भारत कोई धर्मशाला नहीं जहां सभी शरणार्थियों को रहने की इजाजत मिलेगी
Citizenship
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 06:11 PM
Citizenship : 19 मई 2025 को, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक श्रीलंकाई तमिल नागरिक की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने भारत में स्थायी रूप से बसने की अनुमति मांगी थी। यह व्यक्ति 2015 में लिबरेशन टाइगर्स आॅफ तमिल ईलम (लिट्टे) से जुड़े होने के संदेह में गिरफ्तार किया गया था और गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया था। 2018 में उसे 10 साल की सजा सुनाई गई थी, जिसे 2022 में मद्रास उच्च न्यायालय ने घटाकर 7 साल कर दिया था। उच्च न्यायालय ने सजा पूरी होने के बाद उसे भारत छोड़ने का आदेश दिया था।
यह कोई "धर्मशाला" नहीं है जहाँ दुनिया भर से शरणार्थियों को रखा जा सके
सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन शामिल थे, ने याचिकाकर्ता की दलीलों को अस्वीकार करते हुए कहा कि भारत 140 करोड़ की आबादी के साथ पहले से ही संघर्ष कर रहा है और यह कोई "धर्मशाला" नहीं है जहाँ दुनिया भर से शरणार्थियों को रखा जा सके। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि संविधान का अनुच्छेद 19 केवल भारतीय नागरिकों पर लागू होता है और विदेशी नागरिकों को भारत में बसने का कोई अधिकार नहीं है।
गुहार : वापस भेजा गया तो उसकी जान को खतरा
याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि उसकी पत्नी और बच्चे भारत में रह रहे हैं और यदि उसे श्रीलंका वापस भेजा गया तो उसकी जान को खतरा है। हालांकि, अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि वह किसी अन्य देश में शरण लेने का प्रयास कर सकता है। यह निर्णय भारत की वर्तमान आव्रजन और शरणार्थी नीति को दर्शाता है, जिसमें विदेशी नागरिकों को भारत में स्थायी रूप से बसने की अनुमति देने के लिए सख्त मानदंड अपनाए गए हैं, विशेषकर जब वे आतंकवाद या सुरक्षा से संबंधित मामलों में दोषी ठहराए गए हों।