चंदूभाई विरानी की सफलता की यह कहानी हर किसी को प्रेरणा दे सकती है। यह परम सत्य है कि एक सिनेमा घर की कैंटीन में केवल 90 रूपए महीना की नौकरी करने वाले चंदूभाई विरानी इन दिनों पाँच हजार करोड़ रूपए की प्रसिद्ध कंपनी के मालिक हैं।

Chandubhai Virani : चंदूभाई विरानी ने जो किया है वह काम किसी चमत्कार से कम नहीं है। चंदूभाई विरानी एक समय मात्र 90 रूपए महीना की एक छोटी सी नौकरी करते थे। वहीं चंदूभाई विरानी वर्तमान में 5000 करोड़ रूपए की कंपनी के मालिक हैं। चंदूभाई विरानी की सफलता की यह कहानी हर किसी को प्रेरणा दे सकती है। यह परम सत्य है कि एक सिनेमा घर की कैंटीन में केवल 90 रूपए महीना की नौकरी करने वाले चंदूभाई विरानी इन दिनों पाँच हजार करोड़ रूपए की प्रसिद्ध कंपनी के मालिक हैं।
हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों को प्रेरणा देने वाले चंदूभाई विरानी केवल 10वीं तक पढ़े हैं। 10वीं पास चंदूभाई विरानी ही वह व्यक्ति हैं जो भारत के प्रमुख स्नैक ब्रांड बालाजी वेफर्स के मालिक हैं। बाला जी चिप्स के नाम से वेफर्स बनाने वाली कंपनी की वर्तमान मार्किट वैल्यू पाँच हजार करोड़ रूपए से अधिक की है। बालाजी वेफर्स के मालिक चंदूभाई विरानी का परिचय हम विस्तार से बता रहे हैं। इस परिचय को पढऩे वालों को भी चंदूभाई विरानी की सफलता की इस कहानी से बड़ी प्रेरणा मिलेगी।
चंदूभाई विरानी मूल रूप से गुजरात प्रदेश के राजकोट के रहने वाले हैं। वर्ष-1972 में 15 साल की उम्र में चंदूभाई विरानी अपने भाईयों के साथ राजकोट से गुजरात के जामनगर जिले के घुंडोराजी में चले गए थे। चंदूभाई विरानी के दो भाई थे। मेघजीभाई और भिखूभाई। उनके पिता स्वर्गीय पोपट विरानी ने अपनी बंजर जमीन बेच दी थी। उन्होंने अपने बेटों को अपना जीवन शुरू करने में मदद करने के लिए 20,000 रुपये दिए थे। इस पैसे का इस्तेमाल करके भाइयों ने राजकोट में कृषि उत्पादों और फार्म उपकरणों के व्यापार का एक छोटा व्यवसाय शुरू किया। दुर्भाग्य से यह उद्यम दो साल के भीतर ही विफल हो गया। स्थिर आय के बिना जीवन बहुत कठिन होने लगा। भाइयों को कोई भी काम खोजने के लिए मजबूर होना पड़ा। व्यवसाय के पतन के बाद चंदूभाई और उनके भाइयों ने राजकोट के एस्ट्रां सिनेमा की कैंटीन में काम करना शुरू कर दिया। चंदूभाई को प्रति माह केवल 90 रुपये मिलते थे। वह दरवाजा संभालने से लेकर पोस्टर चिपकाने और दर्शकों को रास्ता दिखाने तक सब कुछ करते थे। कभी-कभी चंदूभाई स्थानीय गुजराती स्नैक 'चोराफारी' की एक प्लेट के बदले सिनेमाघर की फटी सीटों की मरम्मत भी करते थे।
सिनेमा कैंटीन में काम करते हुए चंदूभाई ने देखा कि आलू के वेफर्स फिल्म देखने वालों के बीच बहुत लोकप्रिय थे। उन्होंने इस अवसर को पहचाना। उन्होंने अपने घर के आंगन में लगभग 10,000 रुपये के निवेश से एक छोटा सा शेड स्थापित किया। उन्होंने एक कमरे वाले घर में चिप्स बनाने के साथ प्रयोग करना शुरू कर दिया। उनके चिप्स जल्दी ही लोकप्रिय हो गए। यह लोकप्रियता न केवल सिनेमा हॉल के अंदर बल्कि बाहर भी फैली। जैसे-जैसे मांग बढ़ी चंदूभाई ने 1989 में राजकोट के अजी जीआईडीसी में गुजरात की तत्कालीन सबसे बड़ी आलू वेफर निर्माण इकाई स्थापित की। इसके लिए उन्होंने 50 लाख रुपये का बैंक कर्ज लिया था। 1992 में तीनों भाइयों ने आधिकारिक तौर पर बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की। कंपनी का नाम उनके कमरे में रखी भगवान हनुमान की एक छोटी सी मूर्ति के नाम पर रखा गया था।वर्तमान समय में बालाजी वेफर्स भारत के शीर्ष स्नैक ब्रांडों में से एक है। यह चार कारखानों का संचालन करती है। इनकी उत्पादन क्षमता बहुत ज्यादा है। कंपनी सालाना 65 लाख किलोग्राम आलू और 100 लाख किलोग्राम नमकीन का प्रसंस्करण करती है। यह हर घंटे 3,400 किलोग्राम चिप्स का उत्पादन करती है। भारत के 43,800 करोड़ रुपये के स्नैक बाजार में 12 फीसदी हिस्सेदारी के साथ बालाजी वेफर्स देश की तीसरी सबसे बड़ी स्नैक कंपनी बन गई। कंपनी का कारोबार हजारों करोड़ में पहुंच चुका है। चंदूभाई विरानी की सफलता की यह कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है। Chandubhai Virani