दिल्ली और पंजाब की राजनीति में अहम दखल रखने वाले चड्ढा को राज्यसभा के उपनेता पद से हटाए जाने के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर रिश्तों और भरोसे की इस तस्वीर में अचानक ऐसा क्या बदल गया।

Raghav Chadha : एक समय आम आदमी पार्टी में अरविंद केजरीवाल के बेहद करीबी और भरोसेमंद नेताओं में गिने जाने वाले राघव चड्ढा आज अपनी ही पार्टी के भीतर सवालों के घेरे में दिखाई दे रहे हैं। दिल्ली और पंजाब की राजनीति में अहम दखल रखने वाले चड्ढा को राज्यसभा के उपनेता पद से हटाए जाने के बाद सियासी गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि आखिर रिश्तों और भरोसे की इस तस्वीर में अचानक ऐसा क्या बदल गया। खुद राघव चड्ढा ने भी इस घटनाक्रम पर हैरानी जताते हुए इशारा किया है कि उन्हें इसलिए चुप कराने की कोशिश हुई, क्योंकि वे लगातार ऐसे मुद्दे उठा रहे थे जो सीधे आम आदमी की रोजमर्रा की मुश्किलों, जरूरतों और हक से जुड़े थे।
हालांकि, आम आदमी पार्टी की तरफ से इस दावे को स्वीकार नहीं किया गया। पार्टी नेतृत्व का कहना है कि राघव चड्ढा संसद में केंद्र सरकार के खिलाफ उतनी मजबूती और धार के साथ नहीं बोले, जितनी उनसे उम्मीद थी। दिल्ली इकाई के प्रमुख सौरभ भारद्वाज ने भी उन पर निशाना साधते हुए कहा कि भाजपा नीत केंद्र सरकार को घेरने में चड्ढा का रवैया उतना आक्रामक नहीं दिखा, जितना पार्टी चाहती थी। लेकिन इन आरोपों और पलटवारों के बीच बड़ा सवाल यही है कि राघव चड्ढा ने संसद में आखिर ऐसे कौन-कौन से मुद्दे उठाए, जिनकी वजह से यह राजनीतिक असहजता बढ़ती हुई दिखाई दे रही है।
राघव चड्ढा ने संसद में पितृत्व अवकाश को कानूनी मान्यता देने की जरूरत पर जोर दिया। उनका कहना था कि बच्चे की देखभाल की जिम्मेदारी केवल मां के कंधों पर नहीं छोड़ी जानी चाहिए। एक पिता को अपने नवजात की देखभाल और नौकरी की सुरक्षा के बीच चुनाव करने की स्थिति में नहीं होना चाहिए। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि एक मां को प्रसव के बाद के कठिन दौर में अपने जीवनसाथी के सहयोग से वंचित नहीं रहना चाहिए। उनके मुताबिक देखभाल साझा जिम्मेदारी है और कानूनों में भी इसकी स्पष्ट झलक दिखनी चाहिए।
देश के बड़े शहरों में बढ़ती ट्रैफिक समस्या को भी चड्ढा ने गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा बताया। उन्होंने दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु और चेन्नई जैसे शहरों का जिक्र करते हुए कहा कि ट्रैफिक जाम ने महानगरों की रफ्तार को बुरी तरह जकड़ लिया है। लोगों का कीमती समय घंटों सड़कों पर फंसकर बर्बाद हो रहा है, जिसका असर सिर्फ व्यक्ति पर नहीं बल्कि देश की उत्पादकता पर भी पड़ता है। उन्होंने बेहतर सार्वजनिक परिवहन, स्मार्ट ट्रैफिक मैनेजमेंट और वैज्ञानिक पार्किंग नीति की जरूरत पर बल दिया।
टेलीकॉम कंपनियों की नीतियों को लेकर भी राघव चड्ढा ने संसद में आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि प्रीपेड उपभोक्ताओं से पूरा पैसा लेने के बावजूद बचा हुआ डेटा दिन खत्म होते ही समाप्त कर दिया जाता है, जबकि उपभोक्ता ने उसकी कीमत चुकाई होती है। उन्होंने इस व्यवस्था को अनुचित बताया और मांग की कि इस्तेमाल न हुआ डेटा आगे के लिए बचा रहना चाहिए। इसके अलावा उन्होंने 28 दिन वाले तथाकथित मासिक रिचार्ज प्लान पर भी सवाल खड़े किए। उनका कहना था कि जब प्लान को मासिक कहा जाता है, तो उसकी वैधता 30 या 31 दिन होनी चाहिए, न कि 28 दिन, क्योंकि इस व्यवस्था में उपभोक्ता को सालभर में 12 की जगह 13 बार भुगतान करना पड़ता है।
राघव चड्ढा ने महिलाओं की सेहत और गरिमा से जुड़े मुद्दों को भी संसद में उठाया। उन्होंने कहा कि अगर किसी लड़की को स्कूल या सार्वजनिक स्थान पर केवल इसलिए दिक्कत झेलनी पड़ती है क्योंकि वहां सैनिटरी पैड, पानी, कूड़ेदान और प्राइवेसी जैसी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं, तो यह उसकी निजी समस्या नहीं बल्कि व्यवस्था की नाकामी है। उनके मुताबिक मासिक धर्म से जुड़ी स्वास्थ्य सुविधाएं दया या सहानुभूति का विषय नहीं, बल्कि अधिकार, सम्मान, शिक्षा और समानता का मामला हैं।
एयरपोर्ट पर मिलने वाले महंगे खाने का सवाल भी राघव चड्ढा ने संसद में उठाया था। उन्होंने कहा कि हवाई अड्डों पर किफायती भोजन उपलब्ध होना यात्रियों के लिए एक बुनियादी सुविधा होनी चाहिए, इसे विलासिता नहीं माना जाना चाहिए। बाद में सरकार की ‘उड़ान यात्री कैफे’ पहल को भी इसी संदर्भ में देखा गया। चड्ढा ने इस पहल का स्वागत किया और कहा कि इससे आम यात्रियों को राहत मिल सकती है। उन्होंने मुंबई एयरपोर्ट पर कम कीमत में चाय मिलने का अनुभव साझा करते हुए इसे यात्रियों के हित में उठाया गया एक उपयोगी कदम बताया।
राजनीतिक जवाबदेही को मजबूत करने के लिए राघव चड्ढा ने ‘राइट टू रिकॉल’ यानी जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार देने की बात भी उठाई। उनका तर्क था कि अगर जनता किसी नेता को चुन सकती है, तो उसे हटाने का अधिकार भी जनता के पास होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जवाबदेही के लिए पांच साल तक इंतजार करना बहुत लंबा समय है। हालांकि, उन्होंने यह भी माना कि ऐसी किसी व्यवस्था में दुरुपयोग रोकने के लिए मजबूत सुरक्षा प्रावधान जरूरी होंगे।
चड्ढा ने गिग इकॉनमी में काम करने वाले कर्मचारियों, खासकर डिलीवरी और ऐप-आधारित सेवाओं से जुड़े लोगों की समस्याओं को भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने कहा कि इन कामगारों को उचित वेतन, सुरक्षित कामकाजी माहौल और बुनियादी सुविधाएं मिलनी चाहिए। बताया जाता है कि उन्होंने एक डिलीवरी वर्कर के साथ समय बिताकर उनकी असल मुश्किलों को समझने की कोशिश भी की। उन्होंने तेज डिलीवरी के दबाव और उससे पैदा होने वाले खतरे पर भी चिंता जताई। Raghav Chadha