
George Soros Story : भारत के प्रधानमंत्री पर हल्ला बोलने वाले अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस (George Soros) के बयान को लेकर अभी भी हड़कंप मचा हुआ है। सेरोस को सनकी बुड्ढा भी कहा जा सकता है। क्योंकि जिस तरह की वह हरकत कर रहे हैं, वह सनकी व्यक्ति ही कर सकता है। उनके दिमाग में जो सनक उभर रही है, क्या वह उसके जरिए भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था में बदलाव कर पाएंगे। आज हम जानेंगे कि यह सनकी बड्ढा जॉर्ज सोरोस है कौन? चेतना मंच ने जॉर्ज सोरोस की पूरी कहानी को परखा है, आप भी जानिए।
आपको बता दें कि जॉर्ज सोरोज अमेरिकी अरबपति है। उनकी एक वेबसाइट भी है, जिस पर रोजाना लाखों विजिटर आते हैं। जॉर्ज की वेबसाइट के अनुसार, 1930 में हंगरी के बुडापेस्ट में एक यहूदी परिवार में उनका जन्म हुआ था। जब वो 9 साल के थे, तभी द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो गया। इस वक्त हंगरी में यहूदियों को खोज-खोज कर मारा जा रहा था। सोरोस के परिवार ने इस नरसंहार से बचने के लिए झूठी आईडी बनवा रखी थी।
जब 1945 में द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त हुआ तो हंगरी में कम्युनिस्ट सरकार बनी। यही वो समय था जब सोरोस के परिवार ने देश छोड़ने का फैसला किया। 1947 में सोरोस अपने परिवार के साथ बुडापेस्ट से लंदन आ गए। लंदन पहुंचने के बाद सोरोस के परिवार के सामने सबसे बड़ी चुनौती खाने और रहने की थी। पेट भरने के लिए उन्होंने कुली और वेटर का काम किए। इसी कमाई से वो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में पढ़ाई का खर्च निकालते थे।
पढ़ाई पूरी करने के बाद जॉर्ज सोरोस 1956 में लंदन से अमेरिका आ गए। अमेरिका में सोरोस ने फाइनेंस और इंवेस्टमेंट सेक्टर में काम करने का फैसला किया। यह फैसला उसके लिए सही साबित हुआ।
1973 में 'सोरोस फंड मैनेजमेंट' के नाम से कंपनी बनाई। इसके बाद अमेरिकी शेयर मार्केट में पैसा इंवेस्ट करना शुरू कर दिया। अगले 6 साल यानी 1979 तक सोरोस इतने सफल बिजनेसमैन बन गए कि वह रंगभेद का सामना कर रहे ब्लैक छात्रों को स्कॉलरशिप देने लगे और दुनिया के सबसे बड़े करेंसी ट्रेडर के तौर पर मशहूर हो गए।
जॉर्ज सोरोस की कमाई वर्ष 1992 में यूरोपीय देशों ने अपनी करेंसी वैल्यू को स्थिर और मजबूत बनाने के लिए एक्सचेंज रेट मैकेनिज्म शुरू किया था। इसके तहत दो या ज्यादा देश अपने पैसों के वैल्यू को फिक्स कर देते हैं।
1989 से पहले जर्मनी तेजी से विकसित हो रहा था, लेकिन बर्लिन की दीवार गिरने के साथ ही यहां की अर्थ व्यवस्था पूरी तरह से तबाह होने लगा। इसी वक्त यूके ने जर्मनी के साथ एक्सचेंज रेट मैकनिज्म के तहत करेंसी की वैल्यू फिक्स कर दी। जिससे जर्मनी की कमजोर हो रही करेंसी को मजबूती मिले।
जर्मनी की करेंसी मजबूत होना तो दूर, यूके के पाउंड की वैल्यू भी गिरने लगी। यूके सरकार ने इससे बचने के लिए इंट्रेस्ट रेट बढ़ाए। इसके बावजूद जर्मन करेंसी की वैल्यू घटती रही। इसी समय जॉर्ज सोरोस ने यूके की करेंसी पर शॉर्ट पोजिशन ले ली।
16 सितंबर 1992 को जर्मनी के सेंट्रल बैंक ने सहयोगी देशों से अपने करेंसी के वैल्यू को नए सिरे से तय करने की मांग की। इसके बाद यूके ने जर्मनी के साथ हुए एक्सचेंज रेट मैकनिज्म एग्रीमेंट को तोड़ दिया। इससे दोनों देशों की करेंसी धड़ाम हो गई।
बैंक ऑफ इंग्लैंड तबाह हो गया और इस सबसे सोरोस ने 1 अरब डॉलर से ज्यादा कमाए। इसी तरह मलेशिया और थाईलैंड की करेंसी पर शॉर्ट पोजिशन लेकर सोरोस ने खूब पैसा कमाया।
1995 में जॉर्ज सोरोस को लग गया था कि एशियन कंट्री मलेशिया और थाईलैंड के करेंसी की कीमत जरूरत से ज्यादा है।
