बिहार में महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा पर रोक लगाने के उद्देश्य से 2016 में लागू की गई शराबबंदी को लेकर राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) की एक रिपोर्ट ने नई बहस छेड़ दी है।

Bihar News: बिहार में महिलाओं की सुरक्षा और घरेलू हिंसा पर रोक लगाने के उद्देश्य से 2016 में लागू की गई शराबबंदी को लेकर राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) की एक रिपोर्ट ने नई बहस छेड़ दी है। रिपोर्ट में नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के आधार पर दावा किया गया है कि शराबबंदी लागू होने के बाद राज्य में महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं आई। इसके उलट, 2024 तक ऐसे मामलों की संख्या 2012 के मुकाबले ढाई गुने से भी अधिक हो गई। Bihar News
NCAER की रिपोर्ट में 2012 से 2024 के बीच महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों का ट्रेंड सामने रखा गया है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2012 में करीब 11 हजार मामले दर्ज हुए थे, जो 2014 में बढ़कर करीब 15.5 हजार हो गए। 2016 में यह संख्या करीब 12 हजार रही, लेकिन इसके बाद फिर बढ़ोतरी देखने को मिली। 2021 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के करीब 18 हजार मामले दर्ज हुए। 2022 में यह संख्या करीब 20 हजार, 2023 में करीब 23 हजार और 2024 में करीब 28 हजार तक पहुंच गई। Bihar News
इन आंकड़ों से यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि महिलाओं के खिलाफ अपराध बढ़ने की वजह सिर्फ शराबबंदी है। अपराध के मामलों में वृद्धि के पीछे रिपोर्टिंग में बदलाव, महिलाओं में जागरूकता बढ़ना, शिकायत दर्ज कराने की बेहतर व्यवस्था और पुलिस तक पहुंच जैसे कई कारण हो सकते हैं।
इसलिए NCAER की रिपोर्ट के आंकड़े शराबबंदी के घोषित सामाजिक उद्देश्यों और उसके जमीनी असर को लेकर सवाल जरूर खड़े करते हैं, लेकिन इन्हें शराबबंदी के प्रभाव का अकेला प्रमाण नहीं माना जा सकता। रिपोर्ट का एक अहम पहलू नशे के बदलते पैटर्न से जुड़ा है। शराब की उपलब्धता पर रोक के बाद कुछ लोगों के दूसरे नशीले पदार्थों की ओर जाने की बात सामने आई है। इसमें अवैध शराब के साथ अन्य नशीले पदार्थों और ड्रग्स का इस्तेमाल भी शामिल है। खास तौर पर युवाओं में ‘सूखे नशे’ के बढ़ते चलन को लेकर चिंता जताई गई है। इससे यह सवाल उठता है कि क्या शराबबंदी के बाद नशे की समस्या खत्म होने के बजाय उसका स्वरूप बदल रहा है। Bihar News
शराबबंदी का असर राज्य के राजस्व पर भी पड़ा है। NCAER के पेपर के मुताबिक शराबबंदी से पहले के तीन वर्षों में शराब से मिलने वाला उत्पाद शुल्क बिहार के अपने राजस्व का करीब 14 प्रतिशत था। शराबबंदी लागू होने के बाद यह राजस्व स्रोत बंद हो गया। वहीं, शराबबंदी लागू करने, अवैध शराब की बिक्री रोकने और कानून का पालन कराने के लिए सरकार को प्रशासनिक और प्रवर्तन संबंधी खर्च भी उठाना पड़ा। Bihar News
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि अगर शराब पर ऐतिहासिक स्तर के आसपास उत्पाद शुल्क दोबारा लागू किया जाए तो बिहार अपने राज्य के राजस्व में करीब 14 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी वापस हासिल कर सकता है। हालांकि, शराबबंदी को लेकर कोई भी नीतिगत बदलाव केवल राजस्व के आधार पर तय नहीं किया जा सकता। इसके सामाजिक प्रभाव, महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नशे के दूसरे रूपों पर भी समान रूप से विचार करना होगा। Bihar News
विज्ञापन