पुण्यतिथि : सचमुच अनमोल रत्न थे 'भारत रत्न' महर्षि कर्वे
भारत
चेतना मंच
01 Dec 2025 08:59 PM
विनय संकोची
आधुनिक भारत के सबसे बड़े समाज सुधारक और उद्धारक महर्षि कर्वे की आज पुण्यतिथि है। अपना संपूर्ण जीवन विधवा उद्धार एवम् महिला शिक्षा को समर्पित कर देने वाले महर्षि कर्वे का वास्तविक नाम धोंडो केशव कर्वे था। उन्होंने अपना सारा जीवन विभिन्न आंदोलनों और संघर्षों के बीच समाजसेवा करते बिताया।
महर्षि कर्वे का जन्म 18 अप्रैल 1858 को महाराष्ट्र के जिला रत्नागिरी के मरूड नामक कस्बे में बेहद गरीब परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम केशवपंत और माता का नाम लक्ष्मी बाई था। उनकी आरंभिक शिक्षा में मरूड में हुई, इसके बाद सतारा में पढ़े। फिर मुंबई विश्वविद्यालय से गणित विषय में बीए की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद एलफिंस्टन स्कूल में अध्यापक हो गए। महर्षि कर्वे का विवाह 14 वर्ष की आयु में 8 वर्षीय राधाबाई के साथ हो गया था। जब उन्होंने बीए पास किया तब उनका पुत्र ढाई वर्ष का था। घर का खर्च चलाने के लिए एलफिंस्टन स्कूल में अध्यापन के साथ-साथ लड़कियों के दो हाईस्कूलों में अंशकालिक काम भी करते थे। बाद में प्रख्यात स्वतंत्रता सेनानी गोपाल कृष्ण गोखले के आग्रह पर पूना के मशहूर फर्ग्युसन कॉलेज में अध्यापक बन गए, जहां उन्होंने 23 वर्ष तक सेवा कार्य करने के उपरांत 1914 में अवकाश ग्रहण किया।
महर्षि कर्वे हिंदू विधवाओं की दयनीय -शोचनीय स्थिति देखकर मुंबई में पढ़ते समय ही विधवा विवाह के घोर समर्थक बन गए थे। उनकी पत्नी का देहांत उनके मुंबई प्रवास के दौरान हो गया था। 11 मार्च 1893 को उन्होंने अपने मित्र की विधवा बहन गोडूबाई से दूसरा विवाह कर विधवा विवाह संबंधी प्रतिबंध को चुनौती दी। इस अपराध के लिए उन्हें बहुत कष्ट सहने पड़े, यहां तक की मरूड में उन्हें समाज से बहिष्कृत कर दिया गया। उनके परिवार पर भी तरह तरह के प्रतिबंध लगा दिए गए।
महर्षि कर्वे ने 'विधवा विवाह संघ' की स्थापना तो की लेकिन जल्द ही उनकी समझ में आ गया कि इक्का दुक्का विधवा विवाह करने से विधवाओं का भला होने वाला नहीं है। उन्हें लगा कि यदि विधवाओं को शिक्षित कर अपने पैरों पर खड़ा किया जाए तो उनका ज्यादा भला हो सकता है। इसके साथ महर्षि कर्वे ने 1896 में 'अनाथ बालिकाश्रम एसोसिएशन' बनाया और जून 1900 में पूना के निकट हिंगणे नामक स्थान में छोटा मकान बनाकर 'अनाथ बालिकाश्रम' की स्थापना की। इसके बाद 4 मार्च 1960 को महर्षि कर्वे ने 'महिला विद्यालय' की स्थापना की, जिसका अपना भवन चार साल बाद 1911 में बना।
काशी के विद्वान बाबू शिवप्रसाद गुप्त की प्रेरणा से महर्षि कर्वे ने 'महिला विश्वविद्यालय' की स्थापना का संकल्प लिया, जिसका स्वागत महात्मा गांधी ने भी किया। 1916 में महर्षि कर्वे के अथक प्रयासों से पूना में 'महिला विश्वविद्यालय' की नींव पड़ी, जिसका पहला कॉलेज 16 जुलाई 1916 को 'महिला पाठशाला' के नाम से खुला और महर्षि कर्वे उसके पहले प्रिंसिपल बने। परंतु धन की आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने पद त्याग दिया और विश्वविद्यालय के लिए धन जुटाने निकल पड़े। उन्होंने विश्वविद्यालय कोष में 2 लाख 21हजार रुपए जमा किए। इसी बीच मुंबई के उद्योगपति सर विट्ठलदास दामोदर ठाकरसी ने इस विश्वविद्यालय को 15 लाख रुपए दान दिए। तब इस विश्वविद्यालय का नाम सेठ की माताजी के नाम पर 'श्रीमती नत्थीबाई दामोदर ठाकरसी' (एसएनडीटी) रखा गया और कुछ वर्ष बाद इसे पूना से मुंबई स्थानांतरित कर दिया गया।
70 वर्ष की आयु में महर्षि कर्वे विश्वविद्यालय के लिए धन संग्रह करने यूरोप, अमेरिका और अफ्रीका भी गए थे। सन् 1936 में गांवों में शिक्षा प्रचार के लिए महर्षि कर्वे ने 'महाराष्ट्र ग्राम प्राथमिक शिक्षा समिति' की स्थापना कर विभिन्न गांवों में 40 प्राथमिक विद्यालय खोले। आजादी के बाद उन्हें सरकार ने संभाल लिया।
1942 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय ने महर्षि कर्वे को डी. लिट्. की उपाधि प्रदान की।1954 में उनके अपने महिला विश्वविद्यालय ने उन्हें एल.एल.डी. की उपाधि दी। 1955 में भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मविभूषण' से अलंकृत किया और 100 वर्ष की आयु पूरी हो जाने पर, 1957 में मुंबई विश्वविद्यालय ने उन्हें एल.एल.डी. की उपाधि से प्रदान की। 1958 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान 'भारतरत्न' से विभूषित किया। डाक तार विभाग ने महर्षि कर्वे के सम्मान में एक डाक टिकट जारी कर उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट की। 9 नवम्बर 1962 को 104 वर्ष की आयु में महर्षि कर्वे का निधन हो गया।