भारत की एक जाति 450 साल से निभा रही है पूर्वजों का वचन, महाराणा प्रताप के हैं वंशज
महाराणा प्रताप के वंशज
भारत
चेतना मंच
24 Feb 2024 09:25 PM
Gadia Lohar : भारत एक महान देश है। अलग-अलग धर्म, जाति तथा अनेक संस्कृति भारत को दुनिया के तमाम देशों से अलग करते हैं। भारत में जाति व्यवस्था का एक लंबा इतिहास है। पूरे भारत देश में 36 जाति मुख्य जाति मानी जाती हैं। इन्हीं 36 जातियों (बिरादरी) में एक ऐसी अद्भुत जाति भी है जो पिछले 450 साल से लगातार अपने पूर्वजों को दिया गया वचन (प्रतिज्ञा) निभा रही है। भारत की इस जाति के पूर्वजों में भारत के प्रसिद्ध योद्धा महाराणा प्रताप का नाम भी शामिल है।
भारत की जाति की महान प्रतिज्ञा
आपको बता दें कि आज से 450 पहले वर्ष 1576 में प्रसिद्ध वीर योद्धा महाराणा प्रताप अकबर से युद्ध हार गए थे। इस हार के बाद महाराणा प्रताप जंगलों में छुपकर रहने को विवश हो गए थे। उसी समय भारत की एक खास जाति के नागरिकों ने महाराणा प्रताप को एक वचन देकर प्रतिज्ञा की थी कि जब तक महाराणा प्रताप अपने राज्य चित्तौडग़ढ़ पर पुन: जीत हासिल नहीं कर लेते हैं तब तक उनकी जाति के लोग वापस अपनी मातृभूमि पर नहीं लौटेंगे। इतना ही नहीं इस जाति ने यह वचन भी महाराणा प्रताप को दिया था कि वे महाराणा प्रताप की विजय तक कहीं भी एक स्थान पर नहीं बसेंगे। हम यहां भारत की उस अद्भुत जाति के विषय में आपको बता रहे हैं।
कौन सी जाति है जो निभा रही है वचन
आपको बता देते हैं कि भारत की इस अद्भुत जाति का नाम गाड़िया लोहार (Gadia Lohar) है। कहीं-कहीं आपको सडक़ किनारे कुछ लोग लोहे के बर्तन और घरेलू इस्तेमाल वाले औजार बेचते हुए दिखते होंगे। ये लोग पूरे परिवार के साथ सडक़ किनारे अस्थायी तौर पर बस जाते हैं. फिर कुछ समय बाद उस जगह को छोडक़र दूसरी जगह चले जाते हैं। ज्यादातर लोगों को लगता है कि ये बंजारे हैं. लेकिन, हम आपको बता दें कि ये बंजारे नहीं है। दरअसल, ये खानाबदोश और मुश्किल हालात में फटेहाल जीवन जी रहे लोग आम नहीं, बेहद खास हैं। ये सडक़ किनारे रहने वाले लोग गाड़िया लुहार हैं।
गाड़िया लोहार समुदाय को गाडुलिया लोहार या सिर्फ लोहार भी कहा जाता है। गाड़िया लोहार राजस्थान और उत्तर प्रदेश का खानाबदोश समुदाय है. ये मध्य प्रदेश के मालवा क्षेत्र में भी पाए जाते हैं. ये लोहे के बर्तन और घरों में इस्तेमाल होने वाले औजार बनाकर गुजर-बसर करते हैं. इसके अलावा ये समुदाय कृषि और बागवानी में इस्तेमाल होने वाले छोटे औजार भी बनाते हैं।
Gadia Lohar
गाड़िया लोहार कैसे पड़ा इस जाति का नाम ?
