दिल्ली में ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद-भाग 4’ का भव्य लोकार्पण हुआ। दीक्षित दनकौरी के संपादन में प्रकाशित इस श्रृंखला को हिंदी ग़ज़ल का महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज बताया गया।

National News : हिंदी साहित्य और ग़ज़ल की दुनिया में एक महत्वपूर्ण साहित्यिक पड़ाव उस समय दर्ज हुआ, जब वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित तथा प्रख्यात कवि एवं शायर दीक्षित दनकौरी द्वारा संपादित ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद-भाग 4’ का भव्य लोकार्पण दिल्ली विश्वविद्यालय के हंसराज कॉलेज के सभागार में हुआ। समारोह में देशभर के वरिष्ठ एवं नवोदित शायरों, शायराओं, साहित्यकारों और ग़ज़ल प्रेमियों की मौजूदगी ने इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर का साहित्यिक समारोह बना दिया। इस अवसर पर वरिष्ठ शायर शकील शिफ़ाई ने अध्यक्षता की। वरिष्ठ शायर विज्ञान व्रत मुख्य अतिथि तथा महान हिंदी कवि दुष्यंत कुमार के सुपुत्र आलोक त्यागी विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। National News
लोकार्पण समारोह का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह रहा कि वक्ताओं ने इस श्रृंखला को महज ग़ज़लों के संकलन के रूप में नहीं, बल्कि *दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी ग़ज़ल के विकास की एक व्यापक साहित्यिक यात्रा* के रूप में रेखांकित किया। वरिष्ठ हिंदी ग़ज़लकार एवं समीक्षक *ज्ञान प्रकाश विवेक* ने लोकार्पित पुस्तक पर विस्तृत समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा कि ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ के पहले भाग से लेकर चौथे भाग तक की यात्रा वस्तुतः हिंदी ग़ज़ल की यात्रा है। उन्होंने बताया कि श्रृंखला के चारों भागों में *एक हजार से अधिक रचनाकारों के फोटो और परिचय सहित पांच हजार से अधिक ग़ज़लें* समाहित हैं। ज्ञान प्रकाश विवेक ने इसे केवल चार पुस्तकों तक सीमित न मानते हुए कहा कि यह *हिंदी ग़ज़ल का एक कालखंड, उसकी सामूहिक चेतना और रचनात्मक वैभव* है। उनके अनुसार इस तरह का विशाल संकलन आने वाली पीढ़ियों को यह समझने में मदद करेगा कि दुष्यंत कुमार के बाद हिंदी ग़ज़ल ने किस तरह अपना स्वर, शिल्प, भाषा और कथ्य विकसित किया। National News
समीक्षा के दौरान ज्ञान प्रकाश विवेक ने पुस्तक में शामिल रचनाओं के माध्यम से समकालीन हिंदी ग़ज़ल के बदलते तेवरों को सामने रखा। उन्होंने हिंदी ग़ज़ल में *बतकही के नए अंदाज* की चर्चा करते हुए संतोष सिंह के शेर उद्धृत किए—
> रूह में बस गई हो क्या,
> सच बताओ कि मुंबई हो क्या।
>
> तुमको देखा नहीं कभी पहले,
> इस मुहल्ले में तुम नई हो क्या।
वहीं स्त्री अभिव्यक्ति में मौजूद पीड़ा और अनुभव की परतों की चर्चा करते हुए उन्होंने अर्चना अर्चन के शेर सुनाए—
> तआज्जुब है कि गुड़ में खटाई ढूंढ लेता है,
> वो मेरे हर हुनर में कुछ बुराई ढूंढ लेता है।
और
> मेरे हर दर्द, मेरे मर्ज़ को पहचानता है वो,
> बड़ा ज़ालिम है पर कड़वी दवाई ढूंढ लेता है।
इन शेरों के जरिए यह स्पष्ट किया गया कि समकालीन हिंदी ग़ज़ल अब केवल प्रेम और विरह की अभिव्यक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक जीवन, रिश्तों, स्त्री अनुभव, व्यंग्य, विसंगतियों और बदलते समय की संवेदनाओं को भी प्रभावी ढंग से अभिव्यक्त कर रही है। National News
