Dharma aur Rajniti / उदय प्रताप सिंह
वर्तमान बीजेपी सरकार की आस्था न तो संविधान में है न लोकतंत्र में है न गणराज्य में है, यह बात भांति भांति की घटनाओं से बराबर सामने आती रही है। जिस तरह से इस सरकार ने पत्रकारिता को और मीडिया को नाकारा बना दिया है, जिस प्रकार संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर डाका डाला गया है, जिस प्रकार विपक्ष को कमजोर किया गया है, विपक्ष के नेताओं को सीबीआई और ईडी का प्रयोग करके लांछित किया जा रहा है, यह सब तानाशाही के लक्षण हैं। जिस प्रकार सरकार के तीन अंग कार्यपालिका न्यायपालिका और विधायका का संविधान सम्मत स्वरूप बिगड़ रहा है वह भी तानाशाही का लक्षण है। न्यायपालिका और विधायका दोनों सरकार के आगे नतमस्तक हैं। संविधान सम्मत धार्मिक सहिष्णुता और सह अस्तित्व की भावना को पूरी तरह सरकार ने हिन्दुत्व के एजेंडे के चलते तहस-नहस कर दिया है।
यहां तक कि चुनाव आयोग भी पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के जमाने वाला चुनाव आयोग नहीं रहा। अब वह भी सरकार का मुखापेक्षी लगता है। मेरा मानना है कि वर्तमान सरकार में लोकतंत्र से ज्यादा एक तंत्र के लक्षण दिखलाई देते हैं। उसका ताजा उदाहरण यह कि 22 जनवरी 2024 को अयोध्या में होने वाले राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा का विशाल आयोजन है। चुनाव से पहले इसकी टाइमिंग से हमारी आशंका दृढ हो रही है।
मैं मानता हूं कि यह धर्म के कंधों पर राजनीति ढोई जा रही है। जो न तो संविधान सम्मत है और न धार्मिक सनातनी परंपराओं के अनुकूल है। हिंदू धर्म के जितने शंकराचार्य हैं या बड़े संत हैं सब यह मानते हैं कि आधे बने मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करना कराना अशोभनीय और देश के लिए अशुभ हो सकता है। खास तौर पर जब दो-तीन महीने बाद रामनवमी का पावन त्यौहार आने वाला था, जो प्राण प्रतिष्ठा के लिए सर्वोत्तम दिन होता। तो सवाल उठता है कि फिर इस प्राण प्रतिष्ठा के लिए इतनी जल्दी क्यों की गई ? स्पष्ट है कि उन्हें 2024 चुनाव में लाभ लेने के लिए संविधान की भावना के प्रतिकूल और सनातन धर्म की परंपराओं को अमान्य करके यह काम चुनावी फायदे हेतु हिंदुओं के ध्रुवीकरण के लिए बहुत जरूरी लगा होगा। रामनवमी तक आचार संहिता लागू हो जाती।
हालांकि मैं नहीं समझता कि पिछले अनुभवों के आधार पर चुनाव आयोग इस पर कोई आपत्ति करने की हिम्मत करता। उसकी हिम्मत पर सदैव शंका रहती है। लेकिन न्यायालय का खतरा बड़ा था, हो सकता है कि आचार संहिता के उल्लंघन का संज्ञान न्यायालय लेता बशर्ते उसका दरवाजा खटखटाया जाता। इसलिए 22 जनवरी की तारीख तय की गई।
दूसरी बात यह है कि आयोजन भी इतने बड़े पैमाने पर किया जा रहा है कि ताज्जुब होता है कि जिस देश में 82 करोड भूखे लोगों को खाना भी सरकार पेट भरने के लिए देती हो, उसमें इतने बड़े पैमाने पर यह इस तरह धन का अपव्यय क्यों किया जा रहा है और क्या ऐसा करना उचित है? और धन आता किधर से है? इन सवालों का जवाब सरकार को देना चाहिए क्योंकि यह लोकतंत्र है। और लोकतंत्र में जवाबदेही सरकार का धर्म है।
उधर, उन लाभार्थियों को बराबर यह भी समझाया जा रहा है कि यह खाना यह बीजेपी सरकार ही दे पाएगी, दूसरी सरकार आई तो उनको यह लाभ नहीं मिलेगा। अब सोचना यह है कि इन लाभार्थियों से सरकार को जो लाभ हो रहा है वह सरकार का सोच समझ कर किया काम है क्या? अगर गरीबी दूर हो गई तो इन वोटो की संख्या भी कम हो सकती है। इसलिए सरकार गरीबों को क्या अपने चुनावी लाभार्थ क़ायम रखना चाहती है। अन्यथा वे मौसम की बरसात जैसा इस आयोजन का औचित्य और क्या हो सकता है?
शंकराचार्य और धर्मगुरु सब यह मानते हैं के अयोध्या का वर्तमान आयोजन चुनावी लाभ हेतु यह सरकार की निर्लज्ज कोशिश है और सनातन व्यवस्था का अपमान है। सवाल फिर भी वही है कि इस काम के लिए इतना धन कहां से आया ? जब अभी एक दिन पूर्व CGA की एक रिपोर्ट आई है जिसमें सरकार पर आरोप है कि सरकार ने बहुत बड़े पैमाने पर दूसरी मदों का पैसा अपने फायदे के लिए अनियमित ढंग से अन्यत्र खर्च किया है। दूसरी आपत्तिजनक बात यह इस आयोजन में किसी धर्मगुरु या शंकराचार्य या जिन्होंने ने राम मंदिर के हेतु न्यायालय में पैरोकारी की थी, उनको बिल्कुल विश्वास में नहीं लिया जा रहा है। ना उनको इस आयोजन का ढंग से निमंत्रण दिया गया है। कई धर्म गुरुओं का मानना है कि हम वहां क्या सिर्फ तालियां बजाने जाएंगे ?
राजनीतिक लोगों को निमंत्रण देने में भी राजनीतिक कौशल का खेल हुआ है। ऐसे लोगों को निमंत्रण दिया गया और ऐसे ढंग से निमंत्रण दिया गया जिससे कि वह आना चाहे तो भी ना आएं। और बीजेपी को मतदाताओं के सामने यह कहने का मौका मिल जाए कि यह सब राम विरोधी हैं, हिंदू विरोधी हैं। इसलिए देश विरोधी भी हैं और तुम्हारे वोटों के हकदार नहीं है। यूं तो सरकार राजनीतिक विरोधियों को देश विरोधी सिद्ध करने की बड़ी कोशिश बीजेपी हमेशा करती रही है। वह तो भला हो उच्च न्यायालय कि समय-समय पर उसने अपन फैसलों में सरकार को दिशा दी है, समझाया है कि सरकार और राज्य अलग-अलग संस्थाएं हैं। इसलिए सरकार की नीतियों का विरोध राज्य का विरोध नहीं माना जा सकता और इस तरह देशद्रोह को परिभाषित नहीं किया जा सकता।
वास्तविकता यह है कि सरकार अपने घोषणा पत्र पर काम करने से ज्यादा आरएसएस के राष्ट्र के हिंदूकरण के एजेंडा पर काम कर रही है और उसके लिए राम नाम का संवैधानिक प्रयोग जरूरी समझ कर किया जा रहा है। और इसमें अयोध्या में बन रहे राम मंदिर में नवीन प्रतिमा के प्राण प्रतिष्ठा के आयोजन से सरकार पूरा फायदा 2024 के चुनाव में लेना चाहती है। अन्यथा सरकार का ध्यान भूख, गरीबी, बेकारी, महंगाई, भ्रष्टाचार और शिक्षा की दुर्दशा पर अधिक होना चाहिए था। उधर किसान की समस्या जैसी की तैसी है। गन्ना किसानों को कई वर्षों से उनकी फसल का मूल्य नहीं मिला। महिलाओं के साथ निरंतर बदसलूकी हो रही है, बड़े फौजी अफसरों का कहना है कि सेवा में एक लाख सिपाहियों की कमी है, यह कमी कभी देश के लिए महंगी पड़ सकती है, लेकिन सरकार ने सेना का बजट कम करने के लिए अग्नि वीर योजना चलाई। विद्यालयों में शिक्षकों की कमी है। यह सब मुद्दे ज्यादा महत्वपूर्ण है। राम का मंदिर अभी बनता रहेगा, कई वर्षों तक बनता रहेगा। प्राण प्रतिष्ठा का आयोजन कुछ दिनों के बाद किया जा सकता था।
पर जनहित के असली मुद्दों पर काम करने से सरकार हमेशा से बचती रही है। वैश्विक लोकतंत्र के सूचकांक पर ऐसी ही बातों से हमारा स्तर गिरता जा रहा है लेकिन सरकार को सत्ता में बने रहने के लिए इसकी कोई चिंता नहीं है। देश प्रेम का डंका पीटने वाली भाजपा सरकार यह नहीं जानती। इस देश की रहने वाली जनता ही असली देश है। यदि लोक हितकारी सरकार लोकतंत्र में जनता का कार्य नहीं करेगी तो उसका धार्मिक होना किस काम का है। यह सोचने की बात होगी। धर्म के कंधों पर नस्ल या जातीय श्रेष्ठता का खेल कभी भी राख में चिंगारी का काम करके क्रांति का आह्वान कर सकती है।
(लेखक प्रसिद्ध कवि, साहित्यकार तथा जाने माने राजनेता हैं)