राजनीति और झूठ का चोली-दामन का साथ है। जहां राजनीति हो वहां झूठ न हो यह तो कदापि संभव नहीं है। नेता जब तक दिन में दस-पांच झूठ न बोल लें, तब तक उनका हाजमा दुरुस्त नहीं होता है। महर्षि वेदव्यास ने पांच स्थितियों में झूठ बोलने को पाप नहीं माना है। विवाह काल में, प्रेम प्रसंग में, किसी के प्राणों पर संकट आने पर, सर्वस्व लुटते देखकर तथा किसी ज्ञानी या विद्वान व्यक्ति के लिए आवश्यकता होने पर झूठ बोला जा सकता है।
नेताओं पर ऐसा कोई नियम अथवा प्रतिबंध लागू नहीं होता है। वो जब चाहें, जैसा चाहें, जितना चाहें झूठ बोलने के लिए स्वतंत्र हैं। शास्त्रों का निर्देश है- सत्यं ब्रूयात्, प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् अप्रियम- अर्थात् सत्य बोलें लेकिन प्रिय सत्य बोलें, अप्रिय सत्य नहीं। इसका मतलब यह है कि हमेशा सच बोलना ही ठीक नहीं।
नेताओं ने इस निर्देश की अंतिम पंक्ति को आत्मसात कर लिया और उनके लिए लगभग सभी सत्य अप्रिय हो गये, इसलिये मजबूरी में सच से ज्यादा झूठ बोलने लगे। यह तो रहा नेताओं का दृष्टिकोण। लेकिन उस जनता का क्या जो नेताओं के झूठ पर जोर-जोर से हथेलियां पीटती है और झूठे नेताओं की जय-जयकार करती है। इसके दो कारण समझ में आते हैं-नम्बर एक-जनता इतनी कूढ़ मगज है कि उसे झूठ-सच में भेद करने की अक्ल नहीं है और नम्बर दो- नेता इतनी सफाई से, इतने प्रभावशाली ढंग से झूठ को थाली में सजाकर पेश करते हैं कि जनता मंत्रमुग्ध होकर उसी में सच का स्वाद महसूस करने लगती है। नेता और उसके दल का तथाकथित संकल्प-पत्र/घोषणा पत्र झूठ का पुलिन्दा होता है, जिस पर भोली जनता कुछ अच्छा होने की आशा में भरोसा कर लेती है। तमाम देशों की भुक्तभोगी जनता झूठे नेताओं द्वारा बार-बार छली जाती है और विकल्पों के अभाव में एक झूठे को ठुकराकर दूसरे झूठ के पीछे चली जाती है। यही मतदाता की नियति है।
एक झूठा व्यक्ति, एक ऐसा व्यक्ति है जो झूठ बोल रहा है, जो पहले भी झूठ बोल चुका है या जो जरूरत ना होने पर भी आदतन झूठ बोलता रहता है। इस श्रेणी में नेताओं को रखा जा सकता है क्योंकि उनका काम बिना झूठ के चल ही नहीं सकता है, ऐसा वे स्वयं मान बैठते हैं। दूसरी तरफ यह कैसे संभव है कि लोकतंत्र के गौरवशाली इतिहास वाले समाज में झूठ बोलने वाले नेता लोगों की पहली पसंद कैसे बन गये, कैसे बन जाते हैं? सत्य की हत्या का प्रयास करने वालों के प्रति जनता का प्रेम आखिर क्यों उमड़ता है? यह शोध का विषय है कि एक व्यक्ति कांच के टुकड़े को बहुमूल्य नगीना बताता है और लोग सहज भाव से उसके झूठ को सच के रूप में स्वीकार कर लेते है- आखिर क्यों? क्या भोली जनता बड़े नेताओं के बड़े से बड़े झूठ को इसलिये नजरअंदाज कर देती है क्योंकि उसे समझा दिया जाता है कि उनका नेता बड़े उद्देश्यों के लिए लड़ रहा है।
तमाम लोग हैं जिन्होंने राजनीति में सच्चाई और ईमानदारी की उम्मीद बिल्कुल ही छोड़ दी है और ऐसा इसलिए है कि वे राजनीति की कोशिकाओं में झूठ के कैंसर को बहुत तेजी से फैलते देख पा रहे हैं। तमाम लोग ऐसे भी हैं जो इस कैंसर को नजरअंदाज कर रहे हैं लेकिन कुछ लोग साहस का परिचय देते हुए झूठ पर अंकुश लगाने की ईमानदार कोशिश भी कर रहे हैं। एक समय अमरीका में तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लाइव भाषण को चैनलों ने बीच ही में इसलिये रोक दिया था, क्योंकि ट्रंप लगातार झूठ बोल रहे थे।
अमरीका में ऐसा संभव है, लेकिन भारत में ऐसा करने का साहस मीडिया में नहीं है। मीडिया तो ब्रेकिंग न्यूज से लेकर, स्क्रोल और विस्तृत खबरों में बार-बार लगातार नेता द्वारा बोले गये झूठ को परोसकर जनता के मानस में उसे सत्य के रूप में स्थापित करने के बाद ही दूसरे किसी समाचार पर आती है। यह हमारे लोकतंत्र की विडम्बना है। जहां राजनीति होगी, वहां लोकनीति और लोकतंत्र कहां पनप सकता है। जनतंत्र है, गणतंत्र है परंतु जननीति नहीं है, गणनीति नहीं है, राजनीति है। राजनीति की एक परिभाषा है-‘शासन में पद प्राप्त करना तथा सरकारी पद का उपयोग करना राजनीति है।’ नेता राजनीति के इसी अर्थ को मुख्य रूप से अपनाते हैं और जनता द्वारा चुने जाने के बावजूद जननेता नहीं बन पाते हैं, राजनेता बनकर राज करते हैं।