
Deendayal Upadhyay : आज प्रसिद्ध विचारक और चिंतक पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्यतिथि है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके अलावा आम से खास भाजपाई भी पंडित दीनदयाल को श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है। ऐसे में यह जानना बेहद जरुरी हो जाता है कि पंडित दीनदयाल कौन थे, जिनके आम से लेकर खास भाजपाई तक मुरीद है। आइए जानते हैं...
जब जब भारत में भारतीय जनसंघ या भारतीय जनता पार्टी सत्ता में रही तो पंडित दीनदयाल उपाध्याय का अक्सर जिक्र होता रहा है। आज उनकी पुण्यतिथि है। कई लोग उन्हें भाजपा का गांधी भी कहते हैं। दार्शनिक और विचारक के रूप में प्रसिद्ध पंडित दीनदयाल भारतीय जनसंघ के सह-संस्थापकों में से एक थे और उनके बारे में यह भी कहा जाता है कि उनकी असमय मृत्यु ने देश में बहुत बड़े बदलावों को आने से रोक दिया था।
कब हुआ था पंडित जी का जन्म पंडित दीन दयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा के नागदा के ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह स्थान आज दीनदयाल धाम के नाम से जाना जाता है। उनके मामा-मामी ने सीकर में उनका लालन पालन किया था। कानपुर में उन्होंने बीए और आगरा में अंग्रजी साहित्य में एमए की पढ़ाई की। 1937 में वे राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से और 1952 में जनसंघ के महामंत्री बनाए गए।
जनसंघ से जुड़ने के बाद दीनदयाल उपाध्याय के मार्गदर्शन में पार्टी का संगठन चलता रहा, अपने निधन से 43 दिन पहले उन्होंने जनसंघ का अध्यक्ष पद संभाला था। जनसंघ के जनता पार्टी में विलय के बाद बने राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी पर पंडित जी की विचारधारा का असर आज भी दिखाई देता है। यहां तक कि कहा तो यह भी जाता है कि जिस जनसंघ में आने दशकों लग गए, वह काम पहले ही हो जाता यदि पंडित जी कुछ और साल जिंदा रहते।
जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कभी कहा था ‘मुझे दो दीनदयाल दे दो, मैं भारत की सूरत बदलकर रख दूंगा।’ कहा जाता है कि राम मनोहर लोहिया और पंडित जी ने मिल कर देश को कांग्रेस से बेहतर विकल्प देने के लिए काम करने के प्रयास करना शुरू किया और पंडित जी के जनसंघ के अध्यक्ष बनने वाले साल में पहली बार ऐसा हुआ कि भारत के राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों के बनने का सिलसिला शुरू हुआ।
दीन दयाल उपाध्याय की सोच दीनदयाल उपाध्याय का राजनीतिक दर्शन एकात्म मानववाद जैसी अवधारणा पर आधारित जीसे वे जनता तक पहुंचाने में सफल रहे। चुनाव जीतने की जगह वे अपने राजनीतिक दर्शन को लोगों के बीच ले जाने चाहते थे। जिससे दूसरे राजनीतिक दलों से अलग और स्पष्ट अपनी एक अललग पहचान बना सकें। उनका मानना था समाज के निर्माण से ही राष्ट्र का निर्माण हो सकता है। वे भारतीय मूल्यों के आधार पर देश में एक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे के निर्माण के समर्थक थे।
यह सोच बहुत कारगर थी जिसमें कार्यकर्ता को बहुत महत्व दिया जाता था। आज भाजपा की सफलता का यही कारण बताया जाता है जिसके पास देश में सबसे मजबूत कार्यकर्ता संगठन है। राजनैतिक जानकार मानते हैं कि पंडित दीन दयाल उपाध्याय की सानिध्य जनसंघ को और मिलता तो वे बेशक देश को कांग्रेस के मजबूत विकल्प देने में सफल हो जाते, लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
दीन दयाल उपाध्याय की मृत्यु उनके विचारों की तरह कम चर्चित नहीं थी। यह भी कह सकते हैं कि उनकी मृत्यु बहुत ही रहस्यमय परिस्थितियों में हुई जिसके कारणों पर आज भी बहस होती है और इस पर भी मंथन किया जाता है कि वे कुछ साल और जीवन जी लेते तो शायद आज देश की तस्वीर ही कुछ और होती। पंडित दीन दयाल उपाध्याय का शव 11 फरवरी 1968 में वाराणसी के करीब मुगलसराय जंक्शन लावारिस स्थिति में पाया गया था। उनकी संदिग्ध हालात में हुई मौत का रहस्य कभी सामने नहीं आ पाया। जिन लोगों को उनकी हत्या करने की सजा हुई उनका इरादा चोरी का बताया गया। लेकिन इससे शायद ही किसी को तसल्ली हुई और उनकी मौत तो रहस्य ही माना जाता रहा। बाद में जनसंघ के ही एक बड़े नेता ने उनकी मौत को एक राजनैतिक हत्या तक कह दिया था।