पुण्यतिथि: पं॰ श्रद्धाराम शर्मा, जिन्होंने 'ओम जय जगदीश हरे' आरती की रचना की थी!
भारत
RP Raghuvanshi
24 Jun 2022 03:06 PM
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24 Jun 2022 03:06 PM
विनय संकोचीपं॰ श्रद्धाराम शर्मा (Pt. Shraddharam Sharma) एक प्रसिद्ध ज्योतिषी थे, किन्तु एक ज्योतिषी के रूप में उन्हें वह प्रसिद्धि नहीं मिली, जो इनके द्वारा लिखी गई अमर आरती 'ओम जय जगदीश हरे' के कारण मिली। सम्पूर्ण भारत में पं॰ श्रद्धाराम शर्मा द्वारा लिखित 'ओम जय जगदीश हरे' आरती गाई जाती है। श्रद्धाराम शर्मा जी ने इस आरती की रचना 1870 ई. में की थी। पं॰ श्रद्धाराम की विद्वता और भारतीय धार्मिक विषयों पर उनकी वैज्ञानिक दृष्टि के लोग कायल हो चुके थे। जगह-जगह पर उनको धार्मिक विषयों पर व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया जाता था और हजारों की संख्या में लोग उनको सुनने आते थे। वे लोगों के बीच जब भी जाते अपनी लिखी 'ओम जय जगदीश हरे' आरती गाकर सुनाते। उनकी आरती सुनकर लोग बेसुध से हो जाते। आरती के बोल लोगों की जुबान पर ऐसे चढ़े कि पीढियाँ गुजर जाने के बाद भी उनके शब्दों का जादू आज भी कायम है।
पंडित जी सनातन धर्म प्रचारक, ज्योतिषी, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और संगीतज्ञ होने के साथ-साथ हिन्दी और पंजाबी के प्रसिद्ध साहित्यकार भी थे। अपनी विलक्षण प्रतिभा और ओजस्वी वाक्पटुता के बल पर उन्होंने पंजाब में नवीन सामाजिक चेतना एवं धार्मिक उत्साह जगाया था, जिससे आगे चलकर आर्य समाज के लिये पहले से निर्मित एक उर्वर भूमि मिली।
क़रीब डेढ़ सौ वर्ष में मंत्र और शास्त्र की तरह लोकप्रिय हो गई "ओम जय जगदीश हरे" आरती जैसे भावपूर्ण गीत की रचना करने वाले पं॰ श्रद्धाराम शर्मा का जन्म ब्राह्मण कुल में 30 सितम्बर, 1837 में पंजाब के जालंधर ज़िले में लुधियाना के पास एक गाँव फुल्लौर में हुआ था। उनके पिता जयदयाल स्वयं एक धार्मिक प्रकृति के विद्वान ज्योतिषी थे। ज्योतिषी पिता ने अपने बेटे का भविष्य पढ़ लिया था और भविष्यवाणी की थी कि 'ये बालक अपनी लघु जीवन में चमत्कारी प्रभाव वाले कार्य करेगा।'
बचपन से ही श्रद्धाराम शर्मा की ज्योतिष और साहित्य के विषय में गहरी रुचि थी। उन्होंने वैसे तो किसी प्रकार की शिक्षा हासिल नहीं की थी, परंतु उन्होंने मात्र सात वर्ष की उम्र में ही गुरुमुखी सीख ली और दस वर्ष की उम्र में संस्कृत, हिन्दी, फ़ारसी तथा ज्योतिष आदि की पढ़ाई शुरू कर दी। कुछ ही वर्षों में वे इन सभी विषयों के निष्णात हो गए। उनका विवाह एक सिक्ख महिला महताब कौर के साथ हुआ था।
