Birthday Special : 'डालडा-13' थीं देश की पहली महिला फोटो जर्नलिस्ट!
भारत
चेतना मंच
30 Nov 2025 10:31 AM
विनय संकोची
'डालडा-13'(Dalda -13) को पंडित जवाहरलाल नेहरु (Pt.Jawahar Lal Nehru) की फोटो खींचना बहुत पसंद था। उन्होंने 1947 में लाल किले पर फहराए गए तिरंगे की तस्वीर के साथ ही, लॉर्ड माउंटबेटन की विदाई और महात्मा गांधी तथा लाल बहादुर शास्त्री ( Lal Bahadur Shastri ) की अंतिम यात्रा की तस्वीरें भी अपने कैमरे में कैद की थीं।
'डालडा-13 देश की पहली महिला फोटोग्राफर होमी व्यारावाला का छद्म नाम था और उनका जन्म 9 दिसंबर 1913 को गुजरात के नवसारी में एक मध्यमवर्गीय पारसी परिवार में हुआ था। जिस समय कैमरे को ही लोग अचंभे से देखते देखते थे, ऐसे समय में किसी महिला के फोटोग्राफी का पेशा अपनाना, तो और भी ज्यादा आश्चर्य का विषय था। उनका पालन पोषण मुंबई में हुआ और उन्होंने फोटोग्राफी अपने मित्र मानेकशॉ व्यारावाला से सीखी थी। इसके बाद उन्होंने 'जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट' में दाखिला ले लिया।
होमी ने बतौर फोटो जर्नलिस्ट (Photo Journalist )कैरियर की शुरुआत 1930 में की और 1970 तक पूरे 40 वर्ष इस क्षेत्र में रहीं। इस बीच होमी ने देश विदेश में खूब नाम कमाया। बतौर फोटो जर्नलिस्ट होमी की पहली तस्वीर 'मुंबई क्रॉनिकल' में प्रकाशित हुई। उन्हें उस समय एक फोटो का एक रुपया पारिश्रमिक मिलता था। होमी अपने मित्र और टाइम्स ऑफ इंडिया के में बतौर फोटो जर्नलिस्ट मानेक शॉ जमशेदजी व्यारावाला से शादी कर ली और दिल्ली आ गईं। दिल्ली में उन्हें 'ब्रिटिश सूचना सेवा' में नौकरी मिल गई और इस दौरान होमी ने स्वतंत्रता आंदोलन की तस्वीरें खींचना शुरू कर दिया। होमी को अपने असाधारण काम की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली। 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना की अनेक तस्वीरें खींचकर खूब चर्चित हुईं।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान होमी व्यारावाला ने 'इलेस्ट्रेटिड वीकली ऑफ इंडिया' मैगजीन के लिए काम करना शुरू कर दिया था, जो सन् 1970 तक अनवरत चला। होमी के ज्यादातर फोटो उनके उपनाम 'डालडा-13' के नाम से प्रकाशित होते थे। 'डालडा-13' उपनाम के रखे जाने के पीछे भी रोचक कारण है। होमी का जन्म 1913 में हुआ था और उनका लकी नंबर 13 था। अपने होने वाले पति मानेकशॉ व्यारावाला से उनकी पहली मुलाकात 13 साल की उम्र में हुई थी। इतना ही नहीं उनकी पहली कार का नंबर 'डी.एल.डी. 13' था। कार के इसी नंबर की वजह से होमी का नाम 'डालडा-13' पड़ गया था।
होमी बहुत प्रतिभाशाली फोटोग्राफर थीं। उन्होंने अपने कैमरे के माध्यम से राष्ट्र के तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक जीवन को दिखाने का महत्वपूर्ण कार्य किया था। पंडित जवाहरलाल नेहरू को वे कैमरे के लिए आदर्श ऑब्जेक्ट मानती थीं। पंडित नेहरू की सिगरेट पीते हुए तस्वीर के अलावा आज जो तस्वीरें देश के प्रथम प्रधानमंत्री की हम देखते हैं वह लगभग सभी होमी द्वारा कैमरे में उतारी गई थीं। सन 1970 में पति के निधन के बाद होमी ने फोटो जर्नलिज्म को अलविदा कह दिया। सन 1982 में अपने बेटे फारुख के पास पिलानी (राजस्थान) चली गईं, जो पिलानी बिट्स में पढ़ रहा था। सन 1989 में बेटे की कैंसर से मौत के बाद वह एकदम अकेली हो गईं। सन 2011 में भारत के दूसरे सबसे बड़े सम्मान 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। होमी ने अपने अकेलेपन के साथ अंतिम समय वडोदरा के एक छोटे से घर में बिताया। 15 जनवरी 2012 को होमी व्यारावाला का देहांत हो गया।