Republic Day 2026: 15 अगस्त और 26 जनवरी पर तिरंगा फहराने का तरीका क्यों है अलग? जानिए पूरा इतिहास

15 अगस्त और 26 जनवरी पर तिरंगा फहराने का तरीका केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत के स्वतंत्रता संग्राम और संवैधानिक विकास की कहानी को दर्शाता है। दोनों दिन राष्ट्रीय गौरव से जुड़े हैं, लेकिन उनका संदेश और ऐतिहासिक संदर्भ अलग-अलग है।

Flag Unfurling
तिरंगा फहराने की दो अलग कहानियां (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar19 Jan 2026 06:52 PM
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देश साल 2026 में अपना 77वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। राजधानी दिल्ली के कर्तव्य पथ पर भव्य परेड की तैयारियां अंतिम चरण में हैं। हर वर्ष की तरह 26 जनवरी की सुबह देश के राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहराया जाएगा। हालांकि, बहुत कम लोग जानते हैं कि 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) और 26 जनवरी (गणतंत्र दिवस) पर तिरंगा फहराने की प्रक्रिया एक जैसी नहीं होती। इसके पीछे आज़ादी और संविधान से जुड़ा गहरा ऐतिहासिक कारण है।

अलग-अलग ऐतिहासिक महत्व

बता दें कि 15 अगस्त 1947 को भारत ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त की थी। यह दिन देश के गुलामी से मुक्त होकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने का प्रतीक है। वहीं, 26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ और देश एक संपूर्ण गणतंत्र बन गया। इसी ऐतिहासिक घटना की स्मृति में हर साल 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस मनाया जाता है।

15 अगस्त: ध्वजारोहण की परंपरा

स्वतंत्रता दिवस पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को ध्वजारोहण कहा जाता है। इसमें तिरंगे को झंडे के डंडे के नीचे से रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ाया जाता है और फिर उसे खोला जाता है। यह प्रक्रिया अंग्रेजी शासन के झंडे के उतरने और भारतीय तिरंगे के ऊपर चढ़ने का प्रतीक मानी जाती है। 15 अगस्त के दिन तिरंगा प्रधानमंत्री द्वारा फहराया जाता है, क्योंकि आज़ादी के समय देश में संविधान लागू नहीं था और राष्ट्रपति का पद अस्तित्व में नहीं था। उस समय प्रधानमंत्री ही देश के प्रशासनिक प्रमुख थे।

26 जनवरी: Flag Unfurling की प्रक्रिया

गणतंत्र दिवस पर तिरंगा फहराने की प्रक्रिया को अंग्रेज़ी में Flag Unfurling कहा जाता है। इस दिन झंडा पहले से ही डंडे के ऊपरी सिरे पर बंधा होता है। जैसे ही रस्सी खींची जाती है, तिरंगा खुल जाता है। यह भारत में संविधान के लागू होने और नए संवैधानिक युग की शुरुआत का प्रतीक है। 26 जनवरी को तिरंगा राष्ट्रपति द्वारा फहराया जाता है, क्योंकि राष्ट्रपति देश के संवैधानिक प्रमुख होते हैं। इसी दिन भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने पद की शपथ ली थी।

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बीएमसी चुनाव 2026: ठाकरे-भाजपा की नजदीकियों ने बढ़ाया सियासी पारा

मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों के नतीजों के बाद राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि उद्धव ठाकरे गुट अपने पार्षदों को मेयर चुनाव के दौरान मतदान से दूर रहने का निर्देश दे सकता है। ऐसी स्थिति में भाजपा बिना बड़े विरोध के अपना मेयर चुन सकती है।

Mumbai Municipal Corporation (BMC) Political
मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) राजनीतिक जोड़-तोड़ (फाइल फोटो)
locationभारत
userऋषि तिवारी
calendar19 Jan 2026 05:42 PM
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मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) चुनावों के नतीजों के बाद अब असली राजनीतिक जोड़-तोड़ शुरू हो गई है। मेयर पद को लेकर सत्ता के गलियारों में हलचल तेज है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) और भाजपा के बीच पर्दे के पीछे संभावित समझौते की चर्चाएं चल रही हैं। इस संभावित रणनीति का उद्देश्य उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के बढ़ते प्रभाव को सीमित करना बताया जा रहा है।

