लंबे वक्त तक एनडीए में ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाने के आदी नीतीश के लिए 2020 के नतीजे एक बड़ा झटका थे। तब चिराग पासवान के अलग चुनाव लड़ने और सीट बंटवारे के समीकरणों ने जेडीयू को करीब तीन दर्जन सीटों पर नुकसान पहुंचाया था।

बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को प्रचंड बहुमत मिल चुका है और नीतीश कुमार की अगुआई में एक बार फिर एनडीए ने सत्ता संभाल ली है। पहली कैबिनेट बैठक के फैसलों ने साफ कर दिया कि चुनावी दौर में जो वादे जनता से किए गए थे, अब अगले पांच साल उन्हें पूरा करने की कसौटी पर परखा जाएगा। लेकिन सत्ता में वापसी के साथ ही एनडीए, खासकर जेडीयू, अब एक दूसरी राजनीतिक रणनीति पर भी गंभीर मंथन में जुटा दिख रहा है। अब तक बीजेपी पर विपक्षी दलों को तोड़कर ‘ऑपरेशन लोटस’ चलाने के आरोप लगते रहे हैं, मगर इस बार चर्चा है कि बिहार की पटकथा में यह भूमिका जेडीयू खुद निभा सकती है। लक्ष्य साफ है – विधानसभा में अपनी संख्या बढ़ाकर जेडीयू को फिर से सूबे की नंबर वन पार्टी बनाना।
इस चुनाव में बिहार से कांग्रेस के 6 विधायक चुनकर आए हैं, जबकि असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के 5 विधायक विधानसभा पहुंचे हैं। पिछली बार भी AIMIM के 5 ही विधायक जीते थे, लेकिन अमौर से विधायक अख्तरुल ईमान को छोड़कर बाकी चार विधायक आरजेडी के खेमे में चले गए थे।जोकीहाट से मोहम्मद मुर्शेद आलम, कोचाधामन से मोहम्मद सरवर आलम, बहादुरगंज से तौसीफ आलम और बैसी से गुलाम सरवर ने तब ओवैसी का साथ छोड़कर आरजेडी की राह पकड़ ली थी। इस बार समीकरण कुछ और हैं। नीतीश कुमार के फिर से मुख्यमंत्री बनने और महागठबंधन की करारी हार के बाद माना जा रहा है कि AIMIM के विधायकों के सामने राजनीतिक विकल्प सीमित हो गए हैं। ऐसे में टूट की आशंका सबसे ज्यादा इन्हीं पर बताई जा रही है। उधर, चुनावी नतीजों के बाद कांग्रेस में जिस तरह से गुटबाजी और घमासान खुलकर सामने आया है, उससे उसके 6 विधायकों के पाला बदलने की अटकलें भी तेज हो गई हैं।
बिहार में मंत्रिपरिषद की अधिकतम संख्या 36 है। इनमें से फिलहाल मुख्यमंत्री सहित 27 मंत्रियों ने शपथ ली है। सरकार में बीजेपी कोटे से 14 मंत्री हैं, जिनमें दो उपमुख्यमंत्री भी शामिल हैं। इसके मुकाबले जेडीयू के हिस्से से अभी सिर्फ 8 चेहरों को ही जगह दी गई है। सरल गणित कहता है कि अगर बीजेपी के बराबर हिस्सेदारी का मानक लिया जाए, तो जेडीयू कोटे से 6 और नेताओं को मंत्री बनाया जा सकता है। यही 6 खाली कुर्सियां फिलहाल राजनीतिक गलियारों में सबसे ज्यादा चर्चा का कारण बनी हुई हैं। सवाल यह उठ रहा है कि जेडीयू ने ये पद फिलहाल खाली ही क्यों रखे? इसका जवाब राजनीतिक संदेशों में छिपा दिखता है। 2020 के चुनाव में जहां जेडीयू 43 सीटों तक सिमट गई थी, वहीं इस बार पार्टी ने छलांग लगाकर 85 सीटें हासिल कर ली हैं। दूसरी ओर, बीजेपी 89 विधायकों के साथ फिलहाल सबसे बड़ी पार्टी है। नीतीश कुमार की कोशिश अब यह बताई जा रही है कि अगर कुछ विधायक कांग्रेस और AIMIM से उनकी पार्टी में आते हैं, तो न सिर्फ जेडीयू की ताकत और बढ़ेगी, बल्कि वह संख्याबल के आधार पर फिर से ‘सबसे बड़ी पार्टी’ का तमगा हासिल कर सकती है। लंबे वक्त तक एनडीए में ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाने के आदी नीतीश के लिए 2020 के नतीजे एक बड़ा झटका थे। तब चिराग पासवान के अलग चुनाव लड़ने और सीट बंटवारे के समीकरणों ने जेडीयू को करीब तीन दर्जन सीटों पर नुकसान पहुंचाया था।
अगर इस बार भी कांग्रेस के विधायक टूटते हैं तो यह कोई पहली घटना नहीं होगी। पार्टी पहले भी बिहार में बड़े पैमाने पर टूट का सामना कर चुकी है और उस समय भी केंद्रीय किरदार नीतीश कुमार ही थे। 2017 में महागठबंधन से अलग होकर एनडीए में वापसी करने के बाद, नीतीश कुमार ने 2018 में कांग्रेस के भीतर बड़ी सेंधमारी की थी। उस समय प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहे अशोक चौधरी ने 1 मार्च 2018 को पार्टी छोड़कर जेडीयू की सदस्यता ले ली थी। उनके साथ कांग्रेस के तीन और एमएलसी – दिलीप कुमार चौधरी, तनवीर अख्तर और रामचंद्र भारती – भी जेडीयू में शामिल हो गए थे। जेडीयू में प्रवेश के कुछ ही समय बाद अशोक चौधरी को नीतीश कैबिनेट में जगह मिल गई। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस के 13 दूसरे नेताओं को भी जेडीयू से जोड़ दिया। एक ही झटके में कांग्रेस के 17 चेहरे जेडीयू खेमे में चले गए थे।अब जब नीतीश कुमार फिर से सत्ता की कमान संभाल चुके हैं और कैबिनेट में छह कुर्सियां संभाल कर रखी गई हैं, तो राजनीतिक हलकों में यही सवाल गूंज रहा है – क्या बिहार की राजनीति एक बार फिर कांग्रेस और AIMIM की नई ‘टूट’ की गवाह बनेगी, और क्या इस रणनीति के जरिए जेडीयू सचमुच विधानसभा की ‘नंबर वन’ पार्टी बनने का अपना सपना पूरा कर पाएगी?