जम्मू-कश्मीर के गांदरबल में 1997 के अपहरण-हत्या मामले में 23 साल की सुनवाई के बाद अदालत ने दो आरोपियों को बरी किया। मृतक के परिवार के मुआवजे पर भी निर्देश दिए। पढ़े पूरी खबर।

National News: जम्मू-कश्मीर के गांदरबल में करीब 29 साल पुराने अपहरण और हत्या के मामले में अदालत ने दो आरोपियों को बरी कर दिया है। लगभग 23 वर्षों तक चली सुनवाई के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश फौजिया पॉल की अदालत ने फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष दोनों आरोपियों की अपराध में संलिप्तता को संदेह से परे साबित करने में नाकाम रहा। इसी आधार पर इरशाद अहमद सोफी और मोहम्मद यासीन सोफी को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। इस मामले में अदालत ने मृतक की पत्नी और अन्य पात्र आश्रितों के मुआवजे तथा पुनर्वास पर विचार करने की सिफारिश भी की है।
यह मामला गांदरबल के बदरगुंड निवासी गुलाम नबी मलिक के अपहरण और हत्या से जुड़ा है। उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार, 21 जून 1997 को मलिक को उनके घर से अगवा किया गया था। इस घटना के करीब दो महीने बाद 16 अगस्त 1997 को उनका शव गांदरबल की पावर कैनाल से बरामद हुआ था। मामले में गांदरबल पुलिस स्टेशन में एफआईआर संख्या 173/1997 दर्ज की गई थी। शुरुआत में स्थानीय पुलिस ने इसकी जांच की। बाद में मई 1999 में मामले की आगे की जांच श्रीनगर क्राइम ब्रांच को सौंप दी गई। जांच के दौरान अपहरण, हत्या, आपराधिक साजिश और सबूत मिटाने सहित कई गंभीर आरोप लगाए गए थे।
अभियोजन पक्ष की कहानी के मुताबिक, एक आरोपी के परिवार की लड़की के साथ कथित अभद्र व्यवहार की घटना के बाद दोनों परिवारों के बीच दुश्मनी पैदा हो गई थी। आरोप था कि इसी पुरानी रंजिश के चलते गुलाम नबी मलिक के अपहरण और हत्या की साजिश रची गई। जांच के दौरान कुछ अन्य लोगों और सुरक्षा बलों से जुड़े व्यक्तियों की भूमिका को लेकर भी आरोप सामने आए थे। मामले में एक व्यक्ति सरकारी गवाह बना था। उसने मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान भी दर्ज कराया था, लेकिन बाद में वह अपने बयान से मुकर गया। इससे अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों पर असर पड़ा।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश फौजिया पॉल की अदालत ने 106 पन्नों के फैसले में अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और गवाहों के बयानों का विश्लेषण किया। अदालत ने पाया कि मामले में पेश किए गए साक्ष्यों में कई महत्वपूर्ण विरोधाभास थे। अदालत के मुताबिक, अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर पाया कि इरशाद अहमद सोफी और मोहम्मद यासीन सोफी अपहरण, हत्या या शव को ठिकाने लगाने की घटना में शामिल थे। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि केवल संदेह, सुनी-सुनाई बातों या पुरानी दुश्मनी के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। किसी भी आरोपी के खिलाफ आरोपों को ठोस साक्ष्यों के आधार पर संदेह से परे साबित करना जरूरी है। इसी कानूनी आधार पर दोनों आरोपियों को सभी आरोपों से बरी कर दिया गया।
फैसले में अदालत ने मृतक गुलाम नबी मलिक की पत्नी हफीजा और अन्य पात्र आश्रितों के मुआवजे तथा पुनर्वास के मुद्दे पर भी ध्यान दिया। अदालत ने फैसले की प्रति और संबंधित दस्तावेज जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), गांदरबल को भेजने का निर्देश दिया।
DLSA को परिवार की आर्थिक स्थिति, पुनर्वास की जरूरतों और पहले मिली किसी आर्थिक सहायता या मुआवजे की जानकारी की जांच करनी होगी। इसके बाद नियमानुसार उचित निर्णय लिया जाएगा। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवजे की सिफारिश अपने आप में आर्थिक सहायता की मंजूरी नहीं है और न ही इससे मिलने वाली राशि तय होती है।
करीब तीन दशक पहले दर्ज हुए इस मामले की सुनवाई में लगभग 23 साल लगे। अदालत के फैसले के साथ ही आरोपियों के खिलाफ चली लंबी कानूनी कार्यवाही समाप्त हो गई। अदालत ने अपने फैसले में यह स्पष्ट किया कि पीड़ित परिवार के प्रति सहानुभूति अपनी जगह है, लेकिन किसी भी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय कानूनी साक्ष्य होना जरूरी है।
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