मिश्रा-सिंह-झा और शर्मा का अब कोई गुजारा नहीं : विधायक मुन्ना यादव का जातिवादी जहर, राजद की A to Z राजनीति सवालों में
Bihar Elections
भारत
चेतना मंच
20 Jul 2025 01:17 PM
Bihar Elections : बिहार की सियासत में जाति की लपटें एक बार फिर धधक उठी हैं। चुनावी साल में राजनीतिक बयानबाजी का स्तर जितना नीचे गिर सकता है, फखऊ के राजद विधायक मुन्ना यादव ने शायद उसकी एक नई मिसाल पेश कर दी है। वायरल हो रहे वीडियो में मुन्ना यादव सवर्ण समाज को खुलेआम निशाने पर लेते हुए कहते हैं। अब बिहार में मिश्रा, सिंह, झा और शर्मा का कोई गुजारा नहीं, गद्दी पर सिर्फ बहुजन बैठेगा।
विवादास्पद टिप्पणी ने बिहार की सामाजिक एकता को ठेस पहुंचाई
इस विवादास्पद टिप्पणी ने न सिर्फ बिहार की सामाजिक एकता को ठेस पहुंचाई है, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल (RJD) की ए टू जेड वाली सर्वसमावेशी राजनीति के दावों पर भी गहरे सवाल खड़े कर दिए हैं। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद ने अब तक यह छवि गढ़ी थी कि वह सभी जातियों को साथ लेकर चलने वाली पार्टी है। लेकिन उनके ही विधायक जातीय उन्माद को हवा देकर क्या उसी छवि को नुकसान नहीं पहुंचा रहे?
बहुजन ही बिहार की गाड़ी पर बैठेगा, सीधा सवर्ण विरोध?
मुन्ना यादव की भाषा में आक्रोश नहीं, एक तरह का ऐलान नजर आता है। वह न सिर्फ सवर्णों को 'गुजारा न होने' की चेतावनी देते हैं, बल्कि चुनावी ललकार भी देते हैं। औकात है तो आओ चुनाव लड़ो! यह बयान न सिर्फ अमर्यादित है, बल्कि समाज को खांचों में बांटने की सियासत का खुला प्रदर्शन भी है।
क्या यह भूरा बाल साफ करो की वापसी?
लालू यादव के दौर में भूरा बाल साफ करो का नारा लंबे समय तक सवर्णों के खिलाफ सियासी रणनीति का हिस्सा रहा। आज वही मानसिकता फिर से जिदा होती दिख रही है। बस चेहरे बदल गए हैं। तब यह नारा राजनैतिक मजबूती का प्रतीक था, आज वही नीति सामाजिक विद्वेष का कारण बनती नजर आ रही है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या तेजस्वी यादव अपने विधायक के इस बयान पर कोई कार्रवाई करेंगे या चुप रहकर मौन समर्थन देंगे? अगर राजद सचमुच A to Z पार्टी है, तो फिर इस बयान की सार्वजनिक निंदा और अनुशासनात्मक कार्रवाई जरूरी है।
चुनावी फायदे के लिए सामाजिक बंटवारा?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि ये बयानबाजी सोची-समझी रणनीति हो सकती है। जातीय ध्रुवीकरण के जरिये कोर वोटबैंक को मजबूत करने की कोशिश। लेकिन यह खेल जितना चुनावी रूप से आकर्षक लगता है, उतना ही खतरनाक सामाजिक दृष्टि से है। मुन्ना यादव का बयान केवल एक व्यक्ति की जुबान नहीं, बल्कि एक सोच का प्रतिनिधित्व करता है। जो समाज को बांटती है, नफरत को खाद देती है और लोकतंत्र के मूल्यों को चुनौती देती है। यह बिहार की राजनीति के लिए खतरे की घंटी है। अगर समय रहते सख्त संदेश नहीं दिया गया, तो सामाजिक ताना-बाना गंभीर रूप से प्रभावित हो सकता है।