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बिहार की सियासत एक बार फिर अपने चरम पर है। हर गली, चौपाल और मंच पर एक ही सवाल गूंज रहा है नीतीश कुमार या तेजस्वी यादव… आखिर सत्ता की चाबी किसके हाथ जाएगी? लेकिन इस बार चुनावी गणित कुछ और कहानी कह रहा है। सत्ता का रास्ता नेताओं से ज्यादा जातीय समीकरणों से तय होगा, और इन समीकरणों में पांच प्रमुख जातियों की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में सरकार बनाने के लिए 122 विधायकों की जरूरत होती है। भाजपा-जदयू गठबंधन (एनडीए) और आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन (महागठबंधन) के बीच सियासी रस्साकशी जारी है, वहीं प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी चुनाव को त्रिकोणीय बनाने की कोशिश में जुटी है।
मगर टिकट वितरण से लेकर क्षेत्रीय रणनीति तक एक बात साफ हो चुकी है बिहार की राजनीति में इस बार भी पांच जातियां ही सत्ता का संतुलन तय करेंगी। Bihar Election
बिहार की राजनीति में यादव समुदाय सबसे प्रभावशाली माना जाता है। लगभग 14 प्रतिशत आबादी वाले इस वर्ग को हर चुनाव में सियासी दलों ने अपने पाले में करने की कोशिश की है। इस बार महागठबंधन ने 67 यादव उम्मीदवार, जबकि एनडीए ने 17 को टिकट दिया है। दानापुर, परसा और हिलसा जैसी सीटों पर यादव बनाम यादव मुकाबला देखने को मिल रहा है। पिछले चुनाव में यादव जाति के 52 विधायक जीते थे, जिनमें से 40 महागठबंधन से थे। यह आंकड़ा बताता है कि सत्ता के हर समीकरण में यादव अब भी “किंगमेकर” बने हुए हैं। Bihar Election
करीब 3 प्रतिशत आबादी वाला कोइरी समुदाय शहाबाद और मिथिलांचल क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखता है। इस बार एनडीए ने 22, जबकि महागठबंधन ने 23 कोइरी उम्मीदवार उतारे हैं। सिर्फ आरजेडी ने ही 13 टिकट कोइरी नेताओं को दिए हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में इस समुदाय के 16 विधायक जीते थे। आंकड़े बताते हैं कि कम संख्या के बावजूद यह जाति चुनावी समीकरण में निर्णायक भूमिका निभाती है।
राजपूतों की आबादी भले ही सिर्फ 2 प्रतिशत हो, लेकिन टिकट वितरण में उनका दबदबा स्पष्ट दिखता है। एनडीए ने 37, जबकि महागठबंधन ने 12 राजपूत उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं। 2020 के चुनाव में 27 राजपूत विधायक विजयी हुए थे। यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं बिहार में बिना राजपूतों की भूमिका के कोई भी सरकार टिक नहीं सकती।
भूमिहार समुदाय की आबादी भी लगभग 2 प्रतिशत ही है, लेकिन यह वर्ग टिकट वितरण और सत्ता दोनों में बराबर प्रभाव रखता है। इस बार एनडीए ने 32, जबकि महागठबंधन ने 15 भूमिहार उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। 2020 में 20 भूमिहार विधायक जीते थे, जो कुल विधानसभा का लगभग 10 प्रतिशत हिस्सा थे। इस बार भी मोकामा, बाढ़, और जहानाबाद जैसी सीटों पर भूमिहार उम्मीदवारों के बीच सीधी टक्कर देखने को मिलेगी। Bihar Election
मुसलमानों की आबादी बिहार में करीब 17 प्रतिशत है, जो किसी भी दल के लिए चुनावी गेम-चेंजर साबित हो सकती है। इस बार महागठबंधन ने 29 मुस्लिम उम्मीदवार, जबकि एनडीए ने सिर्फ 5 को टिकट दिया है। 2020 के चुनाव में 19 मुस्लिम विधायक जीते थे, जिनमें से कोई भी एनडीए से नहीं था। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण एक तरफ हुआ तो नतीजे पूरी तरह पलट सकते हैं। इन पांच जातियों - यादव, कोइरी, राजपूत, भूमिहार और मुसलमान की कुल आबादी 40 प्रतिशत से भी कम है, लेकिन इनकी राजनीतिक ताकत विधानसभा में 130 से अधिक सीटों तक फैली है। यही वजह है कि चाहे नीतीश कुमार हों या तेजस्वी यादव, बिना इन पांच जातियों के समर्थन के सत्ता की कुर्सी तक पहुंचना लगभग असंभव है। Bihar Election
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