बीएमसी के 227 सदस्यीय सदन में भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है, जबकि बहुमत का आंकड़ा 114 है। शिवसेना (उद्धव गुट) के पास 65, शिंदे गुट के पास 29, कांग्रेस के 24 और अन्य दलों के 20 पार्षद हैं। भाजपा और शिंदे गुट मिलकर 118 के आंकड़े तक पहुंचते हैं, लेकिन यह बहुमत बेहद नाजुक माना जा रहा है।

ठाकरे गुट की ‘तटस्थ’ भूमिका की चर्चा

बता दें कि राजनीतिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि उद्धव ठाकरे गुट अपने पार्षदों को मेयर चुनाव के दौरान मतदान से दूर रहने का निर्देश दे सकता है। ऐसी स्थिति में भाजपा बिना बड़े विरोध के अपना मेयर चुन सकती है। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम 2017 के बीएमसी चुनावों में भाजपा द्वारा उद्धव ठाकरे को दिए गए समर्थन की ‘राजनीतिक वापसी’ हो सकता है। हालांकि, भाजपा नेता प्रवीण दरेकर और उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने ठाकरे गुट से किसी भी तरह की बातचीत की खबरों को सार्वजनिक रूप से खारिज किया है। बावजूद इसके, मुंबई की राजनीति में संभावनाओं के बदलते समीकरणों से इनकार नहीं किया जा रहा।

शिंदे गुट की किलेबंदी

मेयर चुनाव से पहले शिंदे गुट ने अपने पार्षदों को एक निजी होटल में ठहराया है। पार्टी का कहना है कि यह तीन दिवसीय ‘ओरिएंटेशन प्रोग्राम’ है, क्योंकि 29 में से 20 पार्षद पहली बार चुने गए हैं। वहीं विपक्ष ने इसे ‘पार्षदों को बंधक बनाने’ की कोशिश करार दिया है।शिवसेना (UBT) के सांसद संजय राउत ने होटल को ‘जेल’ बताते हुए पार्षदों को ‘रिहा’ करने की मांग की है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि उपमुख्यमंत्री होने के बावजूद एकनाथ शिंदे अपने ही पार्षदों पर भरोसा नहीं कर पा रहे हैं। जवाब में शिंदे गुट ने विपक्ष पर ही क्रॉस वोटिंग और अनुपस्थिति की साजिश रचने का आरोप लगाया है।

2017 की यादें और आज की राजनीति

बता दें कि 2017 के बीएमसी चुनावों में भाजपा ने मेयर पद की दौड़ से हटकर अविभाजित शिवसेना का समर्थन किया था। अब वही इतिहास दोहराए जाने की अटकलें लगाई जा रही हैं, जिससे शिंदे गुट को मेयर पद की सौदेबाजी से दूर रखा जा सके।

जनवरी के अंत तक मेयर चुनाव

मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के विश्व आर्थिक मंच की बैठक के लिए दावोस दौरे के कारण फिलहाल महायुति में आंतरिक चर्चा रुकी हुई है। सूत्रों के मुताबिक, बीएमसी मेयर चुनाव की प्रक्रिया जनवरी के अंत तक पूरी होने की संभावना है।

बता दें कि मेयर पद के लिए आरक्षण श्रेणी तय करने हेतु 22 जनवरी 2026 को लॉटरी निकाली जाएगी। इसके बाद अधिसूचना जारी होगी और सात दिन की नोटिस अवधि के बाद मतदान कराया जाएगा। ऐसे में मेयर चुनाव 29 से 31 जनवरी के बीच होने की संभावना जताई जा रही है।

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उत्तराखंड में UCC का इम्पैक्ट: 1 साल में जमकर हुए विवाह पंजीकरण

