
राजनीतिक मोर्चे पर विपक्षी महागठबंधन ने 9 जुलाई को पूरे राज्य में चक्का जाम और बिहार बंद का आह्वान किया था। इस विरोध-प्रदर्शन की अगुवाई राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव ने की, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और भाकपा-माले के दीपांकर भट्टाचार्य जैसे प्रमुख नेता भी शामिल हुए। अब जब राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन हो चुका है, तो संघर्ष का अगला चरण न्यायिक गलियारों में प्रवेश कर चुका है।
मतदाता सूची के इस विशेष पुनरीक्षण के विरुद्ध सबसे पहले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) ने 5 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसके बाद राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस सहित नौ राजनीतिक दलों ने इस प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए सर्वोच्च न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की। कोर्ट ने सभी याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए सूचीबद्ध कर लिया है, जिन पर आज 10 जुलाई से सुनवाई आरंभ हो रही है।
क्या यह संविधान और कानून का उल्लंघन है ? - याचिकाओं में कहा गया है कि चुनाव आयोग का यह निर्णय जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स, 1960 के नियम 21ए के साथ-साथ संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता), 21 (जीवन व स्वतंत्रता का अधिकार), 325 और 326 का सीधा उल्लंघन करता है।
नागरिकता, जन्म और निवास को लेकर मनमानी ? - सामाजिक कार्यकर्ताओं अरशद अजमल और रूपेश कुमार द्वारा दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि इस सत्यापन प्रक्रिया में नागरिकता, जन्म स्थान और निवास से संबंधित दस्तावेजों की मनमानी और असंगत माँग की जा रही है, जो गरीब और अशिक्षित तबकों के लिए गंभीर बाधा बन सकती है।
लोकतांत्रिक मूल्यों पर आघात ? - याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस प्रक्रिया के ज़रिए आम नागरिकों की मतदाता सूची से बहिष्कृति का जोखिम बढ़ता है, जिससे भारत की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद कमजोर होती है। यह कदम जन-सहभागिता को सीमित कर लोकतांत्रिक आदर्शों के विपरीत है।
कमजोर वर्गों पर अतिरिक्त बोझ ? - आरोप है कि यह प्रक्रिया सामाजिक रूप से वंचित वर्गों — विशेषकर गरीब, प्रवासी मजदूरों, महिलाओं और आदिवासी समुदायों — पर अनावश्यक और असमान बोझ डालती है, जिससे वे मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं।
क्या समय-चयन भी पक्षपातपूर्ण है ? -राजद नेता मनोज झा द्वारा दायर याचिका में तर्क दिया गया है कि यह पुनरीक्षण मानसून के समय शुरू किया गया, जब राज्य के कई जिले बाढ़ की चपेट में रहते हैं और लाखों लोग विस्थापित हो जाते हैं। ऐसे में यह प्रक्रिया एक बड़े वर्ग के लिए अव्यवहारिक हो जाती है और उन्हें मताधिकार से वंचित करने का खतरा उत्पन्न करती है।
विपक्षी दलों के आरोपों पर चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि 1 जनवरी 2003 को प्रकाशित मतदाता सूची में जिन व्यक्तियों के नाम दर्ज हैं, उन्हें कोई अतिरिक्त दस्तावेज नहीं देना होगा। ऐसे मतदाता भारतीय नागरिक माने जाएंगे। यदि किसी व्यक्ति के माता-पिता का नाम उस सूची में दर्ज है, तो उन्हें केवल जन्म तिथि और स्थान से संबंधित प्रमाण देना होगा। आयोग ने इसे एक सामान्य प्रक्रिया बताया है जिसका उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन और सटीक बनाना है। Bihar Voter Verification Case