
अमरेंद्र कुमार राय
Book Review: साल 2022 बीतने वाला है और 2023 शुरू होने वाला। इस अवसर पर “अमर भारती साहित्य संस्कृति संस्थान’ ने बीत रहे साल को विदाई देने और नए साल के स्वागत में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। उसमें मैं भी पहुंचा। कार्यक्रम में एक पुस्तक का अनौपचारिक विमोचन हुआ। किताब का नाम है गीत तुम्हीं संगीत तुम्हीं। इस किताब से मैं पहले से ही परिचित हूं। मुझे ऐसा लगा कि मैं जहां-जहां जाता हूं यह किताब मेरे पीछे-पीछे चली आती है। जहां मैं जाता हूं वहीं चले आते हो...... के अंदाज में। लेकिन यह सच नहीं है। सच यह है कि यह किताब जहां जा रही है उसके पीछे-पीछे मैं चला जा रहा हूं।
इस किताब के लेखक रमेश कुमार भदौरिया “सत्यमन” हैं। देखने में बिलकुल ही साधारण व्यक्ति। लेकिन असाधारण प्रतिभा वाले। एक बार किसी कार्यक्रम में इनको बोलते देखा, सुना। संगीत पर बोल रहे थे। प्रभावित हुआ। सोचा कभी अलग से मिलकर बात करेंगे। फोन नंबर लिया पर न बात की न मिल पाया। काफी समय बाद किसी मित्र के घर पर एक छोटा कार्यक्रम आयोजित हुआ तो उसमें भदौरिया जी भी थे। उनसे फिर मुलाकात हुई। यहां उन्होंने एक गीत सुनाया। गीत भी काफी अच्छा था। इनके संगीत पर भाषण की ही तरह प्रभावित करने वाला। वहां यह भी पता चला कि ये वाणिज्यकार विभाग में असिस्टेंट कमिश्नर थे। वहां जो इन्होने गीत सुनाया था वह गीत भी इस किताब में है।
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अमरेंद्र कुमार राय[/caption]
मैं आम तौर पर साहित्यिक कार्यक्रमों मे नहीं जाता। क्योंकि न कविता लिखता हूं न आलोचना करता हूं। एक दिन एक मित्र ने ऐसे ही एक साहित्यिक कार्यक्रम में आने का आमंत्रण दिया। जगह भदौरिया जी के घर बताई। मैंने सोचा जिस व्यक्ति से मैं इतने लंबे समय से मिलना चाहता रहा हूं, उससे मुलाकात का इससे अच्छा अवसर फिर नहीं मिलेगा। पहुंच गया। वहां पहुंचा तो यह किताब पहले से वहां रखी हुई थी। तुरत-तुरत छप कर आई थी। इसीलिए मैंने कहा कि जहां-जहां मैं जाता हूं वहां वहां यह पुस्तक नहीं पहुंच जाती है बल्कि जहां जहां यह पुस्तक पहुंच रही है वहां-वहां मैं भी पहुंच जा रहा हूं।
जैसा कि मैंने बताया भदौरिया जी साधारण आदमी हैं। इस पुस्तक को भी आप देखें तो आप पायेंगे कि इसका विषय भी साधारण ही है। आम जन का ही है। आम जन के जीवन में घर-परिवार, समाज, यारी-दोस्ती, नैतिकता-अनैतिकता, प्रेम भाव आदि होता है। इस पुस्तक में भी यही सब है। यह पुस्तक छह हिस्सों में बंटी हुई है। पहले हिस्से में भदौरिया जी और इस संग्रह के बारे में विशिष्ट जनों की राय है। दूसरा खंड स्तुति भाव है। विद्य़ा की देवि सरस्वती, बिघ्नहर्ता गणेश, शिव और बंसी वाले को गीतों में पिरोया गया है। तीसरा हिस्सा समाज भाव है। चौथा-नैतिकता/दर्शन भाव, पांचवां प्रेम भाव और छठां परिवार भाव है।
