Earth Life: मनुष्यों के कारण नाश की ओर जाती दुनिया
Earth Life:
भारत
RP Raghuvanshi
15 Apr 2023 03:48 PM
भारत
RP Raghuvanshi
15 Apr 2023 03:48 PM
Earth Life: समय आ चुका है कि हम जीवन जीने के पारंपरिक तरीके की तरफ लौटें। बढ़ता प्रदूषण, बदलती भौगोलिक परिस्थितियां इसी ओर संकेत कर रहीं हैं कि पृथ्वी हमारे कुकृत्यों से थक चुकी है। हमने दिन रात इसका हनन किया है, इसके खनिजों और प्राकृतिक संपदा को लूटा है, इस पर बसने वाली अन्य प्रजातियों पर अपना बेमतलब का वर्चस्व स्थापित किया है जिन पर हमारा कोई अधिकार नहीं। अपने बनाए गए कानून और नियम उन पर थोपे जिनसे वो बिल्कुल अनजान हैं, और ऐसा करके मानवता का झंडा ऐसे ऊंचा किया जैसे एक महान कर्म किया हो, नहीं ये कर्म नहीं ये दुष्कर्म है। हम स्वयं किसी जीव को परतंत्र करके स्वंत्रता के गीत कैसे गा सकते हैं?
मानव विकास के इतिहास में हमने मात्र छीना ही है, लूटा है, हत्याएं की हैं, प्रदूषण और गंदगी फैलाई है और अभी भी वही कर रहे हैं। तरक्की की होड़ में हम वहां आ चुके हैं जहां तबाही के सिवा कुछ नहीं रह गया है, जल प्रदूषण, भूमि प्रदूषण, वायु प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण इन सबके बारे में तो सब जानते हैं किंतु इनको खत्म या कम करने के पुख्ता प्रयास नहीं किए जा रहे या इनके विषय में सोचा ही नहीं जा रहा है, ये वो वास्तविकताएं हैं जो भाषणों और बहसों में एक शब्द भर बनके रह गए हैं।
मानवता नहीं पशुता
मुझे तो ये मानवता शब्द ही भ्रष्ट लगने लगा है, इसके स्थान पर पशुता का प्रयोग अधिक उचित और सार्थक है, क्योंकि मात्र पशु ही है जिसने आवश्कता से अधिक कभी नहीं चाहा, वो पशु ही है जो पृथ्वी की दयनीय दशा का उत्तरदाई नहीं, इसने जंगलों को नहीं काटा, जबरन किसी पर आधिपत्य नहीं किया, भूमि के टुकड़े करके उसका क्षेत्रीयकरण नहीं किया, अपनी सुविधानुसार नदियों के मार्ग नहीं परिवर्तित किए, पृथ्वी के गर्भ की चीरकर उसको चोट नहीं पहुंचाई।एक क्रमिक विकास की दौड़ ने हमें अन्यों से आगे क्या किया हम यह भूल ही गए कि हम क्या हैं? हम भी अन्यों की तरह एक जीव ही हैं तो कैसे हम सबसे उत्तम होने का दावा ठोकते हैं।यह भी एक कड़वा सत्य है कि हमारा इस धरा पर किसी प्रकार का कोई विशेष आधिपत्य नहीं, हमारा यहां पर होना पृथ्वी की अनुकंपा है और हमें ये कभी भी भूलना नहीं चाहिए।
दुनिया भर में वैज्ञानिकों द्वारा अन्य ग्रहों में जीवन की तलाश की जा रही है इनमें सबसे प्रचलित मार्स मिशन है, वर्तमान समय में मंगल ग्रह को इंसानों के दूसरे घर के रूप में देखा जा रहा है, वैज्ञानिकों के विभिन्न शोधों द्वारा ये अंदाज़े लगाए जा रहे हैं कि एक समय पहले वहां जीवन था। किन्तु सवाल फिर से ये उठता है कि इतना खर्च और समय लगाकर किसी मृत ग्रह को जानने से बेहतर क्या ये ना होगा कि हम हमारी मां यानि हमारी पृथ्वी का खयाल रखें, खर्चीले वैज्ञानिक शोध पृथ्वी तथा इस पर बसने वाली प्रजातियों के लिए किए जाएं।
लुप्त होती प्राकृतिक सम्पदा और प्रजातियां
कुछ ही सौ सालों में न जाने कितनी ही पशु–पक्षियों, पेड़–पौधों की प्रजातियां बदलते प्रदूषित वातावरण के कारण लुप्त हो चुकी हैं और आने वाले दशक भर में ही अन्य और प्रजीतियां लुप्त होकर मात्र किताबों और पिक्चर में रह जाएंगी और इन सब का कारण कोई और नहीं सिर्फ हम हैंl अब ऐसे में अन्य सवाल और उठते हैं कि हम किस प्रकार के जीवन की कामना कर रहे हैं? यदि किसी और ग्रह पर जीवन खोज भी लिया गया तो क्या होगा? क्या लूट खसूट की ये प्रवृत्ति वहां भी जारी नहीं रहेगी? जो हाल पृथ्वी का हुआ क्या वही हाल किसी और ग्रह का नहीं होगा? और एक अंतिम सवाल हम किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं?
मनुष्यों के कारण नाश की ओर जाती दुनियाकि वो भी पृथ्वी और इस पर बसने वाले कण–कण का खयाल रखे। मात्र भाषणों या सरकारी नियमों में नहीं वास्तविकता में भी अभी भी समय कि उस पाप से बच लिया जाए जिसका पश्चापात असंभव हो।
आकाश