दुर्गा भाभी जयंती पर जानिए दुर्गावती देवी का जीवन, भगत सिंह को लाहौर से निकालने में उनकी भूमिका, क्रांतिकारी गतिविधियां और केशव प्रसाद मौर्य की श्रद्धांजलि।

अंग्रेजी हुकूमत का दौर था, चारों तरफ पहरा था और क्रांतिकारियों की हर गतिविधि पर ब्रिटिश पुलिस की नजर रहती थी। ऐसे वक्त में एक महिला ने ऐसा साहस दिखाया, जिसकी कहानी आज भी रोंगटे खड़े कर देती है। यह कहानी है दुर्गावती देवी की, जिन्हें देश ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से जानता है। भगत सिंह को अंग्रेजों की नजरों से बचाकर लाहौर से बाहर निकालने से लेकर ब्रिटिश शासन को खुली चुनौती देने तक, उन्होंने हर मोर्चे पर अदम्य साहस दिखाया। दुर्गा भाभी की जयंती पर उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने भी उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। आखिर कौन थीं वह वीरांगना, जिसने क्रांति की राह में अपने साहस से इतिहास की धारा मोड़ दी?
दुर्गावती देवी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 को उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले के शहजादपुर गांव में हुआ था। उस समय कौशाम्बी प्रयागराज का हिस्सा था। देश के स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने एक निडर क्रांतिकारी के रूप में अपनी पहचान बनाई। क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय रहने के कारण उन्हें देश में ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से जाना गया। दुर्गावती देवी महान क्रांतिकारी भगवती चरण बोहरा की पत्नी थीं। उनका जीवन केवल एक क्रांतिकारी की पत्नी के रूप में नहीं, बल्कि खुद एक साहसी महिला और स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर भी याद किया जाता है। उन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित किया और अंग्रेजी शासन के खिलाफ चल रही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभाई।
दुर्गा भाभी का नाम भगत सिंह से जुड़ी उस घटना के कारण भी बेहद महत्वपूर्ण है, जिसने उन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चित महिला क्रांतिकारियों में शामिल कर दिया। ब्रिटिश अधिकारी जॉन पी. सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकालना एक बड़ी चुनौती थी। दिसंबर 1928 में दुर्गा भाभी ने भगत सिंह को सुरक्षित लाहौर से कलकत्ता पहुंचाने में मदद की। इस दौरान उन्होंने भगत सिंह की पत्नी का रूप धारण किया और उनके साथ यात्रा की। अंग्रेजों की नजरों से बचाकर भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकालने में दुर्गा भाभी की भूमिका बेहद साहसिक थी। यही वजह है कि स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में उनका नाम भगत सिंह के साथ भी विशेष रूप से लिया जाता है।
दुर्गा भाभी केवल एक घटना तक सीमित नहीं थीं। वह नौजवान भारत सभा की सक्रिय सदस्य थीं और क्रांतिकारी गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं। उन्होंने बम बनाने का प्रशिक्षण भी लिया था। उस समय अंग्रेजी शासन के खिलाफ आवाज उठाना बेहद जोखिम भरा था, लेकिन दुर्गा भाभी ने अपने साहस और दृढ़ संकल्प से इस चुनौती का सामना किया। उनका जीवन यह दिखाता है कि भारत की आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। दुर्गा भाभी ने अपने साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति से स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अलग पहचान बनाई।
भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दिए जाने के बाद दुर्गा भाभी ने भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपना संघर्ष जारी रखा। उन्होंने पंजाब के पूर्व गवर्नर लॉर्ड हेली पर हमला किया था। इस घटना के बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया और तीन साल की सजा हुई। दुर्गा भाभी के जीवन का यह अध्याय उनके साहस और अंग्रेजी शासन के प्रति उनके विरोध को दिखाता है। उन्होंने उस दौर में ऐसी परिस्थितियों में क्रांतिकारी गतिविधियों को जारी रखा, जब ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता सेनानियों पर कड़ी नजर रखती थी।
दुर्गा भाभी की जयंती के अवसर पर उत्तर प्रदेश के उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दुर्गावती देवी को नमन करते हुए उनके साहस, त्याग और राष्ट्रभक्ति को याद किया।
दुर्गा भाभी का जीवन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में महिलाओं के साहस और योगदान की एक महत्वपूर्ण मिसाल है। उन्होंने उस समय देश की आजादी के लिए संघर्ष किया, जब अंग्रेजी शासन के खिलाफ खड़ा होना बेहद कठिन था। भगत सिंह को सुरक्षित बाहर निकालने में उनकी भूमिका से लेकर क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी तक, उनका जीवन साहस और देशभक्ति से जुड़ा रहा। दुर्गावती देवी का निधन 15 अक्टूबर 1999 को हुआ। आज उनकी जयंती पर उन्हें याद करते हुए देश उनके योगदान को नमन कर रहा है। दुर्गा भाभी का जीवन आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश देता है कि देश के लिए समर्पण और साहस किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं था, बल्कि भारत की आजादी की लड़ाई में महिलाओं ने भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया था।
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