जन्म जयंती : झांसी की रानी की परम सहयोगी थीं वीरांगना झलकारी बाई
भारत
चेतना मंच
22 Nov 2021 06:08 AM
विनय संकोची
आज रानी लक्ष्मीबाई की परम सहयोगी और उनकी सेना में महिला शाखा दुर्गा दल की सेनापति, महान स्वतंत्रता सेनानी, अदम्य साहसी, अद्भुत पराक्रमी, अपने रण कौशल से अंग्रेजों को नाकों चने चबाने के लिए विवश करने वाली, अमर वीरांगना झलकारी बाई की जन्म जयंती है। प्रसिद्ध साहित्यकार वृंदावन लाल वर्मा के ऐतिहासिक उपन्यास 'झांसी की रानी लक्ष्मीबाई' में झलकारी बाई की झलक कुछ यूं मिलती है-
(झलकारी) प्रात:काल के पहले ही हाथ मुँह धोकर तैयार हो गईं। पौ फटते ही घोड़े पर बैठीं और ऐठ के साथ अंग्रेज़ी छावनी की ओर चल दिया। साथ में कोई हथियार न लिया। चोली में केवल एक छुरी रख ली।
थोड़ी ही दूर पर गोरों का पहरा मिला। टोकी गयी….झलकारी ने टोकने के उत्तर में कहा, 'हम तुम्हारे जडैल के पास जाउता है।'
यदि कोई हिन्दुस्तानी इस भाषा को सुनता तो उसकी हँसी बिना आये न रहती। एक गोरा हिन्दी के कुछ शब्द जानता था। बोला, 'कौन?'
रानी - झाँसी की रानी, लक्ष्मीबाई, झलकारी ने बड़ी हेकड़ी के साथ जवाब दिया।
गोरों ने उसको घेर लिया। उन लोगों ने आपस में तुरंत सलाह की, 'जनरल रोज़ के पास अविलम्ब ले चलना चाहिए।' उसको घेरकर गोरे अपनी छावनी की ओर बढ़े।
शहर भर के गोरों में हल्ला फैल गया कि झाँसी की रानी पकड़ ली गयी। गोरे सिपाही ख़ुशी में पागल हो गये. उनसे बढ़कर पागल झलकारी थी।
उसको विश्वास था कि मेरी जाँच - पड़ताल और हत्या में जब तक अंग्रेज़ उलझेंगे तब तक रानी को इतना समय मिल जावेगा कि काफ़ी दूर निकल जावेगी और बच जावेगी…"
अट्ठारह सौ सत्तावन के पहले स्वतंत्रता संग्राम की चाचा हो और उसमें रानी लक्ष्मीबाई का नाम ना लिया जाए यह असंभव है। कहा जाता है कि झांसी की रानी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर झलकारी बाई ने भी अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी, हालांकि झलकारी बाई का नाम इतिहास की पुस्तकों में नहीं मिलता है। लेकिन यह सच है कि झलकारी बाई लक्ष्मी बाई की सेना की महिला शाखा की सेनापति थी।
झांसी के पास एक गांव है 'भोजला' जिसके निवासी दावा करते हैं कि झलकारी बाई उनके गांव में ही जन्मी थीं। उनका परिवार पेशे से बुनकर और बहुत गरीब था। झलकारी बाई के घराने के लोग कहते हैं कि आजादी के लिए झांसी की लड़ाई हम लोगों ने लड़ी है हमारा पूरा इतिहास है।
वैसे उस काल के अब तक मिले ऐतिहासिक दस्तावेजों में झलकारी बाई का नाम कहीं नहीं मिलता है। लेकिन केवल इस बात से यह प्रमाणित नहीं होता कि झलकारी बाई का अस्तित्व ही नहीं था। दरअसल गजट में आम लोगों का नाम नहीं होता है, उस समय तो झलकारी बाई आम महिला ही थी। यह भी कहा जाता है कि ब्रिटिश रिकॉर्ड में उन्हीं का वर्णन होता है, जो उनको महान लगते हैं, महत्वपूर्ण होते हैं या फिर जिनसे ब्रिटिश शासन घबराया रहता होगा। इन कारणों से झलकारी का नाम गजट में से गायब हो सकता है।
उस समय अपने देश में दलित वंचित समाज को सम्मान नहीं देने की परंपरा थी, इस बात का एहसास अंग्रेजों को भी था, इसलिए अंग्रेज भी उसी तरह उनको सम्मान देते थे। झलकारी वंचित समाज से थीं इसलिए अंग्रेजों ने भी उसका नाम गायब कर दिया होगा। लेकिन बुंदेलखंड की लोक स्मृतियों में झलकारी बाई को एक वीरांगना के रूप में स्थापित करने का प्रयास होता रहा है। झलकारी बाई का चरित्र समय के साथ इतना सशक्त हो गया था कि उन्होंने देश के बारे में सोचना शुरु कर दिया और अंततः देश पर अपने प्राण न्योछावर कर अमर हो गईं।
कहा जाता है कि जब 1857 के युद्ध में ब्रितानी सैनिकों का हमला हुआ तो उस समय झलकारी बाई ने रानी लक्ष्मी बाई को कहा कि अपने बच्चे को लेकर तुम भाग जाओ। मैं तुम्हारी शक्ल लेकर अंग्रेज़ों को रोके रखूँगी। अंग्रेज़ सोचेंगे कि लक्ष्मीबाई से लड़ रहे हैं लेकिन तुम जा चुकी होगी। लक्ष्मीबाई बन कर वे ब्रिटिश सैनिकों को धोखा देती रहीं। बहुत वीरता से लड़ीं। कोई पहचान नहीं पाया कि लक्ष्मीबाई नहीं हैं।