इसी वजह से उसने इन दोनों देशों की ढेर सारी करेंसी खरीद ली। 1997 में जब एशियाई देशों में मंदी आई तो मलेशिया की करेंसी में 50 प्रतिशत और थाइलैंड की करेंसी में 45 प्रतिशत तक गिरावट आई। इससे एक बार फिर सोरोस ने खूब पैसा कमाया। इस वक्त जॉर्ज सोरोस की नेटवर्थ 71 हजार करोड़ रुपए से भी ज्यादा है।
100 देशों तक पहुंच सोरोस ने 1993 में ‘ओपन सोसाइटी फाउंडेशन’ की शुरुआत की। इसके जरिए शिक्षा, स्वास्थ्य और मानवाधिकार के क्षेत्र में काम किया और करीब 100 देशों में पहुंच बनाई। उनकी वेबसाइट पर दावा किया है कि वह अब तक 32 अरब डॉलर दान कर चुके हैं। वो कई दूसरी इंटरनेशनल संस्थाओं को भी फंड करते हैं।
सोरोस की संस्था ने 1999 में पहली बार भारत में एंट्री की। पहले ये भारत में रिसर्च करने वाले स्टूडेंट को स्कॉलरशिप देती थी। 2014 में ओपन सोसाइटी ने भारत में दवा, न्याय व्यवस्था को बेहतर बनाने और विकलांग लोगों को मदद करने वाली संस्थाओं को आर्थिक सहायता देना शुरू किया। 2016 में भारत सरकार ने देश में इस संस्था के जरिए होने वाली फंडिंग पर रोक लगा दी।
जॉर्ज सोरोस के 4 मशहूर किस्से
1. जॉर्ज सोरोस अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी को सबसे ज्यादा चंदा देने वाले लोगों में से एक हैं। 2003 में अपने एक इंटरव्यू में जॉर्ज सोरोस ने अमेरिकी सरकार को गिराने की चुनौती दी थी। उन्होंने कहा था कि जॉर्ज डब्ल्यू बुश की सरकार को गिराना उनके जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।
सोरोस ने बुश को हराने के लिए करीब 125 करोड़ रुपये खर्च करने की बात स्वीकार की थी। हालांकि जॉर्ज बुश वो चुनाव जीत गए। इसके बाद बराक ओबामा, हिलेरी क्लिंटन और जो बाइडेन को राष्ट्रपति बनाने के लिए जॉर्ज सोरोस ने खूब पैसा खर्च किया।
हंगरी, टर्की, सर्बिया और म्यांमार में होने वाले सरकार विरोधी लोकतांत्रिक आंदोलनों का सोरोस ने खुलकर समर्थन किया। इन आंदोलनों के सपोर्ट के लिए सोरोस ने फंडिंग भी की।
2. एक बार फॉक्स न्यूज से जॉर्ज सोरोस काफी ज्यादा चिढ़ गए थे। वह खुलकर इस मीडिया कंपनी से टकरा गए। इसके बाद सोरोस ने 1 मिलियन डॉलर फॉक्स न्यूज को बर्बाद करने के लिए खर्च कर दिए। ये पैसा जॉर्ज सोरोस ने मीडिया मैटर्स नाम की एक वेबसाइट को दिया था। 2004 में लॉन्च होने के बाद इस वेबसाइट ने फॉक्स न्यूज के खिलाफ एक के बाद एक कई रिपोर्ट पब्लिश की। इस वेबसाइट ने फॉक्स न्यूज को रिपब्लिकन पार्टी का मुखपत्र बताना शुरू कर दिया।
मीडिया मैटर्स ने बाद में बताया था कि फॉक्स न्यूज की फेक रिपोर्ट का खुलासा करके न्यूज कंपनी को जवाबदेह बनाने के लिए ये पैसा खर्च किया गया था।
3. जॉर्ज सोरोस चाहते थे कि यूनाइटेड किंगडम यूरोपीय यूनियन का ही हिस्सा रहे। इसके लिए उनके कहने पर ब्रिटेन में यूरोपीयन यूनियन में रहने के लिए कैंपेन चलाया गया। गार्डियन ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि इस कैंपेन पर 4 लाख पाउंड से ज्यादा खर्च हुआ। ब्रिटेन में सोरोस के पैसे पर इस कैंपेन की अध्यक्षता ब्रिटेन सरकार के पूर्व मंत्री और संयुक्त राष्ट्र के उप महासचिव लॉर्ड मैलोच-ब्राउन कर रहे थे।
4. 2017 में जॉर्ज सोरोस ने अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को 'ठग' कह दिया था। सोरोस ट्रंप से इतना ज्यादा चिढ़ गए थे कि उसने कहा था कि ट्रंप ट्रेड वॉर शुरू करने की तैयारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा था कि इससे फाइनेंशियल मार्केट और ज्यादा खराब परफॉर्म करेंगे। देश की इकोनॉमी पर इसका सीधा असर पड़ेगा।
इसी तरह सोरोस चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बन की भी जमकर आलोचना कर चुके हैं।