सोशल मीडिया के दौर में फेसबुक या दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर की गई जातिसूचक टिप्पणी को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा- SC/ST Act में ‘Public View’ डिजिटल डोमेन तक पहुंच सकता है।

National News : सोशल मीडिया के दौर में फेसबुक या दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म पर की गई जातिसूचक टिप्पणी को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। अदालत ने कहा है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत ‘पब्लिक व्यू’ की अवधारणा केवल किसी भौतिक स्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार डिजिटल डोमेन तक भी इसका विस्तार हो सकता है। अदालत ने एक फेसबुक पोस्ट से जुड़े मामले में निचली अदालत द्वारा स्वीकार की गई ‘नो क्लू’ अंतिम रिपोर्ट को खारिज करते हुए मामले की आगे जांच के आदेश दिए हैं। National News
न्यायमूर्ति उदय कुमार ने 25 सितंबर 2026 को दिए फैसले में कहा कि SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के संदर्भ में ‘पब्लिक व्यू’ की अवधारणा को केवल भौतिक स्थान तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। अदालत के अनुसार डिजिटल माध्यम से प्रसारित सामग्री भी परिस्थितियों के आधार पर इस दायरे में आ सकती है।
यह मामला पश्चिम बंगाल के बेहाला थाना क्षेत्र से जुड़ा है। शिकायतकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से संबंधित है और उसने आरोप लगाया था कि फेसबुक के माध्यम से उसकी जाति, धर्म, भगवान और परिवार को लेकर कथित तौर पर आपत्तिजनक और जातिसूचक टिप्पणियां की गई थीं। National News
उपलब्ध अदालती विवरण के अनुसार शिकायत के आधार पर बेहाला पुलिस स्टेशन में SC/ST Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) के तहत मामला दर्ज किया गया था। शिकायतकर्ता की ओर से कथित फेसबुक पोस्ट के स्क्रीनशॉट और डिजिटल लिंक भी उपलब्ध कराए गए थे। जांच के दौरान शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया गया और स्वतंत्र गवाहों के बयान भी लिए गए। पुलिस ने संबंधित डिजिटल सामग्री और स्क्रीनशॉट को भी जब्त किया था। National News
जांच के दौरान पुलिस ने साइबर पुलिस स्टेशन के माध्यम से फेसबुक से कथित पोस्ट से जुड़े यूजर विवरण हासिल करने की कोशिश की। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से अपेक्षित यूजर डिटेल हासिल नहीं हो सकी। इसके बाद पुलिस ने ‘Final Report True—No Clue’ यानी ऐसी अंतिम रिपोर्ट दाखिल की, जिसमें मामले में आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त सुराग नहीं मिलने की बात कही गई थी। शिकायतकर्ता ने इस रिपोर्ट का विरोध करते हुए निचली अदालत में आपत्ति दाखिल की, लेकिन उसकी याचिका स्वीकार नहीं की गई और अंतिम रिपोर्ट को मंजूरी दे दी गई। National News
मामले में निचली अदालत ने शिकायतकर्ता द्वारा पहले दर्ज कराए गए कुछ अन्य मामलों का भी उल्लेख किया था। उन मामलों में चार्जशीट दाखिल होने का हवाला देते हुए वर्तमान मामले की ‘नो क्लू’ रिपोर्ट को स्वीकार किया गया था। कलकत्ता हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण को उचित नहीं माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक आपराधिक घटना का मूल्यांकन उसके अपने तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति से जुड़े दूसरे मामलों को आधार बनाकर अलग मामले की शिकायत को कमजोर नहीं माना जा सकता। National News
फैसले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू ‘पब्लिक व्यू’ की व्याख्या से जुड़ा है। अदालत ने कहा कि SC/ST Act की संबंधित धाराओं के तहत ‘पब्लिक व्यू’ केवल किसी सड़क, सार्वजनिक स्थान या भौतिक परिसर तक सीमित नहीं माना जा सकता। डिजिटल युग में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रसारित सामग्री भी व्यापक लोगों तक पहुंच सकती है। ऐसे में अदालत ने डिजिटल डोमेन को भी परिस्थितियों के अनुसार ‘पब्लिक व्यू’ के दायरे में माना है। National News
