुराने भरोसे पर टिके रहना है। यही वह क्षण है जब राजनीति को यह समझना होगा कि अब वोट सिर्फ़ पहचान पर नहीं, संभावना पर पड़ता है। Bihar Elections 2025
बिहार का Gen-Z अब साइडलाइन पर खड़ा दर्शक नहीं, बल्कि लोकतंत्र का सबसे निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है। यही वह पीढ़ी है जो सोशल मीडिया की बहसों से निकलकर अब मतदान केंद्रों तक पहुंच रही है। स्क्रीन से सड़क तक, पोस्ट से वोट तक यह युवा तय करेगा कि राज्य की राजनीति अब पुराने ढर्रे पर चलेगी या नई सोच की दिशा में मुड़ेगी। 6 और 11 नवंबर को बिहार सिर्फ सरकार नहीं चुनेगा — वह यह भी तय करेगा कि आने वाले दशक में राज्य की विकास-गाथा का नायक कौन होगा और कौन सी यूथ पॉलिसी बिहार के दिल की धड़कन बनेगी। Bihar Elections 2025