भदोरिया जी देखने में जरूर साधारण व्यक्ति हैं लेकिन असाधारण प्रतिभा के धनी हैं। विनम्र हैं लेकिन असिस्टेंट कमिश्नर रह चुके हैं। प्रशासनिक पद पर रह कर भी कविता और संगीत के प्रति अटूट लगाव रहा है। इसीलिए रिटायरमेंट के बाद इन्होंने अपने घर पर संगीत का विद्यालय खोला। वहां ये बच्चों और महिलाओं को संगीत की शिक्षा देते हैं। इसके लिए इन्होंने रिटायरमेंटट के बाद कई जगह शिक्षा ग्रहण की और डिग्री हासिल की है। कविता लेखन के साथ ही गायकी में इनको महारथ हासिल है। इसीलिए जब ये अपनी कविताओं का गायन करते हैं तो उनका अलग ही भाव और रूप निखर कर सामने आता है। संगीत और कवि लोग आम तौर पर अपने कार्यक्रमों की शुरूआत देवि सरस्वती की वंदना से करते हैं। आम तौर पर वह वंदना भी संस्कृत मे या संस्कृतनिष्ठ भाषा में होती है। लेकिन भदौरिया जी ने उसे बहुत ही सहज भाषा में रखा है। जैसे- मां भारती दे दिव्य वर....मन के सकल अज्ञान हर...तम दूर कर आलोक कर, अव्यक्त को तू व्यकत कर, प्रज्ञा प्रखर, शिक्षा शिखर, मां भारती दे दिव्य वर....।
भदौरिया जी ने विषय जरूर साधारण चुने हैं लेकिन उन विषयों में इन्होंने बहुत ही असाधारण चीजें पिरोई हैं। जैसे समाज भाव खंड में एक कविता है भोर की सैर। इस कविता में पहले सुबह का वर्णन है। बादल कैसे हैं, हवा कैसी चल रही है, उसका शरीर पर कैसा प्रभाव पड़ रहा है और कैसे सूर्य की लालिमा फूट रही है। लेकिन उसी में परफ्यूमों में चली महकती सुघड़ शिक्षिकाएं देखो, शीघ्र पहुंचना है विद्यालय त्वरित चपलताएं देखो, योगा जाते कुछ वृद्धों ने देखा उनको कनखी से, मर्यादा का भान हुआ तो दृष्टि हटा ली जल्दी से जैसी चुटकी भी ली गई है। इतना ही नहीं... प्रेमी युगल दिखा इक मुझको निकट पार्क के कोने में, खुसुर-फुसुर में लीन मिलन के सपने मधुर संजोने में, भी दिखा।
मुझे इस पुस्तक का नाम बहुत ही पसंद आया। गीत तुम्हीं, संगीत तुम्हीं। बचपन में प्राथमिक विद्यालय में प्रार्थना किया करते थे त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधु च सखा त्वमेव। यानी माता भी तुम्ही हो और पिता भी तुम्हीं। भाई भी तुम्हीं हो और सखा भी तुम्हीं। यह ईश्वर के लिए की गई प्रार्थना है। जैसे ही सुना गीत तुम्हीं, संगीत तुम्हीं वही पुरानी प्रार्थना याद आई। त्वमेव माता....लेकिन वह प्रार्थना तो ईश्वर के लिए थी यह किसके लिए। मन में भाव उठा शायद प्रेमिका या पत्नी के लिए हो। भदोरिया जी से मजाक में पूछा भी किसके लिए है। मुस्कराये लेकिन चुप रहे। इस पुस्तक में गीत तुम्हीं संगीत तुम्हीं की तर्ज पर दो कविताएं हैं। एक सपनों के मनमीत तुम्हीं हो और एक है ज्ञान सिंधु नवनीत तुम्हीं हो। लेकिन दोनों में से कोई भी कविता प्रेमिका या पत्नी के लिए नहीं है। एक कविता देवि सरस्वती के लिए है तो एक कविता और कवि कर्म के लिए है। आप कह सकते हैं कि एक कविता गीत के लिए है तो दूसरी कविता संगीत के लिए है।
इनके अलावा इस संग्रह में कुछ और भी कविताएं बहुत अच्छी हैं। है पक्ष अलौकिक पितृ पक्ष, कैसे कह दें सही पथ पर हम जा रहे, आम आदमी, मित्रता का अर्थ, तेरा मन एक दर्पण है, जीवन धारा अविरल बहती, अपनी कविता किसे सुनाऊं, ओ मेरे मनमीत बता दे आदि बहुत ही अच्छी कविताएं हैं। भदौरिया जी जब गीत तुम्हीं संगीत तुम्ही हो की दोनों कविताएं, जीवन धारा अविरल बहती और अपनी कविता किसे सुनाऊं गाते हैं तो सामने बैठे श्रोता खुद ब खुद उनका साथ देने लगते हैं। कुछ वैसे ही जैसे रेडियो पर गीत सुनकर आप भी उस गीत को साथ-साथ गुनगुनाने लगते हैं। ये उन कविताओं की ताकत है।
(इस आलेख के लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)