हाईकोर्ट ने जांच प्रक्रिया को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत के अनुसार यदि स्थानीय स्तर पर साइबर जांच के दौरान सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से यूजर की जानकारी नहीं मिलती है, तो इसे जांच समाप्त करने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता। अदालत ने मामले में विशेषज्ञ साइबर-फॉरेंसिक जांच की जरूरत बताई और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर आगे की जांच का रास्ता खोला। National News
कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले को आगे की जांच के लिए वापस भेजते हुए पुलिस को विशेषज्ञ साइबर-फॉरेंसिक संसाधनों का इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है। जांच की निगरानी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी या विशेष साइबर सेल के पर्यवेक्षी स्तर से किए जाने की बात कही गई है। अदालत ने डिजिटल फुटप्रिंट, प्रोफाइल लॉग और उपलब्ध अन्य तकनीकी साक्ष्यों की जांच करने के निर्देश भी दिए हैं। National News
अदालत ने आगे की जांच के बाद पुलिस को संबंधित विशेष अदालत के समक्ष रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया है। उपलब्ध अदालती विवरण के मुताबिक यह रिपोर्ट फैसले की सूचना मिलने के तीन महीने के भीतर दाखिल की जानी है। इस तरह हाईकोर्ट ने न केवल निचली अदालत के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें ‘No Clue’ रिपोर्ट स्वीकार की गई थी, बल्कि मामले में आगे की जांच का रास्ता भी साफ किया। National News
SC/ST (Prevention of Atrocities) Act की धारा 3(1)(r) और 3(1)(s) अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के सदस्य के खिलाफ जानबूझकर अपमान, धमकी या जाति के आधार पर अपमानजनक व्यवहार से जुड़े अपराधों से संबंधित हैं, जब कानून में निर्धारित परिस्थितियां पूरी होती हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट ने मौजूदा मामले में इन धाराओं के संदर्भ में ‘पब्लिक व्यू’ की व्याख्या को डिजिटल माध्यम तक विस्तारित माना। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सोशल मीडिया पर हर विवादित या आपत्तिजनक टिप्पणी स्वतः SC/ST Act के तहत अपराध साबित हो जाती है। किसी विशेष मामले में अपराध के कानूनी तत्व, उपलब्ध साक्ष्य और परिस्थितियों का मूल्यांकन जांच और अदालत द्वारा किया जाता है। National News
सोशल मीडिया पर कथित जातिसूचक टिप्पणियों से जुड़े मामले हाल के महीनों में अन्य अदालतों के सामने भी आए हैं। जुलाई 2026 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ कथित जातिसूचक फेसबुक पोस्ट से जुड़े मामले में आरोपी को डिस्चार्ज करने से इनकार किया था। अदालत ने कहा था कि चार्ज के स्तर पर अदालत को यह देखना होता है कि रिकॉर्ड पर प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं, न कि उस स्तर पर मिनी-ट्रायल करना। सितंबर 2026 में दिल्ली हाईकोर्ट ने भी यूट्यूबर अजीत भारती से जुड़े कथित जातिसूचक टिप्पणी मामले में अग्रिम जमानत से संबंधित याचिका पर फैसला सुनाया। उस मामले में अदालत ने SC/ST Act के तहत प्रथम दृष्टया मामला होने और अधिनियम में अग्रिम जमानत से जुड़े वैधानिक प्रावधानों पर विचार किया। National News
मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग मामले में कहा था कि निजी आवास के भीतर, जहां घटना सार्वजनिक मौजूदगी या दृश्यता के दायरे में न हो, जातिसूचक गाली के आरोप पर SC/ST Act की संबंधित धाराएं लागू करने के लिए ‘public view’ की आवश्यक शर्त पूरी नहीं होती। कलकत्ता हाईकोर्ट का ताजा फैसला डिजिटल माध्यम की परिस्थितियों पर केंद्रित है। इसलिए दोनों मामलों में मुख्य अंतर घटना के संदर्भ और कथित कृत्य के सार्वजनिक/डिजिटल प्रसार से जुड़ा है। National News
कलकत्ता हाईकोर्ट का फैसला डिजिटल प्लेटफॉर्म पर कथित जातिसूचक सामग्री से जुड़े मामलों की जांच के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। फैसले से यह स्पष्ट होता है कि सोशल मीडिया पर प्रकाशित सामग्री को केवल इसलिए जांच के दायरे से बाहर नहीं माना जा सकता कि वह किसी पारंपरिक भौतिक सार्वजनिक स्थान पर नहीं कही गई।
हालांकि, किसी पोस्ट, टिप्पणी या वीडियो पर कानूनी कार्रवाई का निर्धारण संबंधित कानून की शर्तों, कथित सामग्री, उसके प्रसार, उपलब्ध डिजिटल साक्ष्य और मामले के अन्य तथ्यों पर निर्भर करेगा। National News
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