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2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 38 दोषियों को दी गई मौत की सजा को बरकरार रखा है।

Ahmedabad Serial Blasts : 2008 के अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामले में गुजरात हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 38 दोषियों को दी गई मौत की सजा को बरकरार रखा है। अदालत ने निचली अदालत के फैसले पर मुहर लगाते हुए 11 अन्य दोषियों की उम्रकैद की सजा भी कायम रखी। यह मामला देश के सबसे बड़े आतंकवाद से जुड़े मुकदमों में शामिल रहा है। गुजरात हाईकोर्ट के फैसले पर जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने प्रतिक्रिया देते हुए इसे अप्रत्याशित और निराशाजनक बताया है। उन्होंने कहा कि इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी और दोषियों की कानूनी पैरवी के लिए वरिष्ठ आपराधिक वकीलों की मदद ली जाएगी।
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मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता सुप्रीम कोर्ट से मौत की सजा पर रोक हासिल करना है। उन्होंने दावा किया कि इससे पहले भी कई मामलों में निचली अदालतों और हाईकोर्ट के फैसलों के बाद सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। उन्होंने अक्षरधाम मंदिर हमले के मामले का उदाहरण देते हुए कहा कि उस मामले में भी निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसले के बाद सुप्रीम कोर्ट में आरोपियों को राहत मिली थी। मदनी का कहना है कि इसी आधार पर अहमदाबाद ब्लास्ट मामले में भी न्याय की उम्मीद है।
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26 जुलाई 2008 को अहमदाबाद में सिलसिलेवार बम धमाके हुए थे। करीब 70 मिनट के भीतर हुए इन धमाकों में 56 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 200 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। जांच एजेंसियों ने इस मामले में कई राज्यों से आरोपियों को गिरफ्तार किया था।
विशेष अदालत ने फरवरी 2022 में 49 आरोपियों को दोषी ठहराया था। इनमें से 38 को मौत की सजा और 11 को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। गुजरात हाईकोर्ट ने अब इस फैसले को बरकरार रखा है।
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जमीयत उलमा-ए-हिंद का कहना है कि वह इस मामले में आगे भी कानूनी लड़ाई लड़ेगी। संगठन ने दावा किया कि पहले भी कई मामलों में अपील के जरिए आरोपियों को राहत मिली है और इस मामले में भी सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद जताई जा रही है। अहमदाबाद ब्लास्ट केस देश के सबसे चर्चित आतंकी मामलों में से एक रहा है। इस मामले में लंबे समय तक सुनवाई चली और दोषियों के खिलाफ हत्या, साजिश और आतंकी गतिविधियों से जुड़े गंभीर आरोप लगाए गए थे।
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