पं. श्रद्धाराम ने पंजाबी (गुरुमुखी) में 'सिक्खां दे राज दी विथियाँ' और 'पंजाबी बातचीत' जैसी पुस्तकें लिखीं। अपनी पहली ही किताब 'सिखों दे राज दी विथियां' से वे पंजाबी साहित्य के पितृपुरुष के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। इस पुस्तक में तीन अध्याय हैं। इसके अंतिम अध्याय में पंजाब की संस्कृति, लोक परंपराओं, लोक संगीत आदि के बारे में विस्तृत जानकारी दी गई थी। अंग्रेज सरकार ने तब होने वाली आईसीएस की परीक्षा के कोर्स में इस पुस्तक को शामिल किया था। यह कोई साधारण बात नहीं थी।
उन्होंने धार्मिक कथाओं और आख्यानों का उद्धरण देते हुए अंग्रेजी राज के खिलाफ जनजागरण का ऐसा वातावरण तैयार कर दिया कि अंग्रेजी सरकार की नींद उड़ गई। 1865 में ब्रिटिश सरकार ने उनको उनके ही गांव फुल्लौर से निष्कासित कर दिया और आसपास के गाँवों तक में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गई। लेकिन उनकी लिखी किताबें स्कूलों में पढ़ाई जाती रही, उस पर कोई पाबंदी नहीं लगाई गई। अमृतसर से लेकर लाहौर तक उनके चाहने वाले थे इसलिए इस निष्कासन का उन पर कोई असर तो हुआ नहीं, बल्कि उनकी लोकप्रियता में चार चांद और लग गए। लोग उनकी बातें सुनने को और उनसे मिलने को उत्सुक रहने लगे। इसी दौरान उन्होंने हिन्दी में ज्योतिष पर कई किताबें भी लिखी। पं॰ श्रद्धाराम के क्रांतिकारी विचारों से बेहद प्रभावित एक इसाई पादरी फादर न्यूटन के हस्तक्षेप से अंग्रेज सरकार को थोड़े ही दिनों में उनके निष्कासन का आदेश वापस लेना पड़ा। पं॰ श्रद्धाराम ने पादरी के कहने पर बाइबल के कुछ अंशों का गुरुमुखी में अनुवाद भी किया था। पं॰ श्रद्धाराम ने अपने व्याख्यानों से लोगों में अंग्रेज सरकार के खिलाफ क्रांति की मशाल ही नहीं जलाई बल्कि साक्षरता के लिए भी शानदार काम किया। उनका 1877 में 'भाग्यवती' नामक एक उपन्यास प्रकाशित हुआ, जिसे हिंदी का पहला उपन्यास कहा जाता है।
पंडित जी की लगभग दो दर्जन रचनाओं का पता चलता है, जो संस्कृत, हिंदी, उर्दू और पंजाबी में थीं। अधिकांश रचनाएँ गद्य में हैं। वे 18 वीं शताब्दी उत्तरार्ध के हिंदी और पंजाबी के प्रतिनिधि गद्यकार हैं। उनके हिंदी गद्य में खड़ी बोली की प्रधानता है। कहीं-कहीं उर्दू और पंजाबी का पुट भी है। पंजाबी गद्य दो शैलियों में उपलब्ध है। 'सिक्खाँ दे इतिहास दी विथियाँ' में सरल, गंभीर तथा अलंकारविहीन भाषा का प्रयोग हुआ है। इसमें दुआबी और मालवी का मिश्रित रूप उपलब्ध होता है। 'पंजाबी बातचीत' में मुहावरेदार और व्यंग्यपूर्ण भाषा का प्रयोग हुआ है। उनकी पद्यरचना अधिक नहीं हैं। प्रारंभ में उन्होंने हिंदी काव्यरचना हेतु ब्रजभाषा को अपनाया था, किंतु खड़ी बोली को जनोपयोगी समझकर वे उस ओर प्रवृत्त हुए। उनके भजनों में खड़ी बोली ही देखने को मिलती है। उत्तर भारत के वैष्णव जन पूजा के समय उनकी प्रसिद्ध आरती (जय जगदीश हरे। स्वामी जय जगदीश हरे। भगत जनों के संकट छिन में दूर करें....) आज भी श्रद्धा से गाते हैं।
पं॰ श्रद्धाराम जी ने 24 जून, 1881 ई. को लाहौर में अंतिम सांस ली थी।