भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश बने जस्टिस गवई, आज ली शपथ
Chief Justice :
भारत
RP Raghuvanshi
01 Dec 2025 07:22 PM
Chief Justice : भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश (CJI) के रूप में जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई ने 14 मई 2025 को शपथ ली है, जो भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। वे पहले बौद्ध और दूसरे दलित समुदाय से आने वाले व्यक्ति हैं, जिन्होंने इस सर्वोच्च पद को प्राप्त किया है। उनका कार्यकाल 24 नवंबर 2025 तक रहेगा। जस्टिस गवई ने अपने न्यायिक करियर में कई महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय दिए हैं।
न्यायिक सफर और पृष्ठभूमि
जस्टिस गवई का जन्म 24 नवंबर 1960 को महाराष्ट्र के अमरावती में हुआ था। उन्होंने अमरावती विश्वविद्यालय से वाणिज्य और कानून की पढ़ाई पूरी की। 1985 में वकालत की शुरुआत करने के बाद, उन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट और नागपुर बेंच में स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस की। वे सरकारी वकील और सार्वजनिक अभियोजक के रूप में भी कार्यरत रहे। 14 नवंबर 2003 को बॉम्बे हाईकोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त हुए और 24 मई 2019 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बने। सुप्रीम कोर्ट में अपने कार्यकाल के दौरान, वे लगभग 700 बेंचों का हिस्सा रहे और 300 से अधिक निर्णय लिखे, जिनमें कई संवैधानिक पीठों के फैसले शामिल हैं।
प्रमुख निर्णय
जस्टिस गवई ने अपने न्यायिक करियर में कई महत्वपूर्ण मामलों में निर्णय दिए हैं:
नोटबंदी (2016) : उन्होंने 2023 में उस बहुमत निर्णय को लिखा, जिसमें केंद्र सरकार की नोटबंदी योजना को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया गया था।
बुलडोजर न्याय के खिलाफ दिशानिर्देश : उन्होंने एक निर्णय में स्पष्ट किया कि केवल अपराध के आरोप में किसी की संपत्ति को बिना कानूनी प्रक्रिया के ध्वस्त करना असंवैधानिक है।
अनुच्छेद 370 का निरसन : वे उस संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करने के केंद्र सरकार के निर्णय को वैध ठहराया।
एससी-एसटी आरक्षण में उप-श्रेणीकरण : उन्होंने उस 7-सदस्यीय पीठ में भाग लिया, जिसने अनुसूचित जाति और जनजाति आरक्षण में 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा को मान्यता दी।
इलेक्टोरल बॉन्ड : वे उस संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने चुनावी फंडिंग के प्रावधानों को सूचना के अधिकार कानून का उल्लंघन मानते हुए असंवैधानिक ठहराया।
विचार और दृष्टिकोण
शपथ ग्रहण से पहले, जस्टिस गवई ने संविधान की सर्वोच्चता पर बल देते हुए कहा था कि न तो संसद और न ही न्यायपालिका सर्वोच्च है, बल्कि संविधान सर्वोच्च है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि सेवानिवृत्ति के बाद वे कोई राजनीतिक पद स्वीकार नहीं करेंगे, जिससे उनकी न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता की प्रतिबद्धता स्पष्ट होती है।
सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता
जस्टिस गवई ने सामाजिक और राजनीतिक न्याय के लिए अपने समर्पण को बार-बार दोहराया है। डॉ. भीमराव अंबेडकर की विचारधारा से प्रेरित होकर, वे न्यायपालिका में समावेशिता और विविधता को बढ़ावा देने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जस्टिस गवई का कार्यकाल भारतीय न्यायपालिका में सामाजिक न्याय, समावेशिता और संवैधानिक मूल्यों को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।