
बिहार की मशहूर लोकगायिका मैथिली ठाकुर का नाम इन दिनों सिर्फ सुरों की दुनिया तक सीमित नहीं रहा। बीजेपी नेताओं से उनकी हालिया मुलाकात ने बिहार की राजनीति में नई हलचल मचा दी है। खुद मैथिली ने अपने गांव से विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जताकर इन अटकलों को और हवा दे दी है। दरअसल, यह कदम अचानक नहीं उठाया गया इसके पीछे पार्टी की गहरी राजनीतिक रणनीति है। बीजेपी महिला वोटबैंक, मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और मैथिली के संगीत की लोकप्रियता इन तीनों को मिलाकर एक नया सियासी समीकरण गढ़ने की कोशिश में है। भोजपुरी अभिनेता पवन सिंह के साथ बिगड़े समीकरण के बाद पार्टी को एक ऐसे चेहरे की तलाश थी, जो साफ-सुथरी छवि के साथ सांस्कृतिक और भावनात्मक जुड़ाव भी रखे — और मैथिली ठाकुर इस रणनीति में बिल्कुल फिट बैठती दिख रही हैं। Bihar Elections 2025
भोजपुरी स्टार पवन सिंह से बढ़ी दूरी के बाद पार्टी अब मैथिली ठाकुर के रूप में एक नए “सांस्कृतिक ब्रांड” को पेश करने की तैयारी में है। उनकी सादगीभरी छवि, लोकगायन की लोकप्रियता और मिथिला से गहरा जुड़ाव यह तीनों मिलकर बीजेपी के चुनावी एजेंडे को नया रंग दे सकते हैं। इसी बीच मैथिली ठाकुर की बीजेपी के बिहार प्रभारी विनोद तावड़े और केंद्रीय मंत्री नित्यानंद राय से मुलाकात ने इस अटकल को और मजबूत कर दिया है कि पार्टी उन्हें बेनीपट्टी विधानसभा सीट से उतार सकती है। मिथिला की मिट्टी से जुड़ी मैथिली ठाकुर पार्टी के हिंदुत्व नैरेटिव में भी सहजता से फिट बैठती हैं।
मैथिली ठाकुर की जड़ें मिथिला की उसी धरती से हैं, जहां जनकन्या सीता का जन्म हुआ था। यही कारण है कि बीजेपी के हिंदुत्व नैरेटिव में मिथिला की सांस्कृतिक पहचान और धार्मिक विरासत एक अहम कड़ी बनती जा रही है। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा पनौराधाम मंदिर के पुनरुद्धार की घोषणा ने इस जुड़ाव को और प्रासंगिक बना दिया है। बीजेपी अब इसी भावनात्मक धागे को सियासी बुनावट में पिरोने की कोशिश में है और मैथिली ठाकुर इस रणनीति का सबसे जीवंत चेहरा बनकर उभर रही हैं, जो मिथिला की परंपरा, आस्था और संगीत तीनों का प्रतीक हैं।
बीजेपी की रणनीति इस बार सिर्फ वोटों की नहीं, भावनाओं की राजनीति पर भी केंद्रित दिख रही है खासकर महिलाओं को साधने की दिशा में। लोकगायिका मैथिली ठाकुर इस रणनीति की स्वाभाविक पसंद हैं, क्योंकि उनकी सादगीभरी छवि, लोकप्रियता और सांस्कृतिक जुड़ाव उन्हें ग्रामीण महिलाओं के बीच एक प्रेरक चेहरा बनाते हैं। पार्टी का मानना है कि मैथिली की आवाज़ और पहचान, दोनों ही “आधी आबादी” के दिल तक पहुंचने की ताकत रखती हैं। वहीं, नीतीश कुमार पहले ही महिला कल्याण योजनाओं के ज़रिए इस वर्ग को लुभाने की कोशिश कर चुके हैं, ऐसे में बीजेपी मैथिली ठाकुर के ज़रिए उस भरोसे की डोर को अपने पक्ष में खींचने की कवायद में जुटी है — जहां सुर, संस्कार और सियासत एक साथ तालमेल बिठाते नजर आते हैं। Bihar Elections 2025
