जन्म जयंती : उन्होंने राष्ट्रपति भवन में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को राम कथा सुनाई थी!
भारत
चेतना मंच
25 Nov 2021 04:48 AM
काशी हिंदू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु धन जुटाने के लिए, जब पंडित महामना मदन मोहन मालवीय बरेली पहुंचे, तो पंडित राधेश्याम कथावाचक ने अपनी एक वर्ष की पूरी कमाई उन्हें दान में दे दी थी। ऐसा बहुत लोगों ने किया हो सकता है लेकिन उन बहुत लोगों में पंडित राधेश्याम कथावाचक जैसा कोई नहीं था। उनके जैसा कोई हो ही नहीं सकता था। बल्कि यह भी कहा जा सकता है कि उनके जैसा कोई होगा भी नहीं 'भूतो ना भविष्यति'।
पंडित राधेश्याम कथावाचक के गुरु थे महामना मदन मोहन मालवीय, उनके अभिन्न मित्र थे अभिनेता पृथ्वीराज कपूर और उद्योगपति घनश्याम दास बिड़ला उनके परम भक्त थे। आजाद हिंदुस्तान के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद में उन्हें दिल्ली राष्ट्रपति भवन में आमंत्रित कर पूरे 15 दिनों तक उनकी 'राम कथा' का आनंद लिया था। इतना ही नहीं आजादी से पूर्व पंडित मोतीलाल नेहरू ने उनकी रामकथा की शैली पर मुग्ध होकर उन्हें इलाहाबाद अपने निवास पर सादर बुलाकर 40 दिनों तक 'राम कथा' का श्रवण किया था। और तो और 1922 के लाहौर 'विश्व धर्म सम्मेलन' का शुभारंभ पंडित राधेश्याम के लिखे और गाए मंगलाचरण से ही हुआ था। उन्होंने महारानी लक्ष्मी बाई और कृष्ण सुदामा जैसी फिल्मों के लिए गीत भी लिखे थे।
25 नवंबर 1890 को उत्तर प्रदेश के बरेली शहर के बिहारीपुर मोहल्ले में पंडित बांकेलाल के यहां जन्में राधेश्याम ने मात्र 17 अट्ठारह वर्ष की आयु में सहज भाव से राधेश्याम रामायण की रचना कर सबको अचंभित कर दिया था पंडित राधेश्याम कथावाचक की राधेश्याम रामायण की लोकप्रियता का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके जीवनकाल 1890 से 1963 में ही उनकी हिंदी उर्दू में कुल मिलाकर पौने दो करोड़ से ज्यादा प्रतियां न केवल प्रकाशित हुई अपितु बिकी भी।
पंडित राधेश्याम कथावाचक ने 1914 में पारसी नाटक कंपनी न्यू एल्फ्रेड कंपनी के लिए 'वीर अभिमन्यु' नामक प्रसिद्ध नाटक लिखा। इस नाटक से पूर्व रंगमंच पर अधिकतर फारसी व अंग्रेजी प्रेम प्रसंगों वाले कुरूचि पूर्ण नाटकों का मंचन ही होता था। राधेश्याम कथावाचक के नाटक ने सुरुचिपूर्ण आदर्शवादी हिंदी पौराणिक नाटकों को मंच तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। पंडित राधेश्याम ने इन कंपनियों के लिए परिवर्तन, द्रोपदी, स्वयंवर, ईश्वर भक्ति, रुक्मिणी मंगल और श्री कृष्ण अवतार जैसे एक दर्जन नाटक लिखे। एक अन्य पारसी कंपनी के लिए लिखे 'उषा अनिरुद्ध' नाटक ने भी 'वीर अभिमन्यु' नाटक जैसी ही ख्याति अर्जित की।
पंडित राधेश्याम कथावाचक ने अपने जीवन काल में 57 पुस्तकें लिखीं और 175 से अधिक पुस्तकों का संपादन एवं प्रकाशन किया। पंडित राधेश्याम 45 वर्षों तक कथा वाचन, नाट्य लेखन-मंचन में संपूर्ण भारत में शीर्ष पर बने रहे। पंडित जी ने कथा वाचन की जो शैली विकसित की उसे 'राधेश्याम छंद' के नाम से प्रसिद्धि मिली। उनके द्वारा खड़ी बोली में रचित 'राधेश्याम रामायण' उनके जीवनकाल में ही सवा करोड़ परिवारों के पूजा स्थान तक पहुंच गई थी। 'राधेश्याम रामायण' आज भी हिंदी भाषी क्षेत्रों में लोकप्रिय है। पंडित राधेश्याम कथावाचक की जयंती पर महान विभूति को शत शत नमन!