
Delhi Sakshi Murder Case : दिल्ली के शाहबाद डेरी इलाके में हुए साक्षी हत्याकांड ने सामाजिक कार्यकर्ताओं, समाज के जागरूक नागरिकों व समाज विज्ञानियों की चिंता बढ़ गई है। इन सबकी चिंता का सबब बहुत ही वाजिब है। अधिकतर समाज विज्ञानियों का मत है कि इस मामले ने समाज में बढ़ती संवेदनहीनता का बड़ा उदाहरण पेश किया है। इस विषय में चेतना मंच ने सामाजिक विज्ञान की ज्ञाता सुश्री प्रवीणा अग्रवाल से बात की है। नीचे हम उनके विचारों को ज्यों का त्यों प्रकाशित कर रहे हैं।
ये क्रूरतम अपराध से अचानक ‘STORY’ बन जाती है। चैनलों में टीआरपी की होड होती है। कौन सबसे पहले कौन सा सीक्रेट ‘खोज’ कर ले आया ? पोस्टमार्टम में क्या मिला ? चाकू कहाँ से खरीदा, कितने टुकड़े किये, कितनी बार चाकू घोंपा ? कितने वार किये ? माता-पिता क्या कह रहे है। पड़ोसी क्या जानते हैं। दोस्तों सहेलियों ने कौन सा राज खोला। लोगों की प्रतिक्रियायें, कानून विशेषज्ञों की राय। घटना घटी बेचने का मसाला मिला। यदि कहीं पीडित एवं अपराधी का धर्म अलग हो अथवा दलित और सवर्ण का एंगल निकल आये तो फिर कहना ही क्या ? समाज इसे लेकर जुगाली कर रहा है। क्या इसी नैतिक दिवालियेपन ने समाज नामक संस्था के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। जो अन्याय, अत्याचार के खिलाफ लड़ता नहीं केवल तमाशबीन बनकर खड़ा है। ऊपर से ढकोसला यह कि कुछ रुपये पैसे बांटकर आवाजें बंद कर दी जाये क्योंकि अन्याय का शिकार गरीब है, अभावग्रस्त है। अपने अधिकारों के प्रति सजगता एवं दायित्वों के प्रति आंख मूंद लेने की प्रवृत्ति ने समाज को रोगी बना दिया है।