दुष्यंत कुमार के सुपुत्र आलोक त्याग ने ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ श्रृंखला के लगातार विस्तार पर प्रसन्नता व्यक्त की। उन्होंने हिंदी ग़ज़ल के प्रचार-प्रसार और उसके रचनाकारों को एक साथ लाने के लिए दीक्षित दनकौरी के लंबे साहित्यिक प्रयास की सराहना की। आलोक त्यागी की मौजूदगी इस आयोजन के लिए विशेष महत्व रखती थी, क्योंकि दुष्यंत कुमार को आधुनिक हिंदी ग़ज़ल के सबसे प्रभावशाली हस्ताक्षरों में गिना जाता है और ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ श्रृंखला का शीर्षक ही उस साहित्यिक परंपरा की निरंतरता की ओर संकेत करता है। National News

कार्यक्रम का संचालन *मोईन शादाब* ने प्रभावी और रोचक अंदाज में किया। उन्होंने कहा कि ग़ज़ल मूलतः फ़ारसी और उर्दू की समृद्ध परंपरा से आई, लेकिन भारत की अनेक भाषाओं ने इसे अपनाया और हिंदी में भी ग़ज़ल ने व्यापक लोकप्रियता हासिल की। उन्होंने कहा कि हिंदी और उर्दू को करीब लाने में दीक्षित दनकौरी सेतु की भूमिका निभा रहे हैं। अंजुमन फ़रोग़-ए-उर्दू के अध्यक्ष *मोईन अख़्तर अंसारी* ने केंद्र और राज्य सरकारों से मांग की कि हिंदी और उर्दू को करीब लाने तथा ग़ज़ल साहित्य के क्षेत्र में इस प्रकार के ऐतिहासिक कार्य के लिए दीक्षित दनकौरी को उचित सम्मान एवं पुरस्कार दिया जाना चाहिए। National News
कार्यक्रम में दीक्षित दनकौरी ने ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ श्रृंखला के संपादन की *26 वर्षों की यात्रा* से जुड़े अपने खट्टे-मीठे, रोचक और चुटीले संस्मरण सुनाए। उनके संस्मरणों ने आयोजन को केवल औपचारिक पुस्तक लोकार्पण तक सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि इसे हिंदी ग़ज़ल की लंबी यात्रा के अनुभवों से जोड़ दिया। श्रोताओं ने उनके संस्मरणों का आनंद लिया और साहित्यिक यात्रा के विभिन्न पहलुओं को करीब से समझा। National News
ग़ज़ल के रचनाकार से लेकर हिंदी ग़ज़ल के दस्तावेजीकरण तक का सफर
दीक्षित दनकौरी हिंदी साहित्य और ग़ज़ल की दुनिया का जाना-पहचाना नाम हैं। वे स्वयं एक प्रसिद्ध कवि और शायर हैं और लंबे समय से ग़ज़ल के सृजन, प्रचार-प्रसार तथा रचनाकारों को एक साझा साहित्यिक मंच से जोड़ने के कार्य में सक्रिय हैं। उनकी विशेष पहचान केवल अपनी शायरी तक सीमित नहीं है। उन्होंने अलग-अलग पीढ़ियों के ग़ज़लकारों को एक साथ लाने और उनके रचनात्मक योगदान को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करने का बड़ा अभियान चलाया है। इसी प्रयास का परिणाम है ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ जैसी महत्वाकांक्षी श्रृंखला।
पिछले 26 वर्षों में इस परियोजना के माध्यम से उन्होंने हिंदी ग़ज़ल के व्यापक संसार को एक साथ संकलित करने का प्रयास किया है। श्रृंखला के चार भागों में एक हजार से अधिक रचनाकारों और पांच हजार से अधिक ग़ज़लों का समावेश इस कार्य के व्यापक आकार को दर्शाता है। दीक्षित दनकौरी की साहित्यिक विशेषता यह भी मानी जाती है कि वे वरिष्ठ और नवोदित रचनाकारों के बीच संवाद और सहभागिता का वातावरण बनाने में विश्वास रखते हैं। यही कारण है कि उनके साहित्यिक अभियानों में स्थापित नामों के साथ नई पीढ़ी के शायरों को भी स्थान मिलता है। National News
दीक्षित दनकौरी का साहित्यिक व्यक्तित्व *भारत तक सीमित नहीं है।* हिंदी ग़ज़ल और शायरी के क्षेत्र में उनके कार्य और सक्रियता ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक जगत में भी पहचान दिलाई है। उनका काम इस अर्थ में भी महत्वपूर्ण है कि वह हिंदी और उर्दू की साझा साहित्यिक विरासत को अलग-अलग खेमों में देखने के बजाय उनके बीच संवाद की संभावनाओं को मजबूत करता है। National News