इस समुदाय के लोग अपने परिवारों के साथ बैलगाड़ी पर एक जगह से दूसरी जगह तक जाते हैं. इसे हिंदी में गाड़ी कहा जाता है. इसलिए इनका नाम ‘गाड़िया लोहार’ पड़ा। वह लिखते हैं कि गाडिय़ा लोहार समुदाय के पूर्वज मेवाड़ की सेना में लोहार थे. वे मेवाड़ के महाराणा प्रताप के वंशज होने का दावा भी करते हैं। जब मेवाड़ पर मुगलों ने कब्जा कर लिया, तो महाराणा प्रताप जंगल की ओर चले गए. जंगल में उनकी मुलाकात गाड़िया लोहार जाति के नागरिकों से हुई।
‘गाड़िया लोहार’ समुदाय के पूर्वजों ने परिवार के साथ जंगल में भटक रहे महाराणा प्रताप को कसम दी थी कि जब तक वह चित्तौडग़ढ़ पर वापस जीत हासिल नहीं कर लेते, तब तक वे कभी भी अपनी मातृभूमि नहीं लौटेंगे और ना ही कभी कहीं बसेंगे। उन्होंने प्रतिज्ञा दी कि महाराणा प्रताप के चित्तौडग़ढ़ लौटने तक उनके परिवार कभी भी एक छत के नीचे नहीं रहेंगे। दुर्भाग्य से महाराणा प्रताप कभी चित्तौड़ नहीं जीत पाए. इसलिए लोहार समुदाय आज भी महाराणा को वर्ष-1576 में दी गई अपनी प्रतिज्ञा पर कायम हैं। इसीलिए वे ना तो किसी एक जगह बसते हैं और ना ही घर बनाते हैं. उनकी पूरी जिंदगी एक बैलगाड़ी में ही सिमटी रहती है।
घुमंतू जनजाति Gadia Lohar अपने अनोखे और कठोर परिश्रम से दुनिया भर में जाने जाते हैं. इस जनजाति के लोग पूरी जिंदगी इधर-उधर घूमकर सडक़ के किनारे निकाल देते हैं. आज भी ये लोग सडक़ किनारे कच्चे घर बनाकर अपना पूरा जीवन बिता देते हैं. महाराणा प्रताप के लिए हथियार बनाने वाले गाड़िया लोहार अब दो वक्त की रोटी के लिए पूरे-पूरे दिन लोहे के औजार बनाते हैं। समुदाय के लोगों की सजी-धजी गाड़िया इनकी पहचान बनी हुई हैं. हालांकि, अब ऐसी सजी-धजी गाड़िया इनके सडक़ किनारे कच्चे घरों में ही दिखती हैं. पहले वे इन गाड़ियों से ही व्यापार करने जाते थे. समय के साथ लोहे के औजारों का इस्तेमाल कम होने के कारण अब लोग रिक्शा गाड़ी का इस्तेमाल करने लगे हैं।Gadia Lohar
गाड़िया लोहार समुदाय के पूर्वज महाराणा प्रताप की सेना में शामिल थे. वे उनकी सेना के लिए घातक हथियार बनाते थे। इस समुदाय ने महाराणा प्रताप के किला छोडऩे के बाद ही चित्तौडग़ढ़ छोड़ दिया था। तब से देश के अलग-अलग हिस्सों में भटक रहे इस समुदाय को कोई सरकार सुविधा नहीं मिल पाती है. यही नहीं, जरूरी कागजात नहीं होने के कारण उनके बच्चों को स्कूलों में दाखिला भी नहीं मिल पाता है. हालांकि, अब समुदाय के कुछ लोगों ने अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया है। देश में आधुनिक मशीनें आने के बाद से लोग उनके औजारों को कम ही खरीदते हैं. ऐसे में कबीले के सदस्यों को दो वक्त की रोटी के लिए लोहा-प्लास्टिक बीनकर और मेहनत मजदूरी तक करनी पड़ रही है। तो जाना आपने भारत की इस अद्भुत जाति के विषय में। यदि आपको यह जानकारी पसंद आई हो तो आप अपने मित्रों तथा परिचितों को भी पढ़वा सकते हैं।