UCC लागू होने के बाद प्रतिदिन औसतन करीब 1400 विवाह पंजीकरण हो रहे हैं। वहीं पुराने कानून के दौर में यह औसत करीब 67 प्रतिदिन था। यानी पंजीकरण की रफ्तार में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी
locationभारत
userअभिजीत यादव
calendar19 Jan 2026 05:23 PM
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Uttarakhand News : उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने के बाद विवाह पंजीकरण की व्यवस्था ने जैसे नई रफ्तार पकड़ ली है। पहले पंजीकरण अधिनियम-2010 के तहत दंपती को उत्तराखंड के सब-रजिस्ट्रार कार्यालय तक दो गवाहों के साथ तय तारीख पर पहुंचना पड़ता था कागजात, कतार और औपचारिकताओं के बीच प्रक्रिया समयखाऊ बन जाती थी। अब तस्वीर बदल गई है। उत्तराखंड सरकार के डिजिटल सिस्टम के चलते पंजीकरण का लगभग पूरा काम ऑनलाइन हो रहा है। 

27 जनवरी को UCC के एक साल पूरे

आगामी 27 जनवरी को उत्तराखंड में UCC लागू हुए एक साल पूरा होने जा रहा है। सरकार का दावा है कि महिला सशक्तिकरण, बाल अधिकारों की सुरक्षा और नागरिक अधिकारों में समानता के साथ-साथ UCC ने प्रक्रियाओं को सरल बनाकर बड़ा बदलाव किया है। इसी का परिणाम है कि UCC लागू होने के एक साल से भी कम समय में 4,74,447 विवाहों का पंजीकरण हो चुका है।

अब घर बैठे हो रहा पंजीकरण

UCC के तहत विवाह पंजीकरण का लगभग शत-प्रतिशत काम ऑनलाइन माध्यम से हो रहा है। दंपत्ति और गवाह कहीं से भी दस्तावेज़ अपलोड कर सकते हैं और आवश्यक रिकॉर्ड/वीडियो बयान दर्ज कराकर आवेदन प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक सोमवार, 19 जनवरी 2026 की दोपहर तक कुल 4,74,447 विवाह पंजीकरण पूरे हो चुके हैं। सबसे बड़ा फर्क रोज के औसत में दिखता है। UCC लागू होने के बाद प्रतिदिन औसतन करीब 1400 विवाह पंजीकरण हो रहे हैं। वहीं पुराने कानून के दौर में यह औसत करीब 67 प्रतिदिन था। यानी पंजीकरण की रफ्तार में कई गुना बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

विवाह विच्छेद और लिव-इन से जुड़े प्रमाणपत्र भी ऑनलाइन

UCC लागू होने के बाद सिर्फ शादी का पंजीकरण ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी दूसरी सेवाओं में भी ऑनलाइन सिस्टम का असर साफ दिखा है। रिपोर्ट बताती है कि इसी अवधि में 316 लोगों ने ऑनलाइन माध्यम से विवाह विच्छेद की प्रक्रिया से जुड़े प्रमाणपत्र हासिल किए, 68 लोगों ने लिव-इन रिलेशनशिप का प्रमाणपत्र लिया, जबकि 2 मामलों में लिव-इन समाप्ति का प्रमाणपत्र भी जारी हुआ। सबसे अहम बदलाव यह है कि जहां UCC के तहत प्रमाणपत्र जारी करने की अधिकतम सीमा 15 दिन तय की गई है, वहीं जमीनी स्तर पर औसतन 5 दिन के भीतर दस्तावेज़ हाथ में आ रहे हैं। इसके मुकाबले पुराने अधिनियम में न तो कोई तय समय-सीमा थी और न ही दफ्तर गए बिना काम आगे बढ़ता था,अब प्रक्रिया काउंटर से निकलकर क्लिक पर आ गई है।

दूसरे राज्यों के लिए मॉडल - धामी

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि उत्तराखंड ने UCC लागू कर अन्य राज्यों को दिशा दिखाई है। उनके मुताबिक बीते एक साल में प्रावधानों को “पारदर्शी और सरल” ढंग से लागू करने से लोगों का भरोसा बढ़ा है और इसी वजह से बड़ी संख्या में लोग पंजीकरण करा रहे हैं। सरकार का दावा है कि उत्तराखंड का UCC हर तरह से मॉडल कानून के रूप में उभर रहा है। Uttarakhand News