Political News : गौतमबुद्धनगर में बसपा की ‘घुटती सांसों’ को कैसे मिलेगी ‘संजीवनी’
How will the 'choking breath' of BSP get 'Sanjivani' in Gautam Buddha Nagar?
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 03:50 AM
- अरविंद प्रसाद
गौतमबुद्धनगर। उत्तर प्रदेश की धाकड़ मुख्यमंत्री रहीं मायावती (Mayawati) के समय में जिस बहुजन समाज पार्टी (BSP) की गौतमबुद्धनगर में धमक थी, आज वह पार्टी 'संजीवनी' तलाश रही है। आज गौतमबुद्धनगर में गुटबाजी ने बसपा का सारा रंग फीका कर दिया है।
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बसपा सुप्रीमो व उप्र की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कड़े संघर्ष और चुनौतियों का सामना कर दलित नेता कांशीराम (Kanshiram) द्वारा स्थापित बहुजन समाज पार्टी को उत्तर प्रदेश में एक मजबूत राजनैतिक दल बनाया था। उत्तर प्रदेश सहित देश के कई अन्य राज्यों में मायावती ने एक बड़े दलित नेता के रूप में अपनी पहचान स्थापित की। देश के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव ने उन्हें ‘लोकतंत्र का चमत्कार’ कहा था। वर्ष-1993 में कांशीराम ने जब समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया तो 1995 में मायावती पहली बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं। वह भारत की अनुसूचित जाति की पहली महिला मुख्यमंत्री थीं। 1997 और 2002 में वह भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के बाहरी समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं। दूसरी बार वर्ष-2003 में केवल एक वर्ष के लिए मायावती प्रदेश की मुख्मयंत्री बनी।
समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) से वर्ष-2012 के विधानसभा चुनाव में हार के बाद उन्होंने 7 मार्च 2012 को मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया और राज्यसभा चली गईं। 2012 के बाद उत्तर प्रदेश के साथ ही गौतमबुद्धनगर में बसपा का रंग फीका होता चला गया। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के बाद उप्र में भारतीय जनता पार्टी की आंधी चली और इस आंधी में कांग्रेस के साथ ही बसपा के भी तिनके बिखर गए। हालांकि सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इन दिनों अकेले ही भाजपा से लोहा ले रहे हैं, लेकिन कभी राजनीति की धुरी बन चुकी मायावती ने अपने हथियार भाजपा के सामने डाल दिये हैं।
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मायावती ने अब सारे गुणा-भाग लगाकार घोषणा की है कि आगामी लोकसभा और विधानसभा का चुनाव उनकी पार्टी अकेले ही लड़ेगी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी का पूरा हुलिया बदलने का प्लान है। मायावती के भतीजे आनंद कुमार की सलाह पर बसपा में अधिक से अधिक युवाओं को मौका देने की तैयारी है। शायद मायावती यह परखना चाहती हैं कि उनकी पार्टी की साख जनता में कितनी बची है।
अब बात करें गौतमबुद्धनगर की तो यहां बहुजन समाज पार्टी शून्यता की ओर तेजी से बढ़ रही है। आज कोई भी दमदार नेता नहीं बचा है, जो पार्टी को मजबूती के साथ फिर खड़ा कर सके। बसपा के कई दिग्गज नेता साथ छोडक़र भाजपा व अन्य राजनैतिक दलों में जाकर अपना भविष्य तलाश रहे हैं।
लगभग 9 वर्ष पूर्व गौतमबुद्धनगर से बसपा सांसद रहे सुरेन्द्र नागर का टिकट काटकर हरौला निवासी सतीश अवाना को दिया गया था। पार्टी के इस फैसले के बाद सुरेन्द्र नागर समाजवादी पार्टी में शामिल होकर राज्यसभा गये और फिर इन दिनों भाजपा के कोटे से राज्यसभा से सांसद हैं। बसपा को छोड़ने वाले नेताओं का सिलसिला पार्टी के गिरते जनाधार के साथ लगातार जारी है। पार्टी को अब तक दादरी से बसपा के दो बार विधायक रहे सतवीर गुर्जर, वरिष्ठ नेता व पूर्व मंत्री वेदराम भाटी, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष विरेन्द्र डाढा, पूर्व चेयरमैन रविन्द्र भाटी, पूर्व प्रत्याशी नरेन्द्र डाढा, किठौर विधानसभा से पूर्व प्रत्याशी व जिला पंचायत की पूर्व चेयरमैन जयवती नागर के पति गजराज नागर, पूर्व जिला पंचायत सदस्य व गौतमबुद्धनगर बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एडवोकेट रामशरण नागर, दादरी से बसपा के पूर्व प्रत्याशी इन्द्रवीर भाटी, कर्मवीर नागर सहित कई ऐसे नाम हैं, जो बसपा से अपना नाता तोड़ चुके हैं। अब पार्टी में केवल पुराने नामों में करतार नागर व मनवीर भाटी ही बचे हैं। गौतमबुद्धनगर के पूर्व जिलाध्यक्ष लख्मी सिंह भी इन दिनों सक्रिय नहीं हैं। उन्हें पार्टी ने एक लाख नये सदस्य जोड़ने के टारगेट को पूरा न करने तथा पूर्व में मिली कई शिकायतों के आधार पर जिलाध्यक्ष के पद से हटाकर अक्टूबर माह में नया प्रभारी दीपक बौद्ध को बनाया है। लेकिन, नये जिलाध्यक्ष ने भी पार्टी में दीमक की तरह फैली गुटबाजी के आगे हथियार डाल दिये हैं।
बसपा से जुड़े नेताओं ने नाम न छापने के अनुरोध पर बताया कि पुराने व नये कार्यकर्ता को जोड़ने में नये जिलाध्यक्ष को काफी दिक्कतें आ रही हैं। खासकर नये सदस्य बनाने के टारगेट को पूरा करना उनके लिए 'टेढ़ी खीर' है। बसपा पिछले कई सालों से जनहित से जुड़े मुद्दों से अपने को अलग कर बैठी है। केवल सोशल मीडिया और बयानबाजी तक ही बसपा नेता व उसका कैडर सीमित है। ऐसे में पार्टी को कहां से संजीवनी मिलेगी, यह बड़ा सवाल है?
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