पुण्यतिथि विशेष : सैद्धांतिक शिक्षा के पक्षधर नहीं थे स्वामी विवेकानंद!
भारत
चेतना मंच
04 Jul 2022 02:52 PM
विनय संकोची'हमें ऐसे शिक्षा की आवश्यकता है जिसके द्वारा चरित्र का निर्माण होता है, मस्तिष्क की शक्ति बढ़ती है, बुद्धि का विकास होता है और मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है।'
ये शब्द हैं स्वामी विवेकानन्द के जिनकी आज पुण्यतिथि है। स्वामी जी मैकाले द्वारा प्रतिपादित और उस समय प्रचलित अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था के घोर विरोधी थे। वह ऐसी शिक्षा चाहते थे, जिससे बालक का सर्वांगीण विकास हो सके।
स्वामी विवेकानन्द ने प्रचलित शिक्षा को 'निषेधात्मक शिक्षा' की संज्ञा देते हुए कहा कि आप उस व्यक्ति को शिक्षित मानते हैं जिसने कुछ परीक्षाएं उत्तीर्ण कर ली हों तथा जो अच्छे भाषण दे सकता हो, पर वास्तविकता यह है कि जो शिक्षा जनसाधारण को जीवन संघर्ष के लिए तैयार नहीं करती, जो चरित्र निर्माण नहीं करती, जो समाज सेवा की भावना विकसित नहीं करती तथा जो शेर जैसा साहस पैदा नहीं कर सकती, ऐसी शिक्षा से क्या लाभ?
सच तो यही है कि स्वामी विवेकानंद सैद्धान्तिक शिक्षा के पक्षधर नहीं थे, वे व्यावहारिक शिक्षा को व्यक्ति के लिए उपयोगी मानते थे। स्वामी जी शिक्षा द्वारा बालकों को लौकिक एवं पारलौकिक दोनों जीवन के लिए तैयार करने के पक्षधर थे।
स्वामी विवेकानन्द चाहते थे कि शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास होने के साथ बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भर बने।
स्वामी जी चाहते थे कि बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा दी जाए और धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा दी जानी चाहिए। इसके साथ ही स्वामी जी चाहते थे कि पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान दिया जाना चाहिए। स्वामी विवेकानंद के अनुसार शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए, सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जाना चाहिए और मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए। इसी के साथ स्वामी जी यह भी चाहते थे कि शिक्षा ऐसी हो जो सीखने वाले को जीवन संघर्ष से लड़ने की शक्ति दे।
स्वामी विवेकानंद के शिक्षा पर विचार क्रांतिकारी हैं, एक स्थान पर उन्होंने लिखा है–
'शिक्षा क्या है? क्या वह पुस्तक-विद्या है? नहीं! क्या वह नाना प्रकार का ज्ञान है? नहीं, यह भी नहीं। जिस संयम के द्वारा इच्छाशक्ति का प्रवाह और विकास वश में लाया जाता है और वह फलदायक होता है, वह शिक्षा कहलाती है।'
स्वामी जी चाहते थे कि शिक्षा का उपयोग चरित्र-गठन के लिए किया जाना चाहिए, इस विषय में विवेकानंद कहते हैं-'शिक्षा का अर्थ यह नहीं है कि तुम्हारे दिमाग़ में ऐसी बहुत-सी बातें इस तरह ठूँस दी जायँ, जो आपस में, लड़ने लगें और तुम्हारा दिमाग़ उन्हें जीवन भर में हज़म न कर सके। जिस शिक्षा से हम अपना जीवन-निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र-गठन कर सकें और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने योग्य है। यदि तुम पाँच ही भावों को हज़म कर तदनुसार जीवन और चरित्र गठित कर सके हो तो तुम्हारी शिक्षा उस आदमी की अपेक्षा बहुत अधिक है, जिसने एक पूरी की पूरी लाइब्रेरी ही कण्ठस्थ कर ली है।'
देश की उन्नति–फिर चाहे वह आर्थिक हो या आध्यात्मिक–में स्वामी शिक्षा की भूमिका केन्द्रिय मानते थे। सन् 1900 में लॉस एंजिल्स, कैलिफ़ोर्निया में दिए गए एक व्याख्यान में स्वामी जी ने कहा था- 'हमारी सभी प्रकार की शिक्षाओं का उद्देश्य तो मनुष्य के इसी व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत हम केवल बाहर से पालिश करने का ही प्रयत्न करते हैं। यदि भीतर कुछ सार न हो तो बाहरी रंग चढ़ाने से क्या लाभ? शिक्षा का लक्ष्य अथवा उद्देश्य तो मनुष्य का विकास ही है।'