*विशेष बॉक्स | ‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ क्यों है महत्वपूर्ण?*
‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ श्रृंखला का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि इसमें बड़ी संख्या में ग़ज़लकारों की रचनाएं शामिल हैं। इसका बड़ा महत्व यह है कि यह *दुष्यंत कुमार के बाद विकसित हुई हिंदी ग़ज़ल की बहुआयामी तस्वीर* को एक साथ सामने लाने का प्रयास करती है। National News
इस श्रृंखला में
- वरिष्ठ और नवोदित दोनों पीढ़ियों के रचनाकार शामिल हैं।
- एक हजार से अधिक रचनाकारों के फोटो एवं परिचय दर्ज हैं।
- पांच हजार से अधिक ग़ज़लें चारों भागों में संकलित हैं।
- हिंदी ग़ज़ल के बदलते कथ्य और शिल्प को समझने की सामग्री मिलती है।
- हिंदी और उर्दू की साझा साहित्यिक परंपरा को करीब लाने का प्रयास दिखाई देता है।
- आने वाली पीढ़ियों के लिए समकालीन ग़ज़ल का महत्वपूर्ण संदर्भ-साहित्य तैयार होता है।
इस दृष्टि से यह श्रृंखला *एक साहित्यिक पीढ़ी की स्मृति को सुरक्षित करने वाला महत्वपूर्ण दस्तावेज* बन जाती है। National News
समारोह के अध्यक्ष वरिष्ठ शायर *शकील शिफ़ाई* ने दीक्षित दनकौरी के कार्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि इतना बड़ा और प्रामाणिक काम कोई दीवाना ही कर सकता है। उन्होंने कहा कि दीक्षित दनकौरी स्वयं अच्छी शायरी करते हैं, लेकिन उनकी एक बड़ी विशेषता यह है कि वे सभी को साथ लेकर चलते हैं। बड़ों का सम्मान और छोटों के प्रति स्नेह उनका स्वभाव है। उन्होंने विश्वास जताया कि *‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद’ के चारों भाग आने वाली पीढ़ियों और नवोदित रचनाकारों के लिए मार्गदर्शक साबित होंगे। National News
इस ऐतिहासिक साहित्यिक अवसर पर *अंबर खरबन्दा, डॉ. रहमान मुसव्विर, अनिल ‘मीत’, डॉ. अमर पंकज, प्रो. श्याम वशिष्ठ, डॉ. शिवकांत शर्मा ‘शिव’, डॉ. सुधीर त्यागी, अशोक कश्यप, जगदीश जोशी ‘अम्बर’, अरविंद ‘असर’, गुरचरन मेहता ‘रजत’, अभिषेक अग्निहोत्री, पुष्पेंद्र पुष्प, डॉ. खुर्रम नूर, राजीव सिंघल, जितेंद्र सिंह, रचना निर्मल, चेतना कपूर, गार्गी कौशिक और सोनम यादव* सहित दिल्ली-एनसीआर और देशभर से आए अनेक वरिष्ठ एवं नवोदित शायर-शायराएं और ग़ज़ल प्रेमी मौजूद रहे। कार्यक्रम के अंत में *वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी* ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों और ग़ज़ल प्रेमी सुधीजनों के प्रति आभार व्यक्त किया। National News
‘ग़ज़ल दुष्यंत के बाद-भाग 4’ का लोकार्पण इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह आयोजन एक पुस्तक के प्रकाशन से आगे बढ़कर *हिंदी ग़ज़ल की उस परंपरा और यात्रा को रेखांकित करता है, जो दुष्यंत कुमार के बाद लगातार नए रचनाकारों, नए मुहावरों और नए अनुभवों के साथ विकसित हुई है। दीक्षित दनकौरी का यह अभियान इस पूरी यात्रा को एक जगह सहेजने की कोशिश है। ऐसे समय में जब साहित्य की अनेक महत्वपूर्ण रचनाएं समय के साथ विस्मृति में चली जाती हैं, एक हजार से अधिक रचनाकारों और हजारों ग़ज़लों को संकलित करने का प्रयास आने वाली पीढ़ियों के लिए विशेष महत्व रखता है। National News
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