साल 2020 में महज़ 43 सीटों पर सिमट गई नीतीश कुमार की पार्टी ने इस बार जोरदार वापसी की है और करीब 79 सीटों पर आगे चल रही है। यानी सत्ता के समीकरण में भाजपा के साथ-साथ जदयू भी पूरी मजबूती से साझीदार के तौर पर उभरती दिख रही है।

बिहार की सियासत में इस वक्त एनडीए की आंधी चल रही है। गठबंधन आराम से बहुमत की रेखा पार करता दिख रहा है और भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी के रूप में फ्रेम के बीचोंबीच दिखाई दे रही है। लेकिन इस दमदार प्रदर्शन के बावजूद असल चर्चा अब आंकड़ों से ज्यादा चेहरे की है – बिहार की बागडोर किसके हाथ में जाएगी? क्या भाजपा अपना कोई नया मुख्यमंत्री चेहरा पेश करेगी या फिर नीतीश कुमार को कोई अलग राष्ट्रीय भूमिका देकर समीकरण बदले जाएंगे? इन सारी अटकलों के बीच पटना की दीवारों पर चस्पा पोस्टर एक अलग ही मैसेज दे रहे हैं – “बिहार मतलब नीतीश कुमार”। भाजपा से जुड़े सूत्रों का भी दावा है कि तमाम कयासों के बाद अंततः मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के लिए नीतीश कुमार का नाम ही फाइनल माना जा रहा है। पिछले चुनाव की तुलना में एनडीए का ग्राफ इस बार कहीं ज्यादा ऊंचा गया है। भाजपा, जदयू और एलजेपी (रामविलास) – तीनों दल कई सीटों पर बढ़त बनाए हुए हैं। नीतीश कुमार की जदयू करीब 83 सीटों पर आगे चल रही है, जबकि भाजपा लगभग 90 सीटों पर बढ़त के साथ अपनी पकड़ मजबूत दिखा रही है। कुल 243 विधानसभा सीटों में से एनडीए 180 से 201 सीटों पर बढ़त बनाकर ऐसी जीत की तरफ बढ़ रहा है, जिसे राजनीतिक भाषा में “प्रचंड जनादेश” कहा जाता है।
चुनाव आयोग की वेबसाइट पर दोपहर तक मिले ताज़ा रुझान साफ़ इशारा कर रहे हैं कि बिहार में भाजपा–जदयू गठजोड़ की लहर चल रही है। भाजपा 101 में से लगभग 91 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है और दिल्ली, महाराष्ट्र, हरियाणा के बाद अब बिहार में भी उसका विजयरथ रुकता नजर नहीं आ रहा। दिलचस्प यह है कि इस बार मुकाबले की सबसे बड़ी कहानी जदयू के प्रदर्शन की भी है। साल 2020 में महज़ 43 सीटों पर सिमट गई नीतीश कुमार की पार्टी ने इस बार जोरदार वापसी की है और करीब 79 सीटों पर आगे चल रही है। यानी सत्ता के समीकरण में भाजपा के साथ-साथ जदयू भी पूरी मजबूती से साझीदार के तौर पर उभरती दिख रही है।
बिहार की सियासत में इस बार सबसे बड़ा झटका विपक्ष को लगा है। खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘हनुमान’ कहने वाले केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) 20 से ज्यादा सीटों पर बढ़त बनाकर मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है। इसके उलट, पिछली बार सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी राष्ट्रीय जनता दल (राजद) इस बार बुरी तरह पीछे छूटती दिख रही है– 140 से अधिक सीटों पर उम्मीदवार उतारने के बावजूद पार्टी 30 से कम सीटों पर ही सिमटती नजर आ रही है। उधर, 61 सीटों पर किस्मत आज़मा रही कांग्रेस की हालत भी बेहद कमजोर है, दहाई का आंकड़ा पार करना भी उसके लिए बड़ी चुनौती बना हुआ है।