मैथिली ठाकुर मूल रूप से ब्राह्मण समाज से आती हैं। वह वर्ग जो मिथिलांचल की राजनीति में हमेशा निर्णायक भूमिका निभाता रहा है। हाल के वर्षों में इस तबके में बीजेपी की पकड़ ढीली पड़ी है, और पार्टी अब मैथिली के ज़रिए उसी भरोसे को फिर से साधने की कोशिश में है। उनकी सांस्कृतिक पहचान और निर्विवाद छवि उन्हें ब्राह्मण मतदाताओं के बीच एक स्वाभाविक विकल्प बनाती है। साल 2023 में बिहार चुनाव आयोग ने उन्हें “स्टेट आइकन” घोषित किया था, और उन्होंने मतदाता जागरूकता अभियान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था। यही सार्वजनिक स्वीकार्यता और जनसंपर्क अब उनके लिए सियासत की मजबूत पृष्ठभूमि तैयार कर रहे हैं — जहां एक लोकगायिका, जनता की आवाज़ बनकर राजनीति के मंच पर कदम रखने को तैयार दिख रही है।
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर दिल्ली में आयोजित नेशनल क्रिएटर्स अवॉर्ड्स में जब मैथिली ठाकुर को “कल्चर एंबेसडर ऑफ द ईयर” सम्मान मिला, तो उन्होंने मंच पर अपनी मधुर आवाज़ से भगवान शिव का भजन गाकर सबका दिल जीत लिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विशेष आग्रह पर दी गई उस प्रस्तुति ने सोशल मीडिया पर लाखों लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। Bihar Elections 2025
यही नहीं, अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के दौरान पीएम मोदी ने सार्वजनिक रूप से मैथिली ठाकुर के भजनों की प्रशंसा की थी, लिखते हुए कि “मैथिली की प्रस्तुति श्रीराम और मां शबरी की कथा को जीवंत कर देती है। बीजेपी अब इसी भावनात्मक और सांस्कृतिक जुड़ाव को राजनीतिक पूंजी में बदलने की रणनीति पर काम कर रही है — जहां मिथिला की बेटी मैथिली ठाकुर, मां सीता और राम मंदिर के प्रतीकात्मक संबंध के जरिए पार्टी के हिंदुत्व नैरेटिव को और गहराई दे सकती हैं। Bihar Elections 2025
हालांकि लोकप्रियता हमेशा राजनीति में स्वीकार्यता की गारंटी नहीं होती — और यही सवाल अब मिथिला में उठने लगे हैं। कुछ स्थानीय बुद्धिजीवी मानते हैं कि मैथिली ठाकुर की पहचान तो मिथिला की संस्कृति से जुड़ी है, लेकिन उनका ज़मीनी जुड़ाव उतना गहरा नहीं रहा। स्थानीय पत्रकार बिदेश्वर नाथ झा ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि मैथिली ठाकुर जब अपने गांव उड़ेन आती हैं, तो शायद ही कभी आम लोगों से खुलकर मिलती हैं। Bihar Elections 2025
वे मिथिला की परंपराओं पर गाती जरूर हैं, मगर उच्चैठ भगवती स्थान, गिरिजास्थान या विद्यापति डीह जैसे ऐतिहासिक स्थलों को अपने करोड़ों फॉलोअर्स तक पहुंचाने का प्रयास नहीं करतीं। झा का आरोप है कि मैथिली ने अब तक बेनीपट्टी या अपने गांव के विकास के लिए कोई ठोस पहल नहीं की है। ऐसे में सवाल उठता है — क्या सोशल मीडिया की लोकप्रियता और सांस्कृतिक पहचान किसी को सियासी ज़मीन पर भी उतनी ही मजबूती दे सकती है? Bihar Elections 2025