देश के अलग-अलग राज्यों में स्कूली छात्रों के प्रदर्शन ने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और झारखंड में छात्रों ने स्कूलों से जुड़ी अलग-अलग समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किया।

Education News : देश के अलग-अलग राज्यों में स्कूली छात्रों के प्रदर्शन ने शिक्षा व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और झारखंड में छात्रों ने स्कूलों से जुड़ी अलग-अलग समस्याओं को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। कहीं शिक्षकों की कमी से परेशान छात्रों और ग्रामीणों ने स्कूल में तालाबंदी कर दी तो कहीं खराब भोजन, दूषित पानी और गंदे शौचालयों के खिलाफ बच्चे धरने पर बैठ गए। उत्तर प्रदेश में बिजली, पंखे और पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं को लेकर बड़ी संख्या में छात्रों ने आवाज उठाई। वहीं झारखंड में पसंदीदा शिक्षक के तबादले का विरोध हिंसक प्रदर्शन में बदल गया।
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राजस्थान के जालोर जिले के मेंगलवा स्थित पीएम श्री स्कूल में शिक्षकों की कमी को लेकर छात्रों, अभिभावकों और ग्रामीणों ने विरोध किया। प्रदर्शनकारियों ने स्कूल के मुख्य गेट पर ताला लगा दिया और धरने पर बैठ गए। बताया गया कि स्कूल में स्वीकृत 25 पदों के मुकाबले केवल सात कर्मचारी कार्यरत हैं, जबकि करीब 340 विद्यार्थी यहां पढ़ते हैं।
प्रदर्शन के बाद शिक्षा विभाग के अधिकारी मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने तत्काल कुछ शिक्षकों की अस्थायी व्यवस्था करने और खाली पदों को भरने का आश्वासन दिया, जिसके बाद प्रदर्शन समाप्त किया गया। शिक्षकों की कमी का असर हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और संस्कृत जैसे प्रमुख विषयों की पढ़ाई पर पड़ने की बात सामने आई है।
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उत्तराखंड के ऊधम सिंह नगर जिले के खटीमा स्थित एकलव्य मॉडर्न आवासीय विद्यालय में भी छात्रों ने स्कूल की व्यवस्थाओं के खिलाफ मोर्चा खोला। छात्रों ने खराब गुणवत्ता वाले भोजन, पीने के पानी की समस्या और शौचालयों में सफाई की कमी का आरोप लगाया। छात्रों ने स्कूल परिसर में धरना देकर अपनी समस्याएं सामने रखीं। मामला मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक पहुंचने के बाद प्रशासन ने कार्रवाई की। रिपोर्टों के अनुसार मुख्यमंत्री के निर्देश पर विद्यालय की प्रधानाचार्य को पद से हटाया गया। छात्रों के प्रदर्शन ने यह सवाल भी खड़ा किया कि आवासीय स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को भोजन, साफ पानी और स्वच्छ शौचालय जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए भी आंदोलन करना क्यों पड़ रहा है।
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उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले के किशनपुर स्थित सर्वोदय इंटर कॉलेज में बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं स्कूल की बुनियादी सुविधाओं को लेकर प्रदर्शन पर उतर आए। छात्रों की शिकायतों में बिजली और पंखों की कमी, खराब वायरिंग, साफ पेयजल का अभाव और शौचालयों की खराब स्थिति शामिल थी। छात्रों का कहना था कि स्कूल प्रशासन के सामने समस्याएं रखने के बावजूद लंबे समय तक समाधान नहीं हुआ। इसके बाद करीब 1800 छात्र स्कूल परिसर और गेट के आसपास प्रदर्शन करने लगे। अधिकारियों के मौके पर पहुंचने के बाद छात्रों की समस्याएं सुनी गईं और संबंधित विभागों को जरूरी कार्रवाई के निर्देश दिए गए।
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उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में स्कूली बच्चों ने अपने गांव तक खराब सड़क को लेकर आवाज उठाई। चंदूपुर मार्ग की बदहाली से परेशान बच्चों और ग्रामीणों ने हाथों में तिरंगा लेकर करीब पांच किलोमीटर पैदल मार्च किया और प्रशासन के सामने अपनी मांग रखी।
ग्रामीणों के मुताबिक बरसात में रास्ते पर कीचड़ और पानी भरने से आवागमन मुश्किल हो जाता है। इसका सीधा असर स्कूली बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ता है। ग्रामीणों ने सड़क निर्माण की मांग को लेकर प्रशासन से जल्द कार्रवाई की अपील की।
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झारखंड के गढ़वा जिले के कांडी में पसंदीदा शिक्षक मलय सिंह के तबादले के विरोध में छात्रों का आंदोलन गंभीर रूप ले गया। छात्र कई दिनों से शिक्षक का तबादला रद्द करने की मांग कर रहे थे। गुरुवार को प्रदर्शन के दौरान स्थिति बिगड़ गई और सड़क जाम के बाद पुलिस के साथ भी टकराव की स्थिति बनी। रिपोर्टों के मुताबिक छात्रों को समझाने पहुंचे प्रखंड प्रमुख और प्रदर्शनकारियों के बीच विवाद हुआ। इसके बाद एक छात्र को थप्पड़ मारे जाने के आरोप से छात्र और भड़क गए। प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ की और बाद में पुलिस पर पथराव भी हुआ, जिसमें पुलिसकर्मी घायल हुए।
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राजस्थान, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और झारखंड में सामने आई घटनाओं के मुद्दे अलग-अलग हैं, लेकिन इन सभी में छात्रों की समस्याएं सीधे शिक्षा और स्कूल व्यवस्था से जुड़ी हैं। कहीं शिक्षक पर्याप्त नहीं हैं, कहीं भोजन और पेयजल की गुणवत्ता सवालों के घेरे में है, तो कहीं स्कूल की बुनियादी सुविधाएं विद्यार्थियों के लिए परेशानी का कारण बनी हुई हैं। इन घटनाओं से यह संकेत मिलता है कि नई पीढ़ी अपनी समस्याओं को लेकर पहले की तुलना में अधिक मुखर हो रही है। हालांकि छात्रों का विरोध लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने तक सीमित रहे, यह जिम्मेदारी प्रशासन और स्कूल प्रबंधन की भी है कि बच्चों की शिकायतों को समय रहते सुना जाए और वास्तविक समस्याओं का स्थायी समाधान किया जाए।
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