
बिहार विधानसभा चुनाव का बिगुल बज चुका है और सियासी पार्टियां अपनी-अपनी तैयारियों में जुट गई हैं। सबसे पहले मैदान में आरजेडी के तेजस्वी यादव उतरे। महीनों पहले ही उन्होंने जनता को बहकाने और लुभाने के लिए बड़े-बड़े वादों का बम फोड़ा—200 यूनिट मुफ्त बिजली, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में इजाफा, महिलाओं के लिए हर महीने 2,500 रुपये और हर घर में सरकारी नौकरी की गारंटी। Bihar Assembly Elections 2025
यह फार्मूला बिहार में नया नहीं, पहले दिल्ली की आम आदमी पार्टी, महाराष्ट्र की महायुति, मध्य प्रदेश की भाजपा और झारखंड की जेएमएम ने इसी के सहारे सत्ता का स्वाद चखा। तेजस्वी ने इसे बिहार में आजमाया और महागठबंधन का कुनबा भी बड़ा किया, लेकिन अब लगता है कि यह नुस्खा जनता के भरोसे को जीतने में पूरी तरह कारगर नहीं हो पा रहा। वादों की भीड़ के बीच जनता की समझदारी ने इस नायाब प्रयोग पर सवाल खड़े कर दिए हैं। Bihar Assembly Elections 2025
तेजस्वी यादव अपनी ‘चेंज मेकर’ यात्रा से जनता को आकर्षित कर रहे थे, लेकिन नीतीश कुमार ने कुशल रणनीति से उनका चुनावी खेल जमीन पर पटक दिया। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत 1.21 करोड़ ‘जीविका दीदियों’ के खातों में 10 हजार रुपये भेजकर उन्होंने तेजस्वी के बड़े वादों को चुनौती दी। तेजस्वी ने हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली देने का वादा किया, लेकिन नीतीश ने 125 यूनिट बिजली मुफ्त कर, 1.11 करोड़ लोगों को पहले ही लाभ दिला दिया। सामाजिक सुरक्षा पेंशन 400 से बढ़ाकर 1100 रुपए कर दी गई, महिलाओं के लिए नौकरी में डोमिसाइल नीति लागू की गई, और युवाओं के लिए यूवा आयोग की घोषणा पहले ही कर दी गई।
सबसे बड़ा वादा, हर घर के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने का, नीतीश ने अगले पांच साल में एक करोड़ लोगों को रोजगार देने के प्रस्ताव से पीछे छोड़ दिया। इन कदमों ने तेजस्वी के चुनावी नुस्खे की हवा पूरी तरह निकाल दी और दिखा दिया कि जमीनी काम और ठोस योजनाएं राजनीतिक वादों से कहीं अधिक असर करती हैं।
महागठबंधन में आरजेडी, कांग्रेस और वाम दलों के अलावा तीन और दलों को शामिल कर कुनबे को बढ़ाया गया, लेकिन समन्वय में पूरी तरह विफलता रही।
आरएलजेपी अलग हो गई।
वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी को भी संतोषजनक सीट नहीं मिली।
कांग्रेस ने सीटों के बंटवारे में देरी की, जिससे आरजेडी नाराज हुई।
फार्मूले के तहत कांग्रेस ने 8 सीटें छोड़ी, लेकिन आरजेडी ने सिर्फ एक सीट कम की।
इस असंतुलन ने महागठबंधन की चुनावी रफ्तार को धीमा कर दिया।
कांग्रेस और आरजेडी के बीच सीटों के बंटवारे में सख्त टकराव देखने को मिला। कई सीटों पर महागठबंधन के दो-दो उम्मीदवार खड़े हो गए। सीपीआई (एमएल) ने नियम का पालन किया, लेकिन अन्य वाम दलों ने तय सीमा से अधिक उम्मीदवार उतारकर स्थिति को जटिल बना दिया।
एनडीए ने प्रचार की शुरुआत कर दी। नीतीश कुमार मुजफ्फरपुर से अभियान शुरू कर चुके हैं, वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 24 अक्टूबर को बिहार आने वाले हैं। उम्मीदवारों के नामांकन के समय एनडीए के नेताओं ने अपनी ताकत दिखाई।इसके विपरीत, महागठबंधन के उम्मीदवारों को नेताओं का सक्रिय समर्थन नहीं मिला। राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की मौनता भी चिंता बढ़ा रही है। स्टार प्रचारकों की घोषणा जरूर हुई, लेकिन प्रचार की गति सुस्त और संगठन ढीला नजर आ रहा है। Bihar Assembly Elections 2025
महागठबंधन में पसरे सन्नाटे और प्रचार की सुस्ती ने यह सवाल पैदा कर दिया है कि क्या यह गठबंधन परिणाम आने से पहले ही थक गया है। सीधे हार कहना सही नहीं, लेकिन संकेत नकारात्मक हैं। भाजपा सांसद दिनेश शर्मा का कहना है कि तेजस्वी का करिश्मा फीका पड़ गया है और महागठबंधन ढहने की कगार पर है। C-Voter के सर्वे में तेजस्वी अभी भी सीएम पसंद के टॉप पर हैं, लेकिन पहले चरण का मतदान केवल 6 नवंबर को है। बिहार का प्रमुख पर्व छठ 26 से 28 अक्टूबर तक है, यानी महागठबंधन का प्रचार अभियान सीमित दिनों तक ही रह पाएगा। Bihar Assembly Elections 2025