वो सरकार जो कहती थी कि हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते। जिसने आज तक विपक्ष के तमाम आरोपों का डट कर सामना किया आखिरकार जेन-जी के सामने हार गई।

शनिवार (25 जुलाई) का दिन पीएम नरेंद्र मोदी के शासनकाल के इतिहास में एक ऐसी घटना का साक्षी बना जिसके बारे में कोई सोच नहीं सकता था। वो सरकार जो कहती थी कि हमारी सरकार में इस्तीफे नहीं होते। जिसने आज तक विपक्ष के तमाम आरोपों का डट कर सामना किया आखिरकार जेन-जी के सामने हार गई। धर्मेंद्र प्रधान ने अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी।यह मोदी कैबिनेट का पहला ऐसा इस्तीफा है जो भारी दबाव के आगे आया। नीचे हैं पांच प्रमुख कारण जो इस मजबूरी को समझाते हैं:
1. छात्र आंदोलन का भारी दबाव: जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के लगातार प्रदर्शन, सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और लाखों छात्रों-माता-पिता का गुस्सा सरकार के लिए बड़ी चुनौती बन गया। NEET पेपर लीक से प्रभावित युवाओं का आक्रोश बढ़ता जा रहा था, जिसे दबाने में पुलिस कार्रवाई भी उल्टा पड़ी। इससे राजनीतिक नुकसान रोकने के लिए इस्तीफा स्वीकार करना पड़ा।
2. विपक्षी दलों का एकजुट हमला: राहुल गांधी समेत पूरे विपक्ष ने NEET घोटाले को मुद्दा बनाकर संसद और सड़कों पर सरकार को घेरा। यह मुद्दा युवा वोटबैंक को प्रभावित कर रहा था। लंबे समय तक विवाद चलने से NDA की छवि खराब हो रही थी, इसलिए सरकार ने इस्तीफे के जरिए विवाद को शांत करने का रास्ता चुना। राहुल गांधी ने कांग्रेस सांसदों के साथ पीएम आवास के बाहर धरना देना, सपा प्रमुख अखिलेश यादव सहित पूरी पार्टी का आक्रामक तेवर कुछ ऐसा था जिसके लिए सरकार तैयार नहीं थी।
3. परीक्षा व्यवस्था पर जनता का अविश्वास : बार-बार पेपर लीक (2024 और 2026) और छात्रों की आत्महत्याओं ने शिक्षा मंत्रालय की विश्वसनीयता पूरी तरह नष्ट कर दी। करोड़ों अभ्यर्थियों के भविष्य से जुड़े इस संकट को अनदेखा करना असंभव हो गया। सरकार को सुधार की दिशा में ठोस कदम दिखाने के लिए प्रधान का इस्तीफा जरूरी लगा।
4. राजनीतिक क्षति नियंत्रण की रणनीति: लंबे आंदोलन से BJP की युवा छवि बिगड़ रही थी, खासकर आने वाले चुनावों को देखते हुए। इस्तीफा देकर सरकार ने जवाबदेही का संदेश देने की कोशिश की, साथ ही नए मंत्री के साथ नई शुरुआत कर विवाद को पीछे छोड़ने का प्रयास किया। इससे आगे का नुकसान रोका जा सका।
5. छवि सुधारने की आखिरी कोशिश: हर तरफ से घिर चुके मोदी सरकार के सिपाहसालरों ने शायद सोचा होगा कि प्रधान के इस्तीफे से प्रदर्शनकारियों को आश्वासन मिलेगा और नई एनटीए टीम के साथ परीक्षा सुधारों पर फोकस करने से शायद सरकार अपनी छवि को हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई कर सके। अगर इस्तीफा नहीं होता आंदोलन और उग्र होता और फिर सरकार के पास शायद कोई ऑप्शन ही नहीं होता।
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