पुण्यतिथि : धारा 370 के विरुद्ध बिगुल बजाने वाले पहले नेता थे प्रकाशवीर शास्त्री!
भारत
चेतना मंच
23 Nov 2021 05:59 AM
विनय संकोची
जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने से जहां पूरा देश खुश हुआ, वहीं पंडित प्रकाशवीर शास्त्री की आत्मा को भी जरूर शांति मिली होगी, जिन्होंने निर्दलीय सांसद के रूप में 55 वर्ष पूर्व धारा 370 हटाए जाने का विधेयक पहली बार संसद में पेश किया था। आज (23 नवंबर) पंडित प्रकाशवीर शास्त्री की पुण्यतिथि है।
11 मार्च 1964 और फिर 18 मार्च 1966 को धारा 370 हटाने का विधेयक पेश करते हुए पंडित प्रकाशवीर शास्त्री ने अपने वक्तव्य में कहा था - 'दल और चुनावों से देश बड़ा होता है। हम लोग चले जाएंगे लेकिन यदि हमने यह ऐतिहासिक भूल आज नहीं सुधारी तो आने वाली पीढ़ियां हमें कभी माफ नहीं करेंगी।'
संस्कृत के विद्वान प्रखर वक्ता व आर्य समाजी नेता और तीन बार के निर्दलीय सांसद पंडित प्रकाशवीर शास्त्री हमेशा राष्ट्र चिंतन में लीन रहते थे। सन् 1957 से पहले पंजाब में केवल अंग्रेजी और गुरुमुखी ही अधिकृत घोषित भाषा थीं, शास्त्री जी ने आंदोलन चलाकर हिंदी भाषा को पंजाब में लागू करवाया। 30 दिसंबर 1923 को उत्तर प्रदेश के गांव रहरा में जन्मे शास्त्री जी किशोरावस्था से ही राजनीति से जुड़ गए। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से एम ए किया। बाद में गुरुकुल वृंदावन के कुलपति बने। शास्त्री की उपाधि बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से प्राप्त हुई।
स्वामी दयानंद सरस्वती और आर्य समाज के सिद्धांतों के प्रति पूरी तरह आस्थावान पंडित प्रकाशवीर शास्त्री ने हिंदी, धर्मांतरण, अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों तथा अन्य अनेक ज्वलंत समस्याओं पर बेबाक विचार व्यक्त किए। शास्त्री जी ही थे जिन्होंने 1957 में आर्य समाज द्वारा संचालित हिंदी आंदोलन में प्राण फूंक दिए थे। 1958 में निर्दलीय सांसद के रूप में चुनकर लोकसभा पहुंचे पंडित प्रकाशवीर शास्त्री संयुक्त राज्य संगठन में हिंदी बोलने वाले पहले भारतीय थे, जबकि दूसरे अटल बिहारी वाजपेई की थे। अटल जी कहा करते थे - 'शास्त्री जी मुझसे अच्छे वक्ता हैं।'
लोग प्रकाशवीर शास्त्री को 'वाणी का जादूगर' कहते थे। आर्य समाज के उपदेशक के रूप में उनकी पूरे देश में ख्याति थी। शास्त्री जी इतना ओजस्वी व्याख्यान देते थे कि व्याख्यान के लिए उनकी देश के विभिन्न भागों से मांग आती थी।
उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि तीनों ही बार उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ा और तीनों ही बार में जीत हासिल की। एक बार राज्य सभा के सदस्य रहे।
सबसे पहले वह वह गुड़गांव में 1958 में हुए मध्यावधि चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में शेर चुनाव चिन्ह से लड़कर वह पहली बार सांसद बने। इसके बाद 1962 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने बिजनौर संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप शेर चुनाव चिह्न पर लड़ा और भारी मतों से जीत दर्ज की। साथ ही बिजनौर का पहला निर्दलीय सांसद बनने का गौरव भी प्राप्त किया। वर्ष 1967 में हापुड़ (गाजियाबाद) संसदीय क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ा और वहां रिपब्लिकन पार्टी के बुद्धप्रिय मौर्य को पराजित कर सांसद चुने गये। हापुड़ से दूसरी बार चुनाव हार गए थे प्रकाशवीर शास्त्री जी किसी लोकसभा से दुबारा चुनाव नही लड़े। 1974 में वे कांग्रेस के सहयोग से वह राज्यसभा सांसद चुने गए।
राजस्थान उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की पुत्री के विवाह समारोह से ट्रेन से वापस आते समय 23 नवंबर 1977 को रिवाड़ी में ट्रेन दुर्घटना में उनका निधन हो गया था।