दुर्गा भाभी की पुण्यतिथि पर चेतना मंच के संपादक आरपी रघुवंशी ने गाजियाबाद में उनसे हुई मुलाकात की यादें साझा कीं। जानिए महान क्रांतिकारी दुर्गावती देवी के साहस, त्याग और संघर्ष की प्रेरक कहानी।

मैं चेतना मंच का संपादक आरपी रघुवंशी हूं। जीवन में कई लोगों से मुलाकात होती है, लेकिन कुछ मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो समय बीतने के साथ धुंधली होने के बजाय दिल में और गहरी उतरती जाती हैं। महान क्रांतिकारी दुर्गावती देवी, जिन्हें पूरा देश ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से जानता है, से मेरी मुलाकात भी ऐसी ही एक यादगार मुलाकात है। उनके जीवन के अंतिम दिनों में गाजियाबाद में उनसे मिलने का अवसर मिला। सामने बैठी उस महिला में मुझे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का वह जीवंत इतिहास दिखाई दिया, जिसने कभी अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती देने का साहस किया था। आज उनकी पुण्यतिथि पर उस मुलाकात की स्मृतियों के साथ मैं भारत की महान वीरांगना दुर्गा भाभी के अदम्य साहस, त्याग और संघर्ष की कहानी आपसे साझा करना चाहता हूं।
दुर्गा भाभी से मेरी मुलाकात को याद करता हूं, तो सबसे पहले यह एहसास सामने आता है कि इतिहास की किताबों में पढ़े गए नाम जब वास्तविक जीवन में हमारे सामने आते हैं, तो उनका अर्थ कितना बदल जाता है। जिस महिला का नाम भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी के साथ इतिहास में दर्ज है, वह मेरे सामने थीं। उनके जीवन की कहानी केवल अतीत का कोई गौरवगान नहीं थी, बल्कि उस दौर की याद थी, जब देश को आजाद कराने के लिए लोगों ने अपना सुख, अपना परिवार और यहां तक कि अपना जीवन भी दांव पर लगा दिया था। उनसे मिलना मेरे लिए सिर्फ एक महान स्वतंत्रता सेनानी से मुलाकात करना नहीं था। यह उस पीढ़ी के संघर्ष को करीब से महसूस करने का अवसर था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत की ताकत के सामने झुकने से इनकार कर दिया था। उस दौर की कल्पना कीजिए, जब ब्रिटिश पुलिस की निगाहें क्रांतिकारियों की गतिविधियों पर लगी रहती थीं, जरा-सी चूक गिरफ्तारी या फांसी का कारण बन सकती थी और आजादी की बात करना भी अपने आप में एक जोखिम था। ऐसे समय में दुर्गा भाभी ने जो रास्ता चुना, वह किसी सामान्य साहस की कहानी नहीं है। उनके जीवन को समझने के लिए जरूरी है कि हम उन्हें केवल भगत सिंह की मदद करने वाली महिला के रूप में न देखें, बल्कि एक स्वतंत्र विचार वाली, दृढ़ निश्चयी और सक्रिय क्रांतिकारी के रूप में याद करें।
दुर्गावती देवी का जन्म 7 अक्टूबर 1907 को उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी जिले के शहजादपुर गांव में हुआ था। उस समय कौशाम्बी, प्रयागराज का हिस्सा था। उनका जीवन ऐसे दौर में आगे बढ़ा, जब देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ असंतोष बढ़ रहा था और स्वतंत्रता आंदोलन अलग-अलग रूपों में अपनी ताकत जुटा रहा था। दुर्गावती देवी का विवाह महान क्रांतिकारी भगवती चरण वोहरा से हुआ था। भगवती चरण वोहरा हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) से जुड़े प्रमुख क्रांतिकारियों में थे। इस संगठन से भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और दूसरे कई क्रांतिकारी भी जुड़े थे। ऐसे वातावरण में दुर्गावती देवी का क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ना उनके जीवन का महत्वपूर्ण अध्याय बना। साथियों और क्रांतिकारियों के बीच वह ‘दुर्गा भाभी’ के नाम से प्रसिद्ध हुईं। यह संबोधन केवल आत्मीयता का प्रतीक नहीं था, बल्कि उस भरोसे को भी दर्शाता था, जो क्रांतिकारी साथी उन पर करते थे।
जब मैं उनके जीवन को याद करता हूं, तो मुझे लगता है कि उनके नाम के साथ जुड़ा ‘भाभी’ शब्द कहीं उनकी ऐतिहासिक भूमिका को सीमित करके देखने का कारण नहीं बनना चाहिए। वह किसी क्रांतिकारी की पत्नी होने के कारण ही महत्वपूर्ण नहीं थीं। उनकी अपनी राजनीतिक चेतना थी, अपना साहस था और स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका थी। उन्होंने जिस जोखिम को स्वीकार किया, वह उनके निजी जीवन से कहीं बड़ा था।
दुर्गा भाभी के जीवन का सबसे चर्चित प्रसंग दिसंबर 1928 का है। लाहौर में ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन पी. सांडर्स की हत्या के बाद भगत सिंह की गिरफ्तारी का खतरा बहुत बढ़ गया था। ब्रिटिश पुलिस उनकी तलाश में थी और लाहौर से सुरक्षित बाहर निकलना एक बड़ी चुनौती बन चुका था। ऐसी परिस्थिति में भगत सिंह को अंग्रेजों की नजरों से बचाकर बाहर निकालने की योजना में दुर्गा भाभी ने अहम भूमिका निभाई। उन्होंने भगत सिंह के साथ उनकी पत्नी के रूप में यात्रा की, जबकि राजगुरु ने एक सहायक की भूमिका निभाई। भगत सिंह ने उस यात्रा में अपना रूप भी बदला हुआ था, ताकि पुलिस को उन पर संदेह न हो। यह योजना केवल भेष बदलने की कहानी नहीं थी। इसके पीछे एक महिला का असाधारण आत्मविश्वास, सूझबूझ और जोखिम उठाने की क्षमता थी। कल्पना कीजिए कि जिस व्यक्ति की तलाश पूरे पुलिस तंत्र को हो, उसके साथ यात्रा करना और संदेह से बचते हुए उसे सुरक्षित गंतव्य तक पहुंचाने में मदद करना कितना खतरनाक रहा होगा। दुर्गा भाभी ने यह जोखिम उठाया। इस यात्रा के जरिए भगत सिंह को लाहौर से बाहर निकलने में मदद मिली और वे कलकत्ता पहुंचे। यह घटना भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन के इतिहास में उनकी भूमिका को विशेष स्थान देती है।
उनसे अपनी मुलाकात की स्मृतियों को आज के संदर्भ में देखता हूं, तो यह प्रसंग मुझे बताता है कि स्वतंत्रता संग्राम में साहस का अर्थ हमेशा हथियार उठाना ही नहीं था। कभी साहस सही समय पर सही निर्णय लेने में था, कभी अपने साथी के साथ खड़े होने में और कभी ऐसी जिम्मेदारी स्वीकार करने में, जिसमें अपनी सुरक्षा से पहले देश का उद्देश्य सामने हो।
दुर्गा भाभी की कहानी को भगत सिंह को लाहौर से निकालने की घटना तक सीमित कर देना उनके योगदान के साथ न्याय नहीं होगा। वह क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय थीं और नौजवान भारत सभा तथा क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े लोगों के संपर्क में थीं। उनके पति भगवती चरण वोहरा भी क्रांतिकारी गतिविधियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे। उस दौर में क्रांतिकारी संगठनों का काम केवल अंग्रेजों के खिलाफ नारों तक सीमित नहीं था। उन्हें गोपनीय तरीके से काम करना पड़ता था, साथियों की सुरक्षा का ध्यान रखना पड़ता था और संसाधनों की व्यवस्था से लेकर संदेश पहुंचाने तक कई तरह की जिम्मेदारियां निभानी होती थीं। दुर्गा भाभी ने भी इस संघर्ष में अपनी भूमिका निभाई।
उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उन्होंने महिलाओं के लिए तय पारंपरिक सीमाओं को स्वीकार करके खुद को घर तक सीमित नहीं रखा। वह ऐसे आंदोलन का हिस्सा बनीं, जिसमें हर कदम पर खतरा था। ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सक्रिय होना किसी भी व्यक्ति के लिए आसान नहीं था, लेकिन एक महिला के लिए सामाजिक अपेक्षाओं और राजनीतिक जोखिमों के बीच अपना रास्ता बनाना और भी चुनौतीपूर्ण था। आज जब हम स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास पर नजर डालते हैं, तो अक्सर कुछ बड़े नाम ही हमारी स्मृति में रह जाते हैं। दुर्गा भाभी हमें याद दिलाती हैं कि किसी आंदोलन की ताकत केवल उसके सबसे प्रसिद्ध नेताओं से नहीं बनती। उसके पीछे ऐसे अनेक लोग होते हैं, जो जोखिम उठाते हैं, योजनाओं को सफल बनाने में मदद करते हैं और जरूरत पड़ने पर स्वयं आगे आकर मोर्चा संभालते हैं।
दुर्गा भाभी के जीवन को समझने के लिए उनके निजी संघर्षों को भी याद करना जरूरी है। उनके पति भगवती चरण वोहरा क्रांतिकारी आंदोलन के महत्वपूर्ण सदस्य थे। 28 मई 1930 को रावी नदी के तट पर बम के परीक्षण के दौरान हुए विस्फोट में उनकी मृत्यु हो गई। यह दुर्गा भाभी के जीवन का अत्यंत दुखद मोड़ था। जिस व्यक्ति के साथ उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का कठिन रास्ता चुना था, उसे उन्होंने खो दिया। लेकिन उनके जीवन की कहानी केवल व्यक्तिगत दुख की कहानी बनकर नहीं रह गई। उस समय क्रांतिकारी आंदोलन लगातार दमन का सामना कर रहा था। अनेक साथी जेलों में थे, कई भूमिगत थे और कुछ अपने प्राण न्योछावर कर चुके थे। ऐसे माहौल में किसी प्रियजन को खोने का दुख और देश के लिए संघर्ष जारी रखने का संकल्प एक साथ मौजूद थे। दुर्गा भाभी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि स्वतंत्रता की लड़ाई में बलिदान केवल शहीदों के जीवन तक सीमित नहीं था। उनके परिवारों और साथियों को भी उसकी गहरी कीमत चुकानी पड़ती थी। जब मैं उनके जीवन के इस पक्ष पर विचार करता हूं, तो उनके साहस का अर्थ और व्यापक हो जाता है। साहस केवल किसी खतरनाक अभियान में आगे बढ़ने का नाम नहीं है। कभी साहस अपने जीवन की सबसे बड़ी क्षति के बाद भी टूटकर बिखर न जाने में होता है। कभी अपने विश्वास को बनाए रखने और कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने में होता है।
दुर्गा भाभी के संघर्ष का एक और चर्चित अध्याय ब्रिटिश अधिकारियों के खिलाफ उनकी कार्रवाई से जुड़ा है। भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को फांसी दिए जाने के बाद भी अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनका विरोध समाप्त नहीं हुआ। दुर्गा भाभी ने पंजाब के पूर्व गवर्नर लॉर्ड हेली को निशाना बनाकर हमला किया था। इस कार्रवाई में हेली बच गए, लेकिन घटना ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके तीखे विरोध को सामने ला दिया। इस प्रकरण में गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का सामना भी करना पड़ा।
इस प्रसंग को याद करते हुए यह समझना जरूरी है कि उस समय क्रांतिकारियों के लिए हर कार्रवाई का अर्थ गंभीर परिणामों का सामना करने की तैयारी करना था। ब्रिटिश शासन का पुलिस और प्रशासनिक तंत्र संगठित था। निगरानी, गिरफ्तारी और मुकदमों के बीच किसी भी क्रांतिकारी गतिविधि को अंजाम देना आसान नहीं था।
दुर्गा भाभी का जीवन हमें यह बताता है कि स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं ने केवल संदेश पहुंचाने या क्रांतिकारियों की सहायता करने तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी। कुछ महिलाओं ने स्वयं संघर्ष का जोखिम उठाया, प्रतिरोध का रास्ता चुना और उसके परिणामों का सामना किया। उनके जीवन के इन प्रसंगों को पढ़ते और याद करते समय हमें इतिहास को केवल रोमांचक घटनाओं के रूप में नहीं देखना चाहिए। इनके पीछे मनुष्य का जीवन, उसकी आशंकाएं, उसके रिश्ते और उसके विश्वास भी थे। दुर्गा भाभी का महत्व इसी में है कि उन्होंने कठिन परिस्थितियों के बीच अपने संकल्प को बनाए रखा।
दुर्गा भाभी की जिंदगी का एक पक्ष उनके बाद के वर्षों से भी जुड़ा है। स्वतंत्रता आंदोलन के उथल-पुथल भरे दौर के बाद उन्होंने शिक्षा और समाज सेवा के क्षेत्र में काम किया। उन्होंने गाजियाबाद में बच्चों की शिक्षा के लिए विद्यालय चलाने जैसे कार्यों से भी जुड़ाव रखा। यह तथ्य उनके व्यक्तित्व को एक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का अवसर देता है। देश की आजादी के लिए संघर्ष करना उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था, लेकिन उनका योगदान केवल क्रांतिकारी गतिविधियों की स्मृतियों तक सीमित नहीं रहा। शिक्षा और समाज निर्माण से जुड़कर उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के लिए भी काम किया। मेरे लिए उनके जीवन का यह पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आजादी का उद्देश्य केवल विदेशी शासन को समाप्त करना नहीं था। उसका एक बड़ा लक्ष्य ऐसा समाज बनाना भी था, जिसमें लोग सम्मान के साथ जी सकें और आने वाली पीढ़ियों को बेहतर अवसर मिलें। दुर्गा भाभी के जीवन को एक साथ देखने पर संघर्ष के दो रूप सामने आते हैं। एक वह, जिसमें उन्होंने अंग्रेजी शासन को चुनौती दी; दूसरा वह, जिसमें उन्होंने समाज के निर्माण में योगदान दिया। यही व्यापकता उन्हें स्वतंत्रता संग्राम की स्मृतियों में एक अलग स्थान देती है।
दुर्गावती देवी का निधन 15 अक्टूबर 1999 को गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश में हुआ। आज, 15 अक्टूबर को उनकी पुण्यतिथि पर, उनके जीवन और योगदान को याद करते हुए मेरी उनसे हुई मुलाकात की स्मृतियां विशेष रूप से मन में उभरती हैं। जीवन के अंतिम दिनों में उनसे मिलना मेरे लिए एक ऐसा अनुभव था, जिसने इतिहास और वर्तमान के बीच की दूरी को कम कर दिया। हम अक्सर स्वतंत्रता सेनानियों को तस्वीरों, दस्तावेजों और पुस्तकों के माध्यम से जानते हैं। उनके जीवन की घटनाएं पढ़ते हैं, उनके साहस की चर्चा करते हैं और राष्ट्रीय पर्वों पर उन्हें याद करते हैं। लेकिन जब उसी इतिहास से जुड़ी किसी शख्सियत से मिलने का अवसर मिलता है, तो यह एहसास गहरा होता है कि आजादी की कहानी कभी केवल किताबों तक सीमित नहीं थी। उनकी जिंदगी में संघर्ष था, त्याग था, व्यक्तिगत क्षति थी और देश के लिए कुछ करने की दृढ़ इच्छा थी। उनका नाम सुनते ही भगत सिंह को सुरक्षित बाहर निकालने का प्रसंग याद आता है, लेकिन उनके जीवन का अर्थ इससे कहीं व्यापक है। वह उस पीढ़ी की प्रतिनिधि थीं, जिसने आजादी के सपने को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे साकार करने के लिए अपने हिस्से का जोखिम उठाया।
मेरी उस मुलाकात की स्मृति को शब्दों में पूरी तरह समेट पाना आसान नहीं है। फिर भी, आज उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें याद करने का मेरा उद्देश्य यही है कि हम उनके जीवन को केवल एक ऐतिहासिक घटना के सहारे न समझें, बल्कि उस पूरे संघर्ष को पहचानें, जिसका वह महत्वपूर्ण हिस